कैसे 131 चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने कुछ एकोनोमिस्ट्स और सोशल साइंटिस्ट के प्रोपगंडा का किया पर्दा फाश

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दोस्तों आज हम बात करने जा रहे हैं आरोपों और प्रत्यारोपों के बार में. दोनों ही संबंधित है भारत की अर्थव्यवस्था से और थोड़ी राजनीति से. सबसे पहले 108 economists ने सरकार द्वारा महत्वपूर्ण आकड़ों को गोल मोल करने का आरोप लगाया जिसके जवाब में 131 चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने मिलकर अपना एक रिसर्च पेपर निकाला. इस जवाब में CAs ने बताया की 108 economists के आरोपों में क्या कमी है. तो चलिए सीधे टॉपिक पर आते हैं.

हाल ही एक सौ आठ economists और सोशल साइंटिस्ट्स ने ऐसा आरोप लगाया कि भारत के आर्थिक आकड़ों को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है. उन्होंने ऐसे आरोप भी लगाये कि इन आकड़ों के पब्लिकेशन में राजनीतिक दखल अंदाजी की जा रही है. इन economists के मुताबिक पहले ये संस्थाएं जैसे CSO(जिसे सेंट्रल स्टैटिस्टिकल आर्गेनाइजेशन कहते हैं) और NSSO(नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाईजेशन) बहुत विश्वसनीय थीं लेकिन आज इनकी विश्वसनीयता कम हो गयी है.

इसके जवाब में CAs लिखते हैं कि सरकारी आकड़ों पर विवाद करना दुनिया भर के एक्सपर्ट्स के लिए एक रूटीन एक्सरसाइज है. लेकिन ये जो आरोप सरकार पर लगाया गया, पहले ऐसा कभी नहीं हुआ हैं. Cas के मुताबिक, इस बार कुछ गिने चुने एक्सपर्ट्स सामने आये हैं और उन्होंने तो पूरे डाटा को और भारत की श्रेष्ठतम संस्थाओं पर ही सवालिया निशान उठा दिया है.

ऐसे लोगों की ये अपील महज एक चालाकी लगती है क्योंकि जीडीपी के आकड़े, गरीबी कम होने के आकड़े, ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नस के आकड़े और इन आकड़ों में सुधार सब अंतर्राष्ट्रीय संस्था जैसे वर्ल्ड बैंक और IMF ने खुद दिए हैं.

इन economists ने एक और अपील ये की, कि जिस डाटा से सरकार को असुविधा हो सकती है वो डाटा सरकार छिपा रही है.

इन सवालों के जवाब में इन 131 CAs ने ये कहा है कि इन economists ने बहुत ही आसानी से विपक्ष का और मीडिया के रोल को ही इगनोर कर दिया. Cas आगे लिखते हैं इन economists के आरोप एकदम सामान्य हैं जिससे कोई भी ये गेस कर सकता है कि इन आरोपों के पीछे क्या मोटिवेशन है. ऐसा लगता है कि इन आरोपों के पीछे एक सोची समझी योजना है और ये ड्रामा भी अवार्ड वापसी, जो कि विधान सभा चुनावों के पहले किया गया था, उसी के तर्ज पर किया जा रहा है. संस्थाओं पर सवाल उठाया जा रहा है, हमारी आर्मी और वायु सेना को भी सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है जो देश हित में बिलकुल नहीं है.

1960 से 2014 के बीच भारत से दुनिया के तमाम देश जैसे ब्राज़ील, इंडोनेशिया, साउथ अफ्रीका आगे निकल गए. इन 54 सालों तक क्यों किसी economists ने सरकार से इस तरह के सवाल क्यों नहीं किए. लेकिन आज जब भारत विश्व कि सबसे तेज गति से बढ़ती इकॉनमी बन गयी है तब आकड़ों को लेकर ऐसा भ्रम क्यों उठाया जा रहा है. आगे CAs पूछते हैं कि क्या ये economists फॉरेन इन्वेस्टर्स के मन में डर पैदा करना चाहते हैं ताकि वे भारत में इन्वेस्ट न करें?

2008 से 2014 तक कुछ बैंकों ने बिना सोचे समझे लोन दिए गए. पुराने लोनों को चुकाने लिए नए लोन दिए गये. इस तरह कि चालाकी से बैंक के NPA को सरकार ने छिपाया. तब ये economists ने सरकार से आकड़े क्यों नहीं मांगे.

अपने लैटर में इन economists ने आरोपों पर कोई सबूत नहीं दिया. सिर्फ एक रेफेरेंस दिया गया जिसमें जीडीपी सीरीज का सरकार द्वारा संशोधन किया गया था और बेस इयर को 2004 कि जगह 2011 कर दिया गया और NSSO के डाटा कि पब्लिकेशन को लेकर सवाल उठाया गया.

ये सवाल उठाने से पहले ये economists शायद ये भूल गए ये बेस इयर्स हमेशा ही बदलते आये हैं. अगस्त 1967 में, जनवरी 1978 में, फ़रवरी 1988 में, 1999 में और 2006 में भी बेस इयर बदले गए हैं. अर्थव्यवस्था बहुत तेज़ी कि बदलती है. अर्थव्यवस्था के माप को सही करने के लिए हमेशा से और हर देश में ये बेस इयर बदले जाते रहे हैं. साथ ही इस बेस इयर को बदलने की methodology को यूपीए ने ही स्वीकृति दी थी. साथ ही इस बेस इयर कि वजह से 2013 और 2014 की आर्थिक गति बढ़ गयी थी.

इसके बाद पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम ने इस बेस इयर कि वजह से आये आकड़ों में बदलाव की भी तारीफ की थी.

ऐसा पहली बार हुआ है कि नई जीडीपी सीरीज यूनाइटेड नेशंस के एकाउंटिंग सिस्टम से मेल खाती है. साथ ही ये जीडीपी सीरीज unorganized सेक्टर को भी पहले से बेहतर तरीके से कवर करती है. आप खुद सोचिये कि यूनाइटेड नेशंस ने नई जीडीपी सीरीज पास कर दी वही इन economists ने इस सीरीज को फेल कर दिया.

Cas आगे कहते हैं कि इन economists ने आरोप लगाने से पहले और भी कई बातों को नज़रंदाज़ कर दिया जिससे भारत कि इकॉनमी पिछले पांच सालों में दसवीं रैंक से आज फ्रांस को पीछे छोड़ के पूरे विश्व में 6 सबसे बड़ी इकॉनमी बन गयी है. वे बातें हैं ये.

सबसे पहले, हाईवे 2014 में प्रतिदिन 11 किलोमीटर बनते थे जो आज बढ़कर 27 किलोमीटर प्रतिदिन हो गये हैं.

दूसरा, 2009 से 2014 तक नई रेलवे लाइन 7600 किलोमीटर तक बिछी थी वही 2014 से 2018 यानी चार साल में कुल 9500 किलोमीटर रेलवे लाइन बिछी.

तीसरा, ग्रामीण और शहरी घरों का रिकॉर्ड निर्माण आज हो रहा है.

चौथा, स्टार्ट अप में आज भारत कि रैंकिंग पूरे विश्व में तीसरे नंबर की है.

पाँचवा, नौकरियां और gst रिफार्म. Gst रिफार्म से हमारी इकॉनमी काफी हद तक फॉर्मल हुई है.

छठा, आधार और जन धन एकाउंट्स जिसके चलते आज दलाली और भ्रष्टाचार पर लगभग लगाम लग गयी है. अब सरकार की सब्सिडी या योजना की राशी लाभार्थी के सीधा बैंक अकाउंट में आती है.

सातवाँ, टैक्स कलेक्शन में बढ़ोतरी जिसके चलते आज पांच लाख रुपए तक कोई टैक्स नहीं देना पढ़ता.

आठवां,  इस ऑफ़ डूइंग बिज़नस में भारत कि रैंक 142 से 77, विदेशी निवेश में भारत ने आज चीन को भी पीछे कर दिया है. बैंक से लोन कि ब्याज दरें भी आज पहले से कम हैं जिससे व्यापार और निवेश भी बढ़ा है.

नवा, tractors कि खरीद में भी तेजी का उछाल आया है और इसका सीधा संबंध कृषि और इनफॉर्मल इकॉनमी से होता है.

अगर इसके बाद भी उनके मन में कोई सवाल है तो ये economists स्वतंत्र हैं वर्ल्ड बैंक के सामने अपने सवाल रखने के लिए. ऐसा इसीलिए क्योंकि ऊपर बताई बातों को खुद वर्ल्ड बैंक ने माना है.

इसके आगे CA लैटर में लिखते हैं कि इंडिपेंडेंट प्रोफेशनल्स को कोई डाउट नहीं है भारत कि प्रगति से, जो भारत ने बीते चार साल में की है. और हमें ऐसा लगता है कि भारत इसी तरह से भविष्य में भी प्रगति के रास्ते पर चलता रहेगा अगर राजनीति से प्रेरित ऐसी कोशिश जहाँ सरकार द्वारा दिए जाने वाले आकड़े और संस्थाओं पर ही सवालिया निशान उठा दिया जाये उनको सही तरह से counter किया जाये.

अंत में CA पूरे विश्व के professional से अपील करते हैं कि आप सब भी सामने आये और भारत कि सही तस्वीर को दिखाकर ऐसे बेबुनियाद राजनीति से प्रेरित आरोपों का खंडन करें.

अपनी स्वतंत्र राय होना बहुत ज़रूरी होता है लेकिन अपनी राय को एक परसेप्शन के ज़रिये जब कुछ लोग राजनीति को प्रभावित करने कि कोशिश करते हैं और देश को बरगलाते हैं तो ये गलत है और ये बात आम जनता को पता होनी चाहिए.

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