पूर्व सेनाध्यक्ष ने किया खुलासा, सियाचिन ग्लेशियर को लेकर पाकिस्तान से समझौता करना चाहते थे मनमोहन सिंह

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भारत और चीन के बीच जारी विवाद के बीच एक बड़ा खुलासा हुआ है. खुलासा ये कि पूर्व पीएम मनमोहन सिंह सियाचिन को लेकर पाकिस्तान से समझौता करना चाहते थे. ये खुलासा किया है पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल जेजे सिंह ने. जनरल जेजे सिंह नवम्बर 2004 से जनवरी 2005 तक थल सेनाध्यक्ष रहे. भारत और चीन के मौजूदा तनाव के दरमियान उन्होंने ये खुलासा कर सबको चौंका दिया कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दुनिया की सबसे ऊँची युद्धभूमि सियाचिन ग्लेशियर से भारतीय सेना को हटाना चाहते थे लेकिन सेना इसके सख्त खिलाफ थी.

सियाचिन ग्लेशियर को लेकर पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की पाकिस्तान के साथ समझौते की कोशिश का खुलासा उस वक़्त हुआ है जब कांग्रेस और कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी पीएम नरेंद्र मोदी पर चीन के आगे सरेंडर करने का आरोप लगा रहे हैं. यही नहीं, 10 सालों तक एक्सीडेंटल पीएम रहे मनमोहन सिंह भी पीएम मोदी को सलाह दे रहे हैं कि उन्हें सोच समझ कर बोलना चाहिए. 

जनरल जेजे सिंह के अनुसार तत्कालीन UPA सरकार पर शायद अमेरिका का दवाब था. इसलिए वो सियाचिन से सेना हटा कर उसे शांति का पहाड़ बनाना चाहते थे. लेकिन सियाचिन के सामरिक महत्त्व को देखते हुए सेना और रक्षा विशेषज्ञ सरकार के इस कदम के विरोध में थे. समुद्र तल से 21,000 फुट की उंचाई पर स्थित सियाचिन ग्लेशियर 76 किमी लंबा है. यह इंदिरा कॉल से शुरू होता है और नीचे श्योक नदी से मिलता है. इसकी ऊँचाई इसके स्रोत इंदिरा कोल पर लगभग 5,753 मीटर और अंतिम छोर पर 3,620 मीटर है. यह उत्तर और इसके पूर्व में काराकोरम पर्वत श्रृंखला से घिरा हुआ है. पश्चिम में, यह साल्टोरो रिज से घिरा हुआ है. साल्टोरो रिज भारत और पाकिस्तान के बीच LAC है.

तारीख 13 जून, 2005, मनमोहन सिंह के नेतृत्त्व में UPA सरकार का पहला कार्यकाल. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सियाचिन बेस कैंप पर जवानों को संबोधित करते हुए कहा था, ‘सियाचिन को सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र माना जाता है जहां जिंदा रहना मुश्किल है. अब समय आ गया है कि हम संघर्ष के इस बिंदु को अमन के प्रतीक में बदलने के प्रयास करें.’ सरकारी सूत्रों के अनुसार सियाचिन से सेना हटाने की सोच मनमोहन सिंह के दिमाग की ही उपज थी. वो एक्सीडेंटल पीएम बने थे. सरकार का रिमोट कंट्रोल UPA की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी के हाथों में था. ऐसे में मनमोहन सिंह खुद को शांति के मसीहा के तौर पर स्थापित करना चाहते थे.

30 अप्रैल 2012, रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने लोकसभा में बताया  कि सरकार सियाचिन को सेनामुक्त करने के लिए पाकिस्तान के साथ सार्थक संवाद करने में जुटी है. इसकी तैयारी के लिए साल के अंत तक दोनों देशों के रक्षा सचिव इस्लामाबाद में मुलाकात करेंगे. इसके खिलाफ विरोध के स्वर उभरे. सेना के अन्दर से भी और रक्षा विशषज्ञों की तरफ से भी. 8 मई 2012 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2 मई, 2012 की सुबह दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय में सैन्य अभियान निदेशालय के अफसरों ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्यों के लिए एक ब्रीफिंग रखी. इसमें सियाचिन ग्लेशियर को सेनामुक्त किए जाने के सामरिक नुकसान पर एक प्रजेंटेशन दिया गया. अब ये अफसर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी ब्रीफ करना चाह रहे हैं. दरअसल सेना नहीं चाहती थी कि जिस तरह से अक्साई चिन को उन्होंने गंवाया उसी तरह सियाचिन को भी थाली में सजा कर पाकिस्तान को दे दिया जाए. क्योंकि सियाचिन पर भारतीय सेना बढ़त की स्थिति में शुरू से ही है.

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी पी मलिक ने सवाल उठाये कि इस बात की क्या गारंटी है कि सियाचिन को सेना मुक्त करने के दौरान भारतीय सेना ऊंचाई वाले जिन इलाकों को छोड़ेगी उसे पाकिस्तान कब्जायेगा नहीं? पूर्व विदेश सचिव कँवल सिब्बल ने कहा था साल्टोरो रिज की उंचाई से भारतीय सेना उत्तरी इलाकों और चीन को बतौर तोहफा में दी गई POK के हिस्से पर नज़र रखती है. अगर वहां से सेना हटी तो भारत एक रणनीतिक बढ़त गंवा देगा.