जलियांवाला बाग़ काण्ड : इससे पहले भी ब्रिटेन हो चुका है शर्मिंदा, इसे माफ़ी नही कहते

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जलियावाला बाग़ सामूहिक हत्या काण्ड हमारे लोगों पर हुए जुल्म को वो पन्ना है जो अंग्रेजों को बार बार शर्मिंदा होने पर मजबूर करता है. 13 अप्रैल को इस हत्याकांड के 100 साल पूरे हो जायेंगे इस बीच दुनिया ने कई बदलाव देखे लेकिन ब्रिटिश लोगों को ना तो इस पर शर्म आई और ना ही इस पर पछतावा हुआ.. हां कुछ लोगों ने इसे शर्मनाक जरूर बताया था जैसे 1997 में महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर आकर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी. 2013 में भी तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन इस स्मारक पर आए थे. घटना के मद्देनजर विजिटर्स बुक में उन्होंने लिखा था कि ‘ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी.’ लेकिन अब एक बार फिर ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने इस घटना को शर्मनाक बताया है ब्रिटेन की पीएम थेरेसा में ने वहां की संसद में जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए खेद जताया है ब्रिटेन की पीएम ने कहा है कि जो हुआ उसके लिए हमें गहरा अफसोस है लेकिन हमें यहाँ यह भी जानने और समझने की जरूरत है कि उन्होंने औपचारिक रूप से माफ़ी नही मांगी है. लेकिन हमारे यहाँ कुछ इसी तरफ से पेश किया जा रहा  है कि ब्रिटिश सरकार ने जलियाबला बाग़ काण्ड के लिए माफ़ी मांगी है लेकिन ऐसा नही है. थेरेसा ने कहा कि बेहद शर्मनाक घटना थी लेकिन इसे माफ़ी मांगना नही कहते…

कुछ दिन पहले ब्रिटिश सरकार द्वारा माफ़ी मांगने का प्रस्ताव रखा गया था और इसे जरूरी बताया था. हालाँकि यहाँ सबसे मजेदार बात तो यह हुई कि सभी सांसदों ने इसका समर्थन किया था. वहीं ब्रिटिश सरकार के एशिया पेसेफिक मामलों के मंत्री मार्क फील्ड ने इस घटना को लेकर संसद में संवेदना तो जताई  मगर घटना को लेकर उन्होंने माफ़ी मांगने से साफ इंकार कर दिया था.

हालाँकि जिस तरफ से ब्रिटिश की तरफ से लगातार जलियावाला बांग हत्याकांड को लेकर बयान सामने आ रहे हैं तो कभी चर्चा होती है.. इसे तो एक बात साफ़ है कि इस घटना से बिगड़े संबंधों को सुधारने के लिए कुछ दिनों बाद ब्रिटिश सरकार माफ़ी भी मांग ले..

साल 1919 में लोग बैसाखी के मौके पर 13 अप्रैल को देश के अलग अलग हिस्से से अमृतसर पहुँचने लगे.. अमृतसर में एक दिन पहले ही ब्रिटिश हुकुमत ने कर्फ्यू लगा दिया.. इसके बाद अगली सुबह बैसाखी थी.. धीरे धीरे लोग जलियावाला बाग़ में इकट्ठा होने लगे… कुछ ही देर में वहां पहुँचने वालों की संख्या हजारों में पहुँच गयी..

जलियावाला बाग़ घटना के खलनायक ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल डायर को पता चला कि जालियांवाला बाग में कोई मीटिंग होने वाली है. इसके बाद वो जालियांवाला बाग की तरफ पुलिस के साथ चल पड़ा. जालियांवाला बाग के गेट सकरा है वो रास्ता पुलिस के सिपाहियों से भर चुका था. जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के सिर्फ एक शब्द कहा ,,,FIRE इसके बाद बाग में मौजूद लोगों पर गोलियों की बौछार होने लगी. बताया जाता है कि कई लोगों ने खुद को बचाने के लिए पार्क में ही बने कुंएं में कूद गये थे बाद इस कुएं से लगभग 120 लाशें निकाली गयी थी. ब्रिटिश सरकार के रिपोर्ट्स के अनुसार इस घटना में 379 लोग मारे गए.

इनमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएं भी शामिल थीं…  तकरीबन 1200 लोग घायल हुए.. ये तो आधिकारिक आंकड़े थे वैसे कहा जाता है कि लगभग एक हजार लोग मरे गये थे, इस घटना के बाद पूरी दुनिया में तहलका मच गया था.. इस पर जांच के लिए कमिटी बैठाई गयी.. कमिटी के सामने डायर ने कहा कि मैंने गोलियां चलवाईं और तबतक चलवाता रहा जबतक की भीड़ तीतर बितर नहीं हो गई”. सवाल सिर्फ भीड़ को भगाने का नहीं था, बल्कि लोगों के दिमाग पर असर पैदा करने का था.”

13 अप्रैल को इस घटना को 100 साल पूरे रहे है. और ब्रिटिश सरकार अब भारत की ताकत पहचान रही हैं. भारत के साथ अपने संबंधो को सुधार करने के लिए और अर्थवयवस्था की सुधार के लिए वो दिन दूर नही जब ब्रिटिश सरकार जलियावाला बाग़ सामूहिक हत्याकांड पर माफ़ी मांग कर पूरी दुनिया के सामने ये कबूल करेगा कि उसने सत्ता हथियाने के लिए किस तरफ से लोगों के खून बहाए थे.