न्यूज़ चैनलों से नाराज़ कुमारस्वामी लाना चाहते हैं नया क़ानून

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आजकल जेडीएस नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी हास्य-व्यंग्य पर रोक लगाने की बात कर रहे हैं. वो समाचार चैनलों पर आने वाले हास्य-व्यंग्य के कार्यक्रमों से खासे नाराज़ नज़र आ रहे हैं. लेकिन शायद उन्हें ये मालूम नहीं है कि राजनीति और व्यंग्य का साथ बड़ा ही पुराना है.

कितना पुराना ये हमें ठीक-ठीक तो नहीं पता लेकिन ये साथ शायद तब से है जब से राजनीति पर लिखने की शुरुआत हुई होगी. और राजनीति पर लिखने की शुरुआत शायद तब से ही हो गई होगी जबसे राजनीति की शुरुआत हो गई होगी.

नेताओं और उनकी राजनीति ने देश को कुछ और दिया हो या ना दिया हो पर हंसी-मज़ाक का मसाला खूब दिया है. यही वज़ह है कि व्यंग्य करने वाले कलाकार ना राजनीति को बक्शते हैं और ना ही राजनेताओं को. वो पक्ष पर भी व्यंग्य करते हैं और प्रतिपक्ष पर भी.

लेकिन शायद ऐसी ही किसी घटना पर कुमारस्वामी जी भड़के हुए हैं. उनका कहना है कि समाचार चैनल व्यग्य के ज़रिये कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन को लेकर संदेह पैदा कर रहे हैं. यही वज़ह है कि एचडी कुमारस्वामी ने रविवार यानी 19 मई को मैसूर की एक सार्वजनिक बैठक के दौरान समाचार चैनलों के खिलाफ अपनी यह नाराजगी ज़ाहिर की. उन्होंने सभी समाचार चैनलों पर निशाना साधते हुए कहा,

 ‘आप (मीडिया) हमारे नाम का गलत इस्तेमाल करके किसकी मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. मैं एक कानून लाने के बारे में सोच रहा हूं. आप हम राजनेताओं को क्या समझते हैं? आप सोचते हैं कि हम बेरोजगार हैं? क्या हम आपको कार्टून कैरेक्टर जैसे नज़र आते हैं? किसने आपको हर चीज को मजाकिया तरीके से दिखाने का अधिकार दिया?’

कुमारस्वामी मीडिया के हाथ बांधने के लिए क़ानून लाने की बात कर रहे हैं. वो इन्डायरेक्टली बात कर रहे हैं मीडिया के हाथ बाँध देने की. उनको व्यंग्य करने से रोक देने की. लेकिन वो शायद ये बात भूल रहे हैं कि वो व्यंग्य, कार्टून और कटाक्ष ही तो हैं जो पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों की खामियों को उजागर करते हैं.

ये वो लोग होते हैं जो राजनेताओं को जगाते हैं, जनता को जगाते हैं और बदलाव को हवा देते हैं. और फिर ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ और ‘आज़ाद मीडिया’ जैसी कुछ चीज़ें हुआ करती थीं अभी कुछ दिनों पहले तक ही. इन चीज़ों पर बहुत बवाल भी किया जाता था और बहुत सवाल भी उठाये जाते थे, लेकिन अब उसी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर आप रोक लगाने की बात कर रहे हैं. उसी आज़ाद मीडिया को बंधन में बाँध देने की बात कर रहे हैं, क्यों?

इस तरह की चीजों पर लगाम लगाना ठीक नहीं होगा और अगर शुरुआत से ऐसा ही हो रहा होता तो क्या होता शरद जोशी जी और परसाई जी जैसे प्रखर व्यंग्यकारों का? क्या करते भारतीय कार्टून्स के पितामह कहे जाने वाले केशव शंकर पिल्लई उर्फ़ शंकर जी और आर के लक्षमण, कुट्टी मेनन, रंगा, आबू अब्राहम, मारियो मिरांडा जैसे कार्टूनिस्ट?

राजनीति और राजनेता पर व्यंग्य तो तब भी किये ही जाते थे जब हर बात लिखी नहीं जाती थी. ये वो वक़्त था जब राजा-महाराजाओं का दौर हुआ करता था और करने वाले सामने से बोलकर व्यंग्य और कटाक्ष किया करते थे. कुछ पुरानी कहानियों को पढ़िये तो ऐसा पता लगता है कि ये विधा तो राजा-महाराजाओं के दौर से चली आ रही है.

अगर ऐसा ना होता तो अकबर-बीरबल की तीखी नोक-झोंक के किस्से हमें सुनने को ही कहा मिलते? कहाँ सुनने को मिलते मुल्ला नसरुद्दीन के किस्से और तेनालीरामन की कहानियां? और फिर इससे और पुराने वक़्त की तरफ चलते हुए पौराणिक काल में पहुँचा जाए तो पता चलता है कि तीनों लोकों की खबर रखने वाले नारद जी में भी एक प्रखर व्यंग्यकार ही थे. वो शायद अबतक के इतहास के सबसे बड़े व्यंग्यकार कहे जायेंगे जो साक्षात देवताओं और ईश्वर की गलतियों पर भी व्यंग्य कर आते थे.

कुल मिलाकर जब वेद-पुराणों के काल में हास्य-व्यंग्य पर रोक नहीं लगाई गई, राजशाही में नहीं लगाई गई तो फिर अब लोकतंत्र में एचडी कुमारस्वामी का मीडिया पर लगाम लगाने की बात कहना कितना सही है और कितना गलत आप ही फैसला कीजिये?

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