शिव की जंघा से उत्पन्न हुए यह जोगी

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है पावन धरा..

है पावन संगम..

है अतिपवान यह क्षण…

और अद्भुत यह कुम्भ पर्व

सदियों से भारत में कुम्भ पर्व मनाये जाने की परंपरा है… सालों के अंतराल में आने वाले इस पर्व का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार किया जाता है.. इसका कारण सिर्फ कुम्भ पर्व के उन पावन क्षणों में वहां की पावन नदियों में नहाकर स्वयं को तृप्त और पवित्र कर लेना ही नहीं होता.. बल्कि उस दिव्य धरा पर जहाँ कुम्भ लगा है वहां एक साथ अनेकों दिव्य साधुओं का सानिध्य पा लेना भी होता है जो वहां पधारे हुए है

ना जाने क्या बात है इस पर्व में कि हर बार और भी खूबसूरत लगता है.. जितनी बार भी जाओ वहां जाने की प्यास और बढ़ती जाती है… और यहाँ पधारे असंख्य साधुओं का समावेश इस पर्व की पावनता को और कई गुना बढा देता है.. इस बार भी कुम्भ मेले में पधारे नागा साधू जहाँ श्रद्दालुओं के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं.. तो पहली बार पधारे किन्नर साधुओं को देख हर कोई मुग्ध हो रहा है लेकिन इस बीच वो साधू जो स्वयं को देवों के देव महादेव की जंघा से उत्पन्न बता रहे हैं.. उनके पास से यहाँ आने वालों की भीड़ हटती ही नहीं

इन साधुओं को जंगम साधू कहा जाता है, इनका अनोखी वेश भूषा और अनोखी गायन शैली.. यहाँ आये पर्यटकों, श्रद्धालुओं और साधुओं सबको लुभा रहा है..

ये जंगम जोगी स्वयं को भगवन शिव से उत्पन्न मानते हैं, इनके विषय में बड़ी अनोखी कहानी प्रचलित है.. कहते हैं.. कि जब भगवान शिव का विवाह हो रहा था तब उन्होंने विष्णु जी औएर ब्रम्हा जी को दक्षिणा लेने के लिए कहा जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया.. इस बात पर भगवन शिव नाराज हो जाते हैं और गुस्से में अपनी हथेली से अपनी जांघों को पीटते हैं.. और इसी से यह जंगम साधू उत्पन्न हुए और उन्होंने शिवजी से दक्षिणा ली. इसलिए जंगम जोगी शिव पुराण का गायन करके साधु-संन्यासियों से दान-दक्षिणा ग्रहण करते हैं।

तो यह है जंगम जोगियों के बारे में प्रचलित कथा.. खैर यह बात सत्य है या सिर्फ कथन नहीं पता.. पर जिस तरह से यह जोगी सब कुछ भुला कर अपनी ही धुन में मगन होकर कथा गा -गा कर सुना रहे हैं उससे कुम्भ मेले में आने वाले सभी लोगों का खूब मन लगा रहा है.. तो अगर आप भी घर बैठे हैं और कुम्भ जाने का मन बना रहे हैं तो जाइये और घूम कर आइये और प्रतिभागी बनिए इन दिव्य क्षणों का.. अपनी संस्कृति का.. अपनी इतिहास का