क्या Facebook भारतीय इलेक्शन में दखलंदाजी कर रहा है?

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क्या Facebook भारतीय इलेक्शन में दखलंदाजी कर रहा है?
foreign policy एक्सपर्ट अभिजीत ऐय्यर ने दिल्ली पुलिस के साथ मिल कर Facebook के खिलाफ एक क्रिमिनल कंप्लेंट फाइल की, शिकायत ये है कि 2019 में हो रहे चुनावों में Facebook बाहरी ताकतों के साथ मिल कर हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा है.
उनके मुताबिक May 17, 2018 में Facebook की global politics और गवर्नमेंट outreach director, Katie Harbath ने बयान दिया था कि वो एक अमरीकी company “ Atlantic council” के साथ मिलकर अब यह सुनिश्चित करेंगी कि दुनिया के आगामी चुनावों में Facebook एक positive platform का role निभाए.
American Atlantic council एक think tank है जो global politics पर research करती है. ऐसे सुनने में तो ये कुछ बुरा नहीं लग रहा है, लेकिन अगर इस company के members की बात की जाए तो पता चलता हैं कि इस council के मेम्बर्स में कांग्रेस की UPA regime में information and broadcasting minister रह चुके मनीष तिवारी, और पूर्व पाकिस्तानी आर्मी चीफ सुज़ा नवाज़ भी शामिल हैं.
आखिर चुनाव में फेसबुक के इस दखल का मतलब क्या है? क्या अब एक अमेरिकी company decide करेगी कि भारत में चुनावों के दौरान क्या information circulate हो रही है. अब Facebook और ये organization मिलकर, फेसबुक पर अपने मन मुताबिक की information को चलाने देंगे और बाकियों को delete करंगे…
हाल ही में Facebook ने political subject से जुड़े हुए 800 से ज्यादा पेज delete किये हैं, उनमें से कुछ ऐसे पेज थे जिनको Facebook ने बिना किसी वज़ह के हटा दिया.
केवल pages ही नहीं बल्कि वो political commentator जो खास कर rightwing की ओर रुझान रखते हैं उनके पेज भी delete किये गये हैं.

चलिए अच्छी बात है, आचार संहिता सोशल मीडिया पर भी लागू कर दी जाए. लेकिन अगर इस तरीके के पेजेज को डिलीट किया जाए, तो फिर लेफ्ट और राईट सभी के पेजेज डिलीट हों.
मगर ऐसा हुआ नहीं, बड़ी following वाले लेफ्ट पेज न जाने कैसे इस सर्च से अछूते रह गये.
माना कि Facebook एक private संस्था है और वो चाहे तो वहाँ मौजूद जितने मर्जी उतने face book के page delete कर सकती है, लेकिन ये बात भी समझने वाली है कि एक अमेरिकी company दुनिया भर की politics नहीं समझ सकती, उसे चाहिए कि वो एक और private company के साथ मिलने की जगह, अलग- अलग देशों के निष्पक्ष संस्थानों के साथ मिलकर काम करे.
मजेदार बात ये है कि एक ऐसी विदेशी company जिसके ऊपर कांग्रेस के साथ मिले होने के कई आरोप लगे हैं, वो फेसबुक के साथ मिलकर भारत में चुनावी माहौल निर्धारित कर रही है. लेकिन ये सवाल अब भी बना हुआ है कि Facebook ऐसी किसी company के साथ मिलकर क्यों काम कर रहा है?
भारत में election commission जैसे संसथान हैं, और Facebook चाहे तो इनके साथ मिलकर इन चुनावी मुद्दों से निपट सकता है. वो चाहे तो एक से ज्यादा think tank organizations की मदद भी ले सकता है, और ये Organizations एक तरफ़ा काम भी नहीं करती, फिर भी ना जाने क्यों Facebook को एक ऐसी संस्था का सहारा लेना पड़ रहा है.
फेसबुक खुद पहले से ही brexit और अमेरिकन इलेक्शन में हराज़ों लोगो का डाटा “Cambridge Analytica” नाम की organization को लीक करने का इलज़ाम झेल रहा है, उसकी छवि पहले से ही खराब है, और अब इस मसले के बाद तो Facebook की ये छवि सुधरने से रही.
बेहतर होता अगर facebook हालिया सूरतों को देख कर एक से जादा organisations के साथ मिलकार काम करता जिससे काम निष्पक्षता से होता और विवाद भी पैदा ना होते.