कौन है गरीब, कैसे तय करेंगे राहुल गांधी ? देखिए ये रिपोर्ट

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साहिर लुधियानवी ने लिखा था– “इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर / हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़.” कुछ ऐसा ही मजाक इस देश के गरीबों के साथ कांग्रेस सदियों से करती आई है..और एक बार फिर से कर रही है..लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस एक बार फिर से गरीबों को लुभाने के लिए उन्हें 72 हजार रुपय देने की घोषणा कर दी है..ये वहीं कांग्रेस है जो नेहरू सरकार के समय से देश से गरीबी पर विशेष ध्यान देने का दावा करती है लेकिन ये दावा धरातल पर कितना सच साबित हुआ है ये आपलोगों से छूपा नहीं है..

अब राहुल गांधी एक नया जुमला लाए है कि वो अगर लोकसभा चुनाव जीत कर सत्ता में आए तो हर गरीब को साल में 72 हजार रुपय देंगे.. इस शब्द पर ध्यान दिजिएगा 72 हजार रुपय..तो चलिए जानते है राहुल गांधी के 72 हजार रुपये की हकीकत क्या है..इसके लिए हमे कुछ साल पहले कांग्रेस की सरकार में जाना पड़ेगा..जब अर्थशास्त्र के पंडित डॉ. मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे..उस समय सुप्रीम कोर्ट ने भारत के गरीबों और गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे लोगों की रिपोर्ट के बारे में जानकारी मांगी..जिसके बाद साल 2011 में केंद्र सरकार के योजना आयोग (जो की बीजेपी सरकार में अब नीति आयोग के नाम से जाना जाता है) ने शपथपत्र दाखिल कर के यह कहा था कि जो व्यक्ति शहर में 32 रूपया प्रति दिन और गांव में 26 रूपया प्रति दिन कमा रहा है.उसे गरीब नहीं माना जा सकता है..ऐसे हर व्यक्ति जो 32 रूपया प्रति दिन और गांव में 26 रूपया प्रति दिन कमा रहा है उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर रखा गया है और इन लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं दिया जा सकता है. योजना आयोग के इस शपथ पत्र के बाद कांग्रेस सरकार की चारों तरफ आलोचना हुई थी..लेकिन योजना आयोग ने कहा कि आबादी ज्यादा है और इसमें कोई बदलाव संभव नहीं है..

32 रुपय हर दिन के हिसाब से देखा जाए तो साल भर में 11 हजार 680 रुपय बनता है..ऐसे में 10 सालों तक इनकी यूपीए की सरकार थी तब साल भर में 11 हजार 680 रूपया कमाने वाला व्यक्ति इन्हें गरीबी रेखा के ऊपर दिखाई दे रहा था..और अब राहुल गांधी जनता से ये वायदा कर रहे है कि गरीबों को 72 हजार रूपया दिया जाएगा जब उनकी सरकार सता में आएंगी..इनकी सरकार महज 5 सालों तक सरकार से बाहर रहने के बाद गरीबों के लिए 72 हजार रूपये की बात करने लगी..अब यहां सवाल ये है कि इनकी सरकार किस आधार पर यह तय करेंगी कि गरीब कौन है, क्योंकि इनकी पिछली सरकार में गरीबी की जो परिभाषा तय की गयी थी वो तो बेहद हास्यास्पद और चौकाने वाली थी..

योजना आयोग(अब नीति आयोग) के शपथ पत्र पर जरा विस्तार से गौर करें तो उस समय यह बताया गया था कि गरीबी रेखा के नीचे गुजर – बसर करने वालों की आबादी 40.74 करोड़ है. शहरी क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों के लिए 32 रूपया प्रति दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए 26 रूपया प्रति दिन आय की सीमा रेखा तय की गयी है. जानकारी के अनुसार वर्ष 1970 में योजना आयोग के द्वारा पहली बार इस तरह का सर्वे काराकर गरीबी रेखा का निर्धारण किया गया था. गरीबी रेखा का निर्धारण हो जाने के बाद समय – समय पर इस प्रकार का सर्वे योजना आयोग कराता रहता है. पहली बार जब यह सर्वे कराया गया था. तब एक व्यक्ति को कितना न्यूनतम कैलोरी दिन भर में चाहिए होगी, इस आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण किया गया था. प्रतिदिन के हिसाब से यह माना गया था कि शहर में रहने वाले एक वयस्क को 2100 कैलोरी और गावं में रहने वाले एक व्यस्क को 2400 कैलोरी की न्यूनतम आवश्यकता है. अर्थशास्त्री डी. टी. लकड़ावाला और बाद में वाई. के. अलघ भी इस प्रकार के सर्वे में शामिल थे. कुछ वर्ष बीतने के बाद कैलोरी के साथ – साथ कुछ अन्य आवश्यकताओं जिसमे शिक्षा एवं वस्त्र आदि को गरीबी रेखा के सर्वे में शामिल किया गया. इसका उद्देश्य यह था कि गरीबी रेखा को और अधिक यथार्थ से जोड़ा जा सके.
बता दें कि यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर ने साल 2009 में गरीबी रेखा के नए मानक तय किये..और इसी तेंदुलकर कमेटी के हवाले से योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि अगर कोई व्यक्ति चावल या गेहूं पर प्रति दिन 5 रु खर्च करता है तो वह गरीब की श्रेणी में नहीं आयेगा..उस समय सामान्य किस्म के चावल की कीमत करीब 20 रूपये किलो थी और गेंहू की कीमत 11 रूपये किलोग्राम थी..लेकिन कमेटी के मुताबिक प्रतिदिन करीब 2 रूपया सब्जी पर खर्च करने वालों को गरीब नहीं माना जाएगा. इस तरह की कई चौकाने वाली सिफारिशें तेंदुलकर कमेटी ने की थी. इन सब सिफारिशों से यूपीए सरकार न केवल सहमत थी बल्कि शपथ पत्र पर लिखकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया था.

जो मानक तेंदुलकर कमेटी ने तय किये थे उतनी अगर किसी व्यक्ति की आय हो तो वह कुपोषण का शिकार हो जाएगा..लेकिन भारत के मशहूर अर्थशास्त्री को किस आधार पर यह लगा कि उक्त मानक के ऊपर वाले लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर का व्यक्ति माना जाएगा और ऐसे लोगों को सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं दिया जाएगा..और इससे भी चौकाने वाली बात ये है कि ये सब आंकड़े ऐसे समय दिए गए थे जब खुद उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं एक अर्थ शास्त्री थे..

बहरहाल..यहां सोचने वाली बात एक और है..कि कांग्रेस जो पहले ही गरिबी रेखा तय कर चुंकि है…कांग्रेस के हिसाब से रोजाना 32 रुपये कमानेवाला शहरी और 26 रुपये कमानेवाला ग्रामीण गरीब नहीं, अमीर है..अब भला गांव या शहर में रोज इतनी रकम कौन नहीं कमाता? एक भिखारी भी भीख मांग कर इससे ज्यादा ही कमा लेता है, फिर अन्य लोगों की बात ही क्या?..और इस बार कांग्रेस के हिसाब से गरीबी रेखा के क्या मानक होंगे..ये आप खुद ही सोचिए..

वह कुपोषण का शिकार हो जाएगा..लेकिन भारत के मशहूर अर्थशास्त्री को किस आधार पर यह लगा कि उक्त मानक के ऊपर वाले लोगों को गरीबी रेखा के ऊपर का व्यक्ति माना जाएगा और ऐसे लोगों को सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं दिया जाएगा..और इससे भी चौकाने वाली बात ये है कि ये सब आंकड़े ऐसे समय दिए गए थे जब खुद उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं एक अर्थ शास्त्री थे..

बहरहाल..यहां सोचने वाली बात एक और है..कि कांग्रेस जो पहले ही गरिबी रेखा तय कर चुंकि है…कांग्रेस के हिसाब से रोजाना 32 रुपये कमानेवाला शहरी और 26 रुपये कमानेवाला ग्रामीण गरीब नहीं, अमीर है..अब भला गांव या शहर में रोज इतनी रकम कौन नहीं कमाता? एक भिखारी भी भीख मांग कर इससे ज्यादा ही कमा लेता है, फिर अन्य लोगों की बात ही क्या?..और इस बार कांग्रेस के हिसाब से गरीबी रेखा के क्या मानक होंगे..ये आप खुद ही सोचिए..