भोपाल गैस त्रासदी : आज भी तड़प रहे है यहाँ के लोग, आने वाली पीढ़ी में दिख रहे हैं सबूत

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चिल्लाते लोग, खांसते लोग, भागते लोग, अपनों को बचाते लोग, अपनी जान गंवाते लोग… बस छटपटा रहे थे. हर कोई अहसाय था. किसी के आँख में जलन थी, किसी की सांस फूल रही थी. किसी के सीने में दर्द उठना शुरू हुआ था तो कोई मौत की नींद सो चुका था. आप सिर्फ अंदाजा लगा सकते है कि वो माहौला कैसा रहा होगा लेकिन कईयों ने इसे झेला, सहा है और जीया है. जी हाँ हम बात कर रहे है.. भोपाल गैस त्रासदी की.

35 साल पहले भोपाल में आज के दिन चीख पुकार मची थी, क्योंकि यूनियन कार्बाइड संयंत्र से रिसी जहरीली गैस ‘मिथाइल आइसो साइनाइड (मिक)’ ने हजारों लोगों को एक ही रात में मौत की नींद सुला दिया था, कईयों को जिंदगीभर के लिए विकलांग कर दिया, कईयों की आंखे छीन ली तो कईयों का पूरा परिवार!

जब लोग चीखते, चिल्लाते अस्पताल पहुँचने लगे तो अस्पताल में लोगों के खड़े होने की भी जगह नही पहुंची, इतनी बड़ी संख्या में मरीजों को देखकर डॉक्टर भी परेशान हो गये थे. डॉक्टर ये समझ ही नही आ रहे थे कि आखिर इन लोगों को प्रॉब्लम क्या हुई है? दरअसल उन्हें बिलकुल अंदाजा नही था कि ये यूनियन कार्बाइड संयंत्र से रिसी जहरीली गैस ‘मिथाइल आइसो साइनाइड का रिएक्शन है. बस जिसको जो समस्या हो रही थी उसे उसकी दवा दे दी जा रही थी.

हालाँकि कुछ ही देर में इतने लोग प्रभावित हो गये कि शहर में लाशें ही लाशे नजर आने लगी. पूरा शहर लाशों से पट गया. परिजन लाशों को छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे. कई लोग सोते सोते बस सोते ही रह गये. उनकी सुबह ही नही हुई. अस्पताल में लाशों की वजह जगह नही बची थी. सड़के लाशों से भरी हुई थी. पोस्टमार्टम करने के लिए डॉक्टरों की कमी पड़ गयी. अंत में ये फैसला लिया गया कि चार पांच में किसी एक लाश का पोस्टमार्टम किया जायेगा. बाकी की रिपोर्ट उसी आधार पर बना दी जायेगी.. अधिकतर लाशों के परिजन लापता थे.

अंतिम संस्कार के लिये कबरिस्तान और और श्मशान कम पड़ गये थे. लाशों को जलाने के लिए लकड़ियाँ खत्म हो चुकी थी, दफनाने के लिए जगह नही बची थी. सोचिये ये हालात थे इंसानों के तो बेजुबान जानवारों के हालात कितने बेकार रहे होंगे. कुछ जानवर तो बंधे बंधे ही मर गये, कुछ इधर उधर भटकते मर गये. हालात ये हो गये थे कि जानवारों के मरने की संख्या भी इंसानों से कम नही थी लेकिन उनके मरने पर उनके लिए चिल्लाने वाला नही थी कोई रोने वाला था..क्योंकि यहाँ तो सबको अपनी जान बचाने के लाले पड़े थे. हालात इतने बदतर की किसी को कुछ समझ नही आ रहा था कि करें तो क्या करें.

कम्पनी द्वारा बरती गयी एक लापरवाही की वजह से हाजारों जानें चली गयी.कई लापरवाहियां कंपनी द्वारा बरती गयीं. कम्पनी ने कहा कि किसी जानकर वर्कर ने जानबूझकर पानी को टैकर के पास पहुंचने दिए और फिर रिएक्शन हुआ और गैस के टैंकर में ब्लास्ट हुआ. एक हफ्ते के बाद भी हजारों लोग मर रहे थे. हजारों की संख्या में लोग अस्पताल में भर्ती थे.

हालाँकि यूनियन कार्बाइड के मालिक एंडरसन मुंबई के हवाई अड्डे पर उतरता है. उसका स्वागत किया जाता है इसके बाद वो भोपाल जाता है. यहाँ से इसे सीधा कम्पनी के गेस्ट हाउस ले जाया जाता है. यहाँ उसे गिरफ्तार करने के बाद बताई जाती है. इसके बाद उस समय एसपी ने उससे अनुरोध करते हुए फ़ोन का उपयोग करने, बाहर जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. (हालाँकि कहा जाता है कि वो गेस्ट हाउस के फ़ोन से अपने राजनीति से जुड़े दोस्तों से बात की थी और भारत पर उसे छुडाने के लिए दबाव बनाया था.) इसके बाद एंडरसन को रिहा कर उसे एक फ्लाइट से दिल्ली लाया जाता है. इसके बाद वो अमेरिका के लिए रवाना हो गया.

हजारों लोगों की मौतों का जिम्मेदार एंडरसन के अमेरिका भागने के पीछे भी बड़ी राजनीति बताई जाती है. 2013में एंडरसन की मौत हो गयी लेकिन भोपाल में आज भी इस घटना के सबूत आज भी मौजूद है. इस गैस के रिसाव से पीड़ित लोगों के परिवार की आने वाली पीढ़ी में भी भोपाल गैस त्रासदी के सबूत दिख रहे है और ना जाने कब देखे जाते रहेंगे. गैस कांड प्रभावित बस्तियों में अब भी पीड़ितों की भरमार है. कहीं अपाहिज नजर आते हैं तो कहीं हांफते, घिसटते लोग. विधवाओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. बीमार बढ़ रहे हैं. इनके लिए अस्पताल खोले गये है लेकिन हालात ये है कि अभी भी जरूरी चीजे उपलब्ध नही हैं.
इससे अधिक शर्मिंदगी की बात क्या हो सकती है कि हजारों लोगों का हत्यारा एंडरसन भोपाल से दिल्ली और दिल्ली से फिर अमेरिका भाग जाए,( कहा जाता है कि उसे भगाया गय, वरना ऐसे वो भाग ही नही सकता था).

3 दिसम्बर का दिन कई परिवार समेत भोपाल के साथ साथ पूरे देश के लिए एक काला दिन बन गया.