राम मंदिर पर मचे बवाल के बीच ये रिपोर्ट आपको जरुर पढ़ना चाहिए!

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मुद्दा राम मंदिर की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई… लेकिन कोर्ट ने सुनवाई को फिर एक नई तारिख दे दी. तारीख पर तारीख, तारिख पर तारीख सालों से चलती आ रही है और एक बार फिर राम मंदिर की सुनवाई टाल दी गयी. नई तारिख 10 जनवरी तय की गयी है. वहीँ प्रधानमंत्री मोदी ने साल के पहले दिन ही दिए इंटरव्यू में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अध्यादेश पर विचार किया जाएगा. लोगों की मांग है कि अध्यादेश लाकर मंदिर बनाने की प्रकिया शुरू की जाये…लेकिन क्या ये पहला मौका है जब राम मंदिर के लिए अध्यादेश लाने पर विचार किया जा रहा है? —– नही

राम मंदिर बनाए जाने के लिए अध्यादेश लाना कोई नई बात नहीं है. करीब 25 साल पहले ही कांग्रेस सरकार अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश ला चुकी है जो अब राम मन्दिर के लिए लाये जा रहे अध्यादेश के विरोध में है. बता दें कि राम मंदिर आन्दोलन के चलते 6 दिसंबर 1992 को ही विवादित ढाँचे को तोड़ दिया गया इसके एक साल बाद ही बाद 1993 में जब पीवी नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे, उस वक्त राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाया गया था.7 जनवरी, 1993 को राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने भी इसे मंजूरी दे दी थी. बाद में तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा के सामने रखा था. पास होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम कहा गया था. इस बिल को सदन में पेश करते हुए तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चौहान ने कहा था कि , “देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना बनाए रखना जरूरी है.”

नरसिम्हा राव सरकार इस अधिनियम में वे सारी बातें शामिल थी जिसे आज बीजेपी राम मंदिर मुद्दे में शामिल करना चाहती है जैसे 2.77 एकड़ की विवादित भूमि के साथ इसके चारों ओर की 60.70 एकड़ जमीन भी अधिग्रहीत करना और इस पर राम मंदिर, एक मस्जिद, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं का निर्माण करना.
नरसिम्हा सरकार ने इस अध्यादेश के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगी कि क्या विवादित जमीन पर पहले कोई हिंदू मंदिर या हिंदू ढांचा था? तो सुप्रीम कोर्ट सलाह देने पर विचार तो किया लेकिन सलाह देने से इनकार कर दिया.
सदन में अध्यादेश पास तो हो गया. जिससे मुस्लिम समाज के लोग नाराज भी गये थे…हालाँकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के आधार पर विवादित जगह के जमीन संबंधी मालिकाना हक से संबधित कानून पर स्टे लगा दिया और कोर्ट ने कहा था कि जब तक इसका निपटारा किसी कोर्ट में नहीं हो जाता तब तक इसे लागू नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन पर एक राम मंदिर, एक मस्जिद एक लाइब्रेरी और दूसरी सुविधाओं का इंतजाम करने का समर्थन किया था लेकिन यह भी कहा था कि यह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं है. इस तरह अयोध्या एक्ट व्यर्थ हो गया.
अब यहाँ आपको यह जानना बेहद जरुरी है कि साल 1985 में राजीव गांधी के कहने पर राम मंदिर का ताला खोला गया और वहां मूर्ति स्थापति कर भगवान राम की पूजा करने की इजाजत मिल सकी.


आखिर क्या कारण था जिसकी वजह से राजीव गाँधी ने राम मंदिर का ताला खुलवाया और पूजा अर्चना करने की इजाजत दी. दरअसल उस समय साहबानों का केस देश भर की सुर्ख़ियों में था. साहबानों को पांच बच्चे होते हुए उसके पति ने तलाक दे दिया था. इसके लिए वो कोर्ट गयी और जीत भी हुई. शाहबानों को तलाक के खिलाफ मिली जीत से एक विशेष समुदाय के पुरुष काफी नाराज थे. राजीव गांधी ने शाहबानों को मिली इस जीत को कानून बनाकर कोर्ट के फैसले को पलट दिया था . सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के बाद राजील गांधी को देश के हिन्दूओं के नाराज होने की आशंका दिखाई दे रही थी. इसके बाद राजीव गांधी ने इसका हल निकालने की कोशिश की, इसके लिए उन्होंने राम मंदिर को खोलने का आदेश दिया . इसी वक्त लालकृष्ण अडवानी जैसे नेता राम मंदिर आन्दोलन में घुस चुके थे और राम मद्निर का मुद्दा जोर-शोर के आन्दोलन के साथ बीजेपी के हाथ में आया तबसे लेकर आज तक मंदिर निर्माण को लेकर कोर्ट से तारीख पर तारीख मिलती आ रही है. अब देखने वाली बात तो यह है कि तारिख पर तारीख के बीच सुप्रीम कोर्ट अब अपना फैसला सुनाएगा.