और इस तरह अमित शाह के जाल में फंस गई शिवसेना

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साल 2018, राज्य कर्नाटक, विधानसभा चुनाव के परिणाम आये तो कांग्रेस की सत्ता जा चुकी थी और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी लेकिन बहुमत से दूर रह गई. सत्ता की चाभी आई JDS के पास. भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस और JDS ने हाथ मिला लिया और सरकार बना ली. इसे अमित शाह की हार कहा गया क्योंकि इससे पहले गोवा से लेकर मणिपुर तक में उन्होंने दुसरे नंबर की पार्टी होने के वावजूद भाजपा की सरकार बनवा दी थी लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया.

एक कहावत है कि शेर को जब अपने शिकार पर झपट्टा मारना होता है तो वो पहले दो कदम पीछे जाता है. जो लोग अमित शाह को नहीं जानते उन्होंने तुरंत कर्नाटक के हालातों को अमित शाह की हार घोषित कर दिया. लेकिन फिर हुआ क्या ये सब जानते हैं. कांग्रेस और जेडीएस सरकार एक साल भी नहीं चल पायी. सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस के विधायक भाजपा के साथ आ गए और उन्होंने येदुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनवा दी. लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने कांग्रेस और जेडीएस का सूपड़ा साफ़ कर दिया.

अब आते हैं साल 2019 पर, राज्य महाराष्ट्र, विधानसभा चुनाव के परिणाम आये तो भाजपा और शिवसेना गठबंधन की सत्ता में वापसी हुई. भाजपा सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनी लेकिन अकेले बहुमत पाने से चूक गई. अब शिवसेना ने आँखे दिखाना शुरू कर दिया. विधानसभा चुनाव देवेन्द्र FADANVIS के चेहरे पर लड़ा गया था लेकिन चुनाव परिणाम आते ही शिवसेना ढाई साल के लिए अपना CM मांगने लगी. अमित शाह को ये मंजूर नहीं हुआ. मंजूर हो भी कैसे सकता था. शिवसेना से दुगुनी सीटें जीत कर उसे कैसे दे दे ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद.

शिवसेना इंतज़ार कर रही थी कि अमित शाह एक बार फिर मनाने के लिए मातोश्री आयेंगे, ठीक वैसे ही जैसे वो लोकसभा चुनाव के पहले आये थे. लेकिन शिवसेना ये भूल गई कि अमित शाह लोकसभा चुनाव से पहले सिर्फ भाजपा के अध्यक्ष थे लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद वो देश के गृहमंत्री हैं. दूसरी बात ये कि न तो उद्धव, बाल ठाकरे हैं और न अमित शाह , लाल कृष्ण आडवानी हैं जो मातोश्री में जा कर मत्था टेके. शिवसेना इंतज़ार करती रही और अमित शाह ने कोई भाव ही न दिया, भले ही चाहे सरकार न बने. नतीजा ये हुआ कि कभी जिस मातोश्री के दर पर शरद पवार और बाकी सबके सिर झुका करते थे उस मातोश्री का सर दस जनपथ और शरद पवार के दर पर झुक गया.

देर –सवेर सरकार का गठन हो ही जाएगा. लेकिन क्या इससे भाजपा को झटका लगा? क्या इससे अमित शाह की शाख कमजोर हुई? जो अमित शाह को नहीं जानता अगर आप उससे पूछें तो वो बिना शक इसका जवाब हाँ में देगा लेकिन जो अमित शाह को अच्छे से जानता है वो कहेगा Keep Calm and Trust Amit Shah.

कर्नाटक में तो दो दलों का गठबंधन था फिर भी सरकार एक साल से ज्यादा नहीं चल पायी लेकिन महाराष्ट्र में तो तीन दलों की खिचड़ी है, कितनी दूर तक चल पाएगी शिवसेना-एनसीपी –कांग्रेस गठबंधन की सरकार इसका अनुमान लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है. अभी तक महाराष्ट्र में हिंदुत्व की राजनीति करने में भाजपा और शिवसेना साझीदार थी लेकिन अब शिवसेना को कांग्रेस के साथ जाने के लिए अपनी हिन्दुत्ववादी छवि की तिलांजलि देनी होगी. सरकार बनाने के लिए जो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बना है उसमे भी इस बात का ख़ास तौर पर जिक्र है कि शिवसेना को हिंदुत्व के मुद्दे को छोड़ना होगा. तो बची सिर्फ भाजपा, जिसके लिए महाराष्ट्र में मैदान बिलकुल खुला है.

तीन तलाक, आर्टिकल 370 और राम मंदिर जैसे मुद्दे हल हो चुके हैं. भाजपा का अगला मिशन यूनिफार्म सिविल कोड हो सकता है. जिसकी हिमायत शिवसेना भी करती रही है. लेकिन कांग्रेस के साथ होने के कारण शिवसेना का इस मुद्दे पर क्या रुख होगा इसे समझने के लिए ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है.

अगर शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार बनी और चली तो भाजपा के पास पुरे पांच साल होंगे लोगों को ये बताने के लिए कि शिवसेना ने सत्ता की खातिर कांग्रेस जैसी पार्टी के साथ भी हाथ मिला लिया. लेकिन भाजपा ने अपने सिद्धांतों के लिए सत्ता की कुर्बानी दी. भाजपा अगले 5 साल तक सत्ता विरोधी लहर खड़ा करेगी. भाजपा ने राज्य में शिवसेना का अस्तित्व तो पहले ही सिमित कर दिया था, अब कांग्रेस और एनसीपी के साथ जाने के बाद शिवसेना और सिमटेगी क्योंकि अगले चुनाव में राज्य की 288 सीटों में तीन हिस्से लगेंगे और चुनाव लड़ने के लिए किसके हिस्से कितनी सीटें आएँगी ये समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है.

शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन से शिवसेना को अपनी राजनैतिक हैसियत, अपने मुद्दे और अपनी हिन्दुत्ववादी छवि खोना पड़ेगा, एनसीपी, शिवसेना के मुकाबले इन चुनावों में ज्यादा मजबूत हो कर उभरी है. कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं है. वो बिलकुल खाली हाथ है और सत्ता में भागीदारी मिल रही है तो वो भला क्यों मौका छोड़े. अंग्रेजी में कहावत है न कि Somthing Is Better Than Nothing. कांग्रेस इसी कहवत पर फिट बैठ रही है. तो आप भी चैन से बैठिये और भविष्य का इंतज़ार कीजिये क्योंकि अमित शाह महाराष्ट्र में पाक रही खिचड़ी को चैन से पकने तो नहीं देंगे.