फिर रेल पटरियों पर बैठ गए गुर्जर..

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ये पहली बार नहीं है जब गुर्जरों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है या पहली बार रेलवे की पटरियों पर बैठे हो.. और ना ही आरक्षण को लेकर इनकी आवाजें पहली बार बुलंद हुई हैं.. फर्क ये है कि कुछ वक़्त यह खामोश बैठे रहे थे उन लुभावने वादों के पूरे होने के इंतज़ार में जो तब की केंद्र सरकार इनसे कर गई थी.. पर उसने वो वादे पूरे नहीं किये.. खैर ये तो कांग्रेस अक्सर ही करती है… लेकिन आज हम बात कांग्रेस की नहीं गुर्ज़र आन्दोलन को लेकर करेंगे कि वो कौनसी मांगे हैं जिनके कारण यह रेल पटरियों और सड़कों पर उतर आते हैं

  • यह आन्दोलन सबसे पहली बार 3 दिसंबर 2006 को आरक्षण की मांग को लेकर हिंडौन रेलवे स्टेशन पर हुआ.
  • 3 अक्टूबर 2006 को गुर्जर टाइगर फोर्स ने आरक्षण के लिए लड़ाई लड़ी। 
  • 29 मई 2007 को पोटली में चक्का जाम किया। इस दौरान हिंसा में एक पुलिसकर्मी सहित 5 लोगों की मौत हुई.
  • 23 जून 2007 को आरक्षण के राजस्थान के पुष्कर में महापंचायत आयोजित की गई।
  • 27 सितंबर 2007 को गुर्जर दूधियों ने विरोध में दूध बेचना ही बंद कर दिया था।  
  • 2 अक्टूबर 2007 को कर्नल बैंसला ने भरतपुर में जेल भरो आंदोलन का आह्वान किया था। किरोड़ी सिंह बैंसला इस आन्दोलन के प्रमुख हैं
  • 5 अक्टूबर 2007 को डुमरिया और फतेहसिंगपुरा के बीच रेलवे ट्रैक हटा दिया गया था।
  • 2 मार्च 2008 को खेड़ली में महापंचायत की गई। 
  • 23 मई 2008 को पीलूपुरा में रेल रोको आंदोलन किया गया। इसके बाद कुछ गुर्जरों ने रेल पटरी भी उखाड़ने की कोशिश की थी। पूरी तरह से रेल यातायात बाधित हो गया था। इस दौरान पुलिस ने 16 अलग-अलग स्थानों पर गोलीबारी की। यह प्रदर्शन दौसा जिले के सिकंदरा में हिंसक हो गया था। जिसके बाद पुलिस को मजबूर होना पड़ा था। इस दौरान 20 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी। जबकि एक पुलिसकर्मी भी घायल हो गया था।  
  • 24 मई 2008 को राजस्थान सरकार ने कर्नल बैंसला के नेतृत्व में गुर्जरों के नेताओं से बातचीत के लिए निमंत्रण दिया था।
  • 9 जून 2008 को गुर्जर प्रतिनिधियों और सरकार के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता हुई। जयपुर में 13 और 14 जून, 2008 को दूसरे और तीसरे दौर की वार्ता हुई। कर्नल बैंसला 16 और 17 जून, 2008 को चौथे और पांचवें दौर की बातचीत में शामिल हुए थे।
  • 22 अगस्त 2008 को गुर्जर महापंचायत ने विधानसभा में पारित आरक्षण विधेयक को लागू करने का आह्वान किया, जिसमें गुर्जरों, गादिया लुहारों, रेबारी और बंजारों को 5% आरक्षण और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को 14% आरक्षण दिया गया।
  • 10 जून 2009 को महारवार महापंचायत ने सरकार को अल्टीमेटम दिया।
  • 26 जुलाई 2009 को कर्नल बैंसला के नेतृत्व में टोडाभीम के पेंचला गांव में महापंचायत का आयोजन किया गया।
  • 26 मार्च 2010 को कर्नल बैंसला ने विशेष आरक्षण पर राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा किए बिना 80,000 पदों पर भर्ती के लिए सरकार के निर्णय का विरोध करने के लिए पुष्कर में महापड़ाव की घोषणा की।
  • 5 मई 2010 को कर्नल बैंसला सरकार के साथ समझौते करने पहुंचे। सरकार 50% आरक्षण कोटे के भीतर विशेष पिछड़े वर्ग की श्रेणी में गुर्जरों को 1% आरक्षण देने पर सहमत हुए जबकि शेष 4% आरक्षण को अदालत के फैसले तक रोक दिया गया था।

गुर्जर आन्दोलन के प्रमुख किरोड़ी सिंह बैंसला का कहना है कि उन्हें सरकार ने जो तय वक़्त सीमा दी थी वो ख़त्म हो गई है इसलिए उनको आन्दोलन करना पड रहा है  और रेलवे ट्रैक पर बैठना पड रहा है, बैंसला ने कहा है कि वो इस आन्दोलन को शांतिपूर्ण तरीके से करेंगे जिसमें वो खुद आगे रहकर नेतृत्व करेंगे और युवाओं को पीछे रखेंगे. खैर आन्दोलन को शांतिपूर्ण रखने का वादा उन्होंने पहले भी किया था लेकिन आन्दोलन हिंसक होता रहा था और उसमें तकरीबन 69 जानें भी गई थी और काफी आर्थिक नुकसान भी हुआ था उम्मीद है कि यह सब दुबारा ना हो और गुर्ज़र आरक्षण को लेकर सरकार का जो भी फैसला हो वो जल्द आये.

NOTE : THESE FACTS AND DATA HAS BEEN COLLECTED FROM VARIOUS NEWS AGENCIES.