अनुच्छेद 370 और 35A के बारे में पूरा लेखा जोखा

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पुलवामा आतंकी हमले को लेकर देशभर में आक्रोश है. इस हमले को लेकर आए दिन कोई न कोई बयान सामने आ रहा है. कोई पाकिस्तान से युद्ध करने की बात कर रहा है तो कोई आतंकियों का साथ देने वाले कश्मीरी लोगों को सबक सिखाने का सुझाव दे रहा है

14 फ़रवरी को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए हमले में 40 से ज़्यादा जवान मारे गए. इस हमले को लेकर देशभर में आक्रोश है और एक बार फिर संविधान के अनुच्छेद 370 को लेकर बहस तेज़ हो गई है..इन सब के बीच राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को खत्म करने की मांग की है। कल्याण सिंह ने कहा है कि अब समय आ गया है कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म करने पर विचार किया जाए, वहीं, विदेश राज्य मंत्री और पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने बयान दिया कि ”जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियों को एक साथ आना होगा. ”

लेकिन यहां सवाल ये है कि आखिर संविधान का अनुच्छेद 370 क्या है और क्यों इस पर इतना विवाद होता है. इसके साथ ही ये सवाल भी अहम है कि क्या जम्मू कश्मीर के लिए बने अनुच्छेद 370 को खत्म किया जा सकता है. तो चलिए सबसे पहले जानते है कि

क्या है धारा 370 ?

– भारतीय संविधान की धारा 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देता है.

– 1947 में विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह पहले स्वतंत्र रहना चाहते थे लेकिन  पाकिस्तान ने जब जम्मू-कश्मीर पर हमला किया तो राजा हरिसिंह भारत सरकार के पास मदद के लिए आए और कुछ शर्तों के साथ भारत में विलय के लिए सहमति जताई…

– जम्मू-कश्मीर में पहली अंतरिम सरकार बनाने वाले नेशनल कॉफ्रेंस के नेता शेख़ अब्दुल्ला ने भारतीय संविधान सभा से बाहर रहने की पेशकश की थी।

– इसके बाद भारतीय संविधान में धारा 370 का प्रावधान किया गया जिसके तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष अधिकार मिले हुए हैं।

– संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है. लेकिन राज्य के लिए अलग संविधान की मांग की गई.

– 1951 में राज्य को संविधान सभा को अलग से बुलाने की अनुमति दी गई। नवंबर, 1956 में राज्य के संविधान का काम पूरा हुआ और 26 जनवरी, 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया.

अनुच्छेद 370 के क्या मायने हैं?

संविधान केअनुच्छेद 370 दरअसल केंद्र से जम्मू-कश्मीर के रिश्तों की रूपरेखा है. प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने पांच महीनों की बातचीत के बाद अनुच्छेद 370 को संविधान में जोड़ा गया.

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के अनुसार, रक्षा, विदेश नीति और संचार मामलों को छोड़कर किसी अन्य मामले से जुड़ा क़ानून बनाने और लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की अनुमति चाहिए.

– इसी विशेष दर्जें के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बरख़ास्त करने का अधिकार नहीं है।

– 1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता। सूचना का अधिकार कानून भी यहां लागू नहीं होता।

– जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा 35ए का ज़िक्र है जो ‘ स्थायी निवासी’ प्रावधान का ज़िक्र करती है. ये अनुच्छेद 370 का हिस्सा भी है. जिसके मुताबिक जम्मू-कश्मीर में भारत के किसी अन्य राज्य का रहने वाला जमीन या किसी भी तरह की प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकता. धारा 35-ए जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा को राज्य में स्थायी निवास और विशेषाधिकारों को तय करने का अधिकार देती है। यह धारा 1954 में प्रेसीडेंशियल ऑर्डर के जरिए अमल में आई थी।

– भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है। वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती। इसके साथ ही 370 के तहत देश के राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर में आर्थिक आपालकाल नहीं लगा सकते. राज्य में आपातकाल सिर्फ़ दूसरे देशों से युद्ध की स्थिति में ही लगाया जा सकता है.

इससे साफ़ है कि राष्ट्रपति राज्य में अशांति, हिंसा की गतिविधियां होने पर आपातकाल स्वयं नहीं लगा सकते बल्कि ये तभी संभव है जब राज्य की ओर से ये सिफ़ारिश की जाएं.

अनुच्छेद 370 की बड़ी बातें जो जानना आपको लिए बेहद जरूरी हैं

– जम्मू-कश्मीर का झंडा अलग होता है। 

– जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है। 

– जम्मू-कश्मीर में भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं है। यहां भारत की सर्वोच्च अदालत के आदेश मान्य नहीं होते। 

– जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर ले तो उस महिला की जम्मू-कश्मीर की नागरिकता खत्म हो जाएगी। 

– यदि कोई कश्मीरी महिला पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से शादी करती है, तो उसके पति को भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जाती है। 

– धारा 370 के कारण कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता मिल जाती है। 
– जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 साल होता है। जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 साल होता है।

– जम्मू-कश्मीर में महिलाओं पर शरियत कानून लागू है।

– जम्मू-कश्मीर में पंचायत के पास कोई अधिकार नहीं है।

 – धारा 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में सूचना का अधिकार यानि की आरटीआई लागू नहीं होता।

 – जम्मू-कश्मीर में शिक्षा का अधिकार यानि की आरटीई लागू नहीं होता है। यहां सीएजी (CAG) भी लागू नहीं है।

– कश्मीर में अल्पसंख्यक हिन्दूओं और सिखों को 16 फीसदी आरक्षण नहीं मिलता है।

क्या 370 को संविधान से हटा पाना संभव है?

जम्मू-कश्मीर राज्य से धारा 370 को हटा पाना असंभव प्रतीत होता है..क्योंकि बिना जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा की सहमति के इसको हटा पाना असंभव है और जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा ऐसा करने को कभी सहमत नहीं होगी.. दरअसल, पिछले क़ई दशक से सत्ता का सुख प्राप्त करने वाले ये लोग इसे ख़त्म करना तो दूर इस पर बात करने से भी परहेज करते हैं। चर्चा और समीक्षा की मांग सिरे से ख़ारिज़ करते हैं। सीएम मेहबूबा मुफ़्ती हो या उमर अब्दुल्ला ये लोग धमकी देते हैं कि अगर यह हटा तो कश्मीर भारत से अलग हो जाएगा।

इस बात में कोई दो मत नहीं है कि अब्दूल्ला और मुफ्ती जैसे नेता और पीडीपी और नैशनल कॉन्फ्रेंस जैसी पार्टियां अपने मतलब के लिए इस विकास-विरोधी प्रावधान को खत्म नहीं करना चाहते है, क्योंकि यह धारा उनकी सियासत को बनाए रखने का कारगर टूल बन गया है।