दुल्हे ने कहा “उठ जायें”, दुल्हन ने कहा “उठो और दफा हो जाओ”

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फिल्म लज्जा का वो सीन तो आपको याद ही होगा जिसमें दुल्हन बनी महिमा चौधरी मंडप में बैठी हैं और उनके ससुराल वाले दहेज़ की मांग कर देते हैं और बार बार धमकी देते हैं बिना शादी किये उठ जायें.. उठ जाएँ..

बाप की आँखों में आसूं और बेबसी देख बेटी घूंघट खोलती है और कहती है उठ जाओ और निकलो यहाँ से.. दुल्हन का ऐसा करना होता है और फिल्म थिएटर में तालियाँ बजने लग जाती हैं..

खैर यह तो फिल्म थी मगर यही कहानी हमें असलियत में देखने को मिली और इस बार हीरोइन महिमा नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के दतिया की शिवांगी अग्रवाल थी..  शिवांगी इंजीनियर है.. एमबीए भी कर रखा है.. वो पैरामाउंट कम्पनी में जॉब भी करती है.. बच्चों की पढाई पूरी करा.. उन्हें अपने पैरों पे खड़ा देख माँ बाप फिर उन्हें शादी के बंधन में बाँध देते हैं.. और यही शिवांगी के साथ भी हुआ.. एक लड़का तलाश कर 15 फरवरी को लडकी की शादी तय कर दी गई.. उसकी शादी ग्वालियर के फालका बाजार के रहने वाले प्रतीक अग्रवाल से सेट हुई. प्रतीक की ग्वालियर में ही सेनेटरी शॉप है.

रिश्ता तय होने के बाद शिवांगी के घरवालों ने लड़केवालों को 5 लाख रुपए दिए. ताकि वो अपने घर पर लड़की के लिए सारा सामान खरीद सकें. जैसे अलमारी, पलंग, वगैरह-वगैरह. लेकिन प्रतीक के घरवालों ने ऐसा कुछ नहीं किया. पांच लाख कैश का कोई इस्तेमाल नहीं किया. किसी तरह की कोई तैयारी नई बहू के लिए प्रतीक के घर पर नहीं की गई. शिवांगी ने जब इस पर प्रतीक से सवाल किया, तब उसे जवाब मिला कि जब वो आ जाएगी, तब सामान खरीद लिया जाएगा.

धीरे धीरे शादी का दिन भी आ गया शादी की बढ़िया तैयारी की गई.. किसी भी तरह की कोई कमी ना रहे इसके लिए सारा इंतज़ाम किया गया.. 15 फरवरी को लडकी की शादी भी हो जाती है लेकिन विदाई नहीं होती.. क्यूँ.. ?? क्यूंकि लड़केवालों ने शिवागी का सूटकेस खोलकर जेवर, साड़ी और मायकेवालों ने उसे क्या-क्या सामान दिया है, ये देखने की मांग भी रख दी. कहा कि संदूक खोलकर दिखाया जाए

और इसके बाद शिवांगी फैसला लेती है कि वो इस लड़के के साथ नहीं जाएगी.. बेशक फेरे पड गए हो.. बेशक उसकी मांग में सिन्दूर भर दिया गया हो

शिवांगी ने फिर ससुराल जाने से मना कर दिया.. मामले पर विवाद बढा और बढ़ा कि विवाद शान्त करने के लिए पुलिस को आना पड़ा और दूल्हे को बिना दुल्हन के ही जाना पड़ा, हालाँकि लडकी और उसके घरवालों ने लड़के वालों के खिलाफ FIR दर्ज करने से मना कर दिया, लेकिन हमें यह ख़ुशी है शिवांगी ने दूल्हे के साथ ना जाने का फैसला लिया और उसपर अटल भी रही और उसका यह फैसला सही भी है.. आज ये इतनी मांग कर रहे हैं.. कल किसी और नई मांग के लिए उसे प्रताड़ित करते.. उसका शोषण करते.. उसे मारते पीटते या उसे जला भी सकते थे

वो रिश्ता जिसकी नींव प्यार नहीं बल्कि पैसा है वो कभी मुकम्मल हो भी नहीं सकता.. कभी वक़्त था जब माँ बाप अपनी  बच्चियों को अपनी सामर्थ्य अनुसार कुछ भेंट देते थे जिससे नव युगल आसानी से अपने जीवन की शुरुआत करते थे.. पर वक़्त बदलने के साथ साथ ये प्रथा कुप्रथा में बदल गई.. दुल्हनें दहेज़ के लिए जलने लग गई.. वो खुदकुशी करने लग गई.. माँ बाप अपनी बेटी भी देते हैं.. और जमीन जायदाद तक लगा देते हैं पर लालची लोगों का लालच खत्म नहीं होता.. ऐसे लोगों को अपनी बेटियाँ देने से बचे.. जो हिम्मत शिवांगी ने दिखाई वो बाकि लड़कियों के लिए भी मिसाल है आज जरुरत है कि लड़कियां इस प्रथा के खिलाफ खुद आवाज उठाएं और जहाँ दहेज़ की मांग हो वहां माँ-बाप अपनी बच्चियों की शादी ना कराएं.. उन्हें पढाएं-लिखायें.. अपने पैरों पर खड़ा कराएं.. उन्हें आत्म-निर्भर बनाएं.. उन्हें स्वभिमानी बनाएं.. उनका आत्मविश्वास जगाएं.. तभी दहेज़ जैसी कुप्रथा का अंत संभव होगा