अब हिंदी भाषा लोगों को लग रहा बोझ

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हमारा देश भारत हमारे सभ्यता और संस्कृति के लिए पुरे विश्व में मशहूर है… और यहाँ कि भाषा और बोली तो सबसे ज्यादा हमारी तवज्जों बढाती है … भाषा और बोली में अंतर होता है.. लेकिन हमारे देश में कदम कदम पर ब्लोगों को बोली बदलती है… ये सब तो ठीक है लेकिन हमारे देश में आलग अलग प्रान्त में अलग अलग भाषा बोली जाति है.. वैसे तो हमारे देश की राज भाषा तो हिंदी है लेकिन फिर भी लोगों को हिंदी अच्छे से नहीं आती . और इससे आपत्ति भी है.

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अब देख लीजिये दक्षिण भारत में ही… दक्षिण भारत में हिन्दी भाषा का एक बार फिर विरोध होता दिख रहा है… इस मसले पर …. डीएमके अध्यक्ष स्टालिन ने अपने ट्वीट में लिखा, “तमिलों के खून में हिन्दी के लिए कोई जगह नहीं है, यदि हमारे राज्य के लोगों पर इसे थोपने की कोशिश की गई तो डीएमके इसे रोकने के लिए युद्ध करने को भी तैयार है…. नये चुने गए एमपी लोकसभा में इस बारे में अपनी आवाज उठाएंगे…”
दूसरी और फिल्म अभिनेता और मक्काल निधि मय्यम के नेता कमल हासन ने कहा कि हालांकि मैंने कई हिन्दी फिल्मों में अभिनय किया है, लेकिन मेरा मानना है कि हर किसी पर हिन्दी को थोपा नहीं जाना चाहिए। इसके साथ ही ट्‍विटर पर #StopHindiImposition भी ट्रेंड कर रहा है।

भाषा विवाद पर तमिलनाडु में संभावित विरोध प्रदर्शन के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि किसी के ऊपर कोई भाषा थोपने की सरकार की मंशा नहीं है. प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, “नयी शिक्षा नीति पर सिर्फ एक रिपोर्ट सौंपी गई है, सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है, सरकार ने इसे अभी देखा तक नहीं है इसलिए ये गलतफहमी फैल गई है और ये झूठ है.”
दरअसल बात कुछ ऐसी है कि नई शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में मातृभाषा के साथ 3 भारतीय भाषाओं का ज्ञान देने संबंधी प्रस्ताव पर दक्षिण के राज्यों में अभी से ही विरोध शुरू हो गया है…..यहां नई शिक्षा नीति को हिन्दी के थोपने से जोड़कर देखा जा रहा है…..

वैसे आपको बता दें कि प्रस्ताव के मुताबिक कम से कम 5वीं कक्षा और 8वीं कक्षा तक मातृभाषा में पढ़ाने का सुझाव दिया गया है…. साथ ही एक्सपर्ट्स पैनल ने सिलेबस में भारतीय ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने, मातृभाषा के साथ-साथ 3 भारतीय भाषाओं का ज्ञान देने, राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन करने और निजी स्कूलों द्वारा मनमानी फीस वृद्धि पर अंकुश लगाने सहित कई महत्वपूर्ण सिफारिशों को शामिल किया है…

इसका उद्देश्य छात्रों को मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को पढ़ने और लिखने में पारंगत करना है… इसके अतिरिक्त यदि कोई छात्र विदेशी भाषा पढ़ना चाहे तो वह चौथी भाषा के तौर पर इसे पढ़ सकता है…
वैसे अगर देखा जाए तो अपने देश में वहां कि भाषा सीखना कोई गलत बात तो नहीं. अगर स्कूलों में विदेशी भाषा सिखाई जाती है तो हिंदी पर क्या आपत्ति है सबको . खैर यह तो सियासी खेल है कब क्या किसको अच्छा लगे और कब क्या नहीं यह तो सत्ताधारी ही समझ सकते है.