वो दो दिन.. जब आधा भारत घुप्प अँधेरे में रहा

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31 जुलाई 2012 और 1 अगस्त 2012 ये वो दो दिन हैं.. जब हिंदुस्तान की आधी आबादी अँधेरा और भीषण गर्मी झेल रही थी.. कारण बिजली ना होना.. ये हिंदुस्तान का अब तक का सबसे बड़ा पॉवर आउट था, और विश्व का तीसरा, जिससे एक साथ 60 करोड़ हिन्दुस्तानी प्रभावित हुए थे.. भीषण गर्मी के वो दिन और बिजली गुल थी.. पूरे दो दिन तक, आधे लोगों के पास 7-8 घंटे की बिजली थी.. लेकिन बाकि आधों के पास 8 सेकंड की भी नहीं.. एयरपोर्ट्स, रेलवे स्टेशन, मेट्रो हॉस्पिटल्स तक थम गया था..

भारत विश्व में बिजली उत्पादन और उपभोग के मामले में तीसरे नंबर पर है.. US और चाइना के बाद, लेकिन बिजली की कड़की वो हमेशा से झेलता रहा है.. सरकारें बेशक बदलती रही.. पर ना केवल 24 घंटे बिजली पाना सपना रहा बल्कि भारत का अधिकाँश हिस्सा तो यह जानता ही नहीं था कि बिजली होती क्या है.. ये लोग टीवी, मोबाइल फ्रिज होता क्या है यह तक नहीं जानते थे.. भारत का एक हिस्सा रोशनी के अभाव में दुसरे हिस्से से कभी जुड़ ही नहीं पाया था.

साल २०१४ में वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट आई थी.. जिसके मुताबिक भारत को गैर विद्युतीकरण आबादी वाले देशों की सूची में सबसे पहले रखा गया था.. जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शपथ ली कि वो 1000 दिनों के अन्दर भारत के हर कोने कोने में बिजली पहुंचा देंगे.. और उन्होंने यह करके भी दिखाया.. 28 अप्रैल 2018 तारीख को भारत के इतिहास में दर्ज किया जायेगा… क्यूंकि यही वो दिन था.. जब भारत का छोटे से छोटा गाँव भी रोशन हो गया.

कितना अच्छा महसूस होता है ना.. पूरे देश में बिजली पहुँच गई, पर पहुंचाई किसने..??

अब थोडा सा पीछे जाइये और याद कीजिये वो दिन ??

जब हर गर्मी हम हाथ में पंखा लिए बैठे रहते थे..

और पसीना पोंछते रहते थे

ज्यादातर दीवाली अँधेरे में बीत ती थी..

लाइट आते ही लाइट आ गई.. लाइट आ गई चिल्लाते और सबसे पानी का स्टॉक रेडी करते थे..

क्यूंकि पता होता था कि आधे दिन लाइट नहीं रहेगी..

AUNTIEs के फेवरिट टीवी SERIALS मिस हो जाते थे..

और UNCLES का भारत पाकिस्तान का मैच.,

दिन पसीना पोंछते हुए कट जाते थे..

और रातें छत पर मच्छर मारते हुए..

क्या दिन थे वो भी.. लाइट na होने की वजह से.. कोई काम होता नहीं था.. तो या तो छत पर बैठे होते थे, या पार्क में.. या गलियों में गप्पे मार रहे होते थे.. कितने व्यवहारिक हुआ करते थे ना.. और ये तो शहरों का हाल हुआ करता था.. गाँव में तो इससे भी बुरा, वहां तो बिजली पहुँचती ही नहीं थी…

और अक्सरकर जनता कभी बिजलीघरों में हंगामा करती मिलती थी.. कभी सड़कों पर जाम लगाये

हर अखबार और चैनल की हैडलाइन होती थी.. बिजली का हाहाकार

हर गर्मी एक्स्ट्रा लोड की वजह से ट्रांसफार्मर्स ख़राब होते थे.. और पॉवर सप्लाई ठप्प

ज्यादा पुरानी बात नहीं है… 2014 से पहले का कोई भी अखबार उठाकर देख लीजिये.. याद आ जायेगा जो आप भूल चुके हैं..  और असल में यही होते हैं intolerance के दिन.. जो अब सच में बदल चुके हैं.

अब इससे ज्यादा क्या ही कहें..आप खुद ही समझदार हैं??