गोरखपुर को शिकागो बना देने वाले डॉन की कहानी

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11 जनवरी साल 1982, मुंबई के वडाला कॉलेज में हुआ था आज़ाद भारत का पहला पुलिस एनकाउंटर हुआ. ये एनकाउंटर था गैंगस्टर मान्या सुरवे का. मुंबई पुलिस की एक ख़ास टीम ने मान्या सुरवे के शरीर में छह सरकारी गोलियां भर दी थीं. मान्या सुरवे के इस एनकाउंटर को लेकर मुम्बई पुलिस पर बहुत से सवाल भी उठाये गए. बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया.

लेकन पुलिस को छका देने वाला एक एनकाउंटर जो सबसे ज्यादा याद किया जाता है, वो था उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला का एनकाउंटर. श्रीप्रकाश शुक्ला इतना कुख्यात गैंगस्टर था कि पूरा उत्तर प्रदेश उससे थर-थर कांपता था. एक वक़्त था जब उसने उत्तर प्रदेश पुलिस की नाक में दम कर दिया था.

1973 उत्तरप्रदेश… गोरखपुर के मामखोर गाँव में एक स्कूल मास्टर राम शम्भू शुक्ला के घर एक बेटे का जन्म हुआ. खुशी के माहौल के बीच इस बच्चे का नाम रखा गया श्रीप्रकाश. ये बच्चा बस थोड़ा सा ही बड़ा हुआ और बच्चे से लड़का बना तो इसके सपने बदलने लगे.

एक चर्चित मीडिया संस्थान जिसने श्रीप्रकाश शुक्ला के बचपन के दोस्त से बात की, उसकी रिपोर्ट्स बताती हैं कि महज़ 13 साल की उम्र में ही उसके अन्दर से मौत की दहशत मानो गायब सी हो गई. 9वीं में ही था तब गोरखपुर की सड़कों पर इतनी तेज़ बाइक दौड़ाता था कि ऐसा लगता जैसे उड़ जाना चाहता है. उसे बाइक चलाते देख ऐसा मालूम होता जैसे सड़क पर चलने वाले लोगों से दुश्मनी मानकर बैठा हो और सबको चीरकर आगे बढ़ना चाहता हो.

  9वीं में ही था वो जब अपने अपने दोस्तों से कहा करता था कि,

“ देखना एकदिन मैं गोरखपुर की इन गलियों में एके-47 लहराऊंगा.”

ये वो उम्र थी, वो दौर था जब उसके साथी एके-47 के बारे में जानते तक ना थे. क्योंकि ये वो उम्र होती है जब लड़के खेल-कूद की बातें किया करते हैं, लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ला उस उम्र में भी हथियारों के लिए अपनी मोहब्बत दिखाया करता था. वो राज करना चाहता था गोरखपुर पर.

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इंटर कॉलेज में था तो दोस्तों के बीच उसका नाम ‘बाबा’ पड़ गया था. अपनी दोस्ती के लिए वो किसी से भी टकरा जाने को तैयार रहता था. किसी से ज़रा सी बात हो जाती तो श्रीप्रकाश झट से हाथ में ईंट का अद्धा उठा लेता, और बात थोड़ी सी और बढ़ती तो उसी अद्धे से सामने वाले की खोपड़ी खोलने में भी देर ना करता. आलम ये हो गया था कि इंटर कॉलेज के लड़के उससे खौफ़ खाने लगे थे.

उम्र के साथ ही अच्छा-खासा डील–डौल हो गया था उसका. खुराक भी किसी से कम नहीं थी. यही वज़ह रही कि लड़का पहलवानी करने करने लगा. लेकिन नसों में जो गुंडई बह रही थी वो अब भी उसका साथ नहीं छोड़ रही थी.

एक दूसरा गुंडा था उन दिनों गोरखपुर में राकेश तिवारी. इस राकेश तिवारी की इलाके में खासी धौंस हुआ करती थी. वो जब किसी गली से गुज़रता तो उसकी उम्र के लड़के उसे नमस्ते बोला करते थे. लेकिन इसी धौंस के नशे में एक दिन राकेश तिवारी ने श्रीप्रकाश की बहन को देखकर सीटी बजा दी. बहन के साथ हुई इस छेड़छाड़ ने श्रीप्रकाश को गुस्से से भर दिया और गुस्सैल  श्रीप्रकाश ने राकेश को गोलियों से भून डाला.

ये साल 1993 था और श्रीप्रकाश शुक्ला की उम्र महज़ 20 साल ही थी. ये श्रीप्रकाश शुक्ला की ज़िंदगी का पहला क़त्ल था. उम्र जो भी हो लेकिन क़त्ल तो उसने कर ही दिया था इसलिए अब पुलिस से भागना भी था. पुलिस ने उसकी तलाश शुरू की तो उसने देश ही छोड़ दिया.

देश छोड़कर श्रीप्रकाश किसी तरह से बैंकॉक पहुँच गया और वहीं पड़ा रहा. लेकिन यह भी असलियत थी कि श्रीप्रकाश की हैसियत इतनी नहीं थी कि वो आंबे वक्त तक बैंकॉक में ही बसा रहे. पैसे की तंगी आई तो उसे देश लौटना पड़ा.

लेकिन देश लौटने से पहले ही उसने फैसला कर लिया था कि अब जो कुछ करना है, जुर्म की दुनिया में ही करना है. यही वज़ह रही कि वापस लौटने के बाद हत्या के आरोप में वांछित श्रीप्रकाश सीधा बिहार के मोकामा पहुँच गया और शामिल हो गया सूरजभान गैंग में.

श्रीप्रकाश ने यहाँ से फिर कभी मुड़कर नहीं देखा. उसने जो भी कदम बढ़ाया वो उसे जुर्म की दुनिया में आगे, और आगे ले गया. कुछ ही वक़्त में श्रीप्रकाश शुक्ला उत्तर प्रदेश में जुर्म की दुनिया का बाहुबली बन बैठा. धमकी, क़त्ल, किडनेपिंग, बिजनेसमैनों से अवैध वसूली, डकैती और रेलवे के ठेकों पर एकमात्र कब्ज़ा, यही सब उसकी दुनिया बन गया था. कोई भी जुर्म ऐसा नहीं रह गया था जो श्रीप्रकाश शुक्ला करता ना हो. इतने अपराध किये कि उत्तर प्रदेश पुलिस की नाक में दम ही कर दिया था श्रीप्रकाश शुक्ला ने.

साल 1997 में श्री प्रकाश शुक्ला ने वीरेंद्र शाही नाम के एक जाने-माने नेता और अपराधी का बीच लखनऊ क़त्ल कर दिया. ऐसा कहा जाता है कि श्रीप्रकाश शुक्ला से ये क़त्ल वीरेंद्र शाही के विरोधी नेता हरि शंकर तिवारी ने कराया.

इस क़त्ल का सच क्या था किसी को नहीं पता था लेकिन इस क़त्ल के बाद उत्तर प्रदेश के बड़े-बड़े माफियाओं का गला सूख गया.  श्रीप्रकाश शुक्ला अभी भी पुलिस की पहुँच से बाहर था इस सच से ना तो पुलिस मुकर पा रही थी और ना ही उत्तर प्रदेश की आम जनता. बड़े-बड़े नेताओं और बिजनेसमैनों के साथ उठना बैठना जो था उसका.

वो अंधाधुंध इतने अपराध कर रहा था कि उत्तर प्रदेश पुलिस का जीना हराम हो गया था. लेकिन इससे भी बड़ी बात ये थी कि पुलिस के पास अभी तक उसके चेहरे की कोई पहचान तक नहीं थी. उसके नाम का खौफ़ पुलिस वालों के दिल में भी घर कर गया था क्योंकि उसके और उसके काम के बीच जो भी आता था श्रीप्रकाश शुक्ला तुरंत उसको रास्ते से हटा किनारे कर देता.

11 जनवरी साल 1997  में उसने अपने दो अन्य साथियों के साथ मिलकर लखनऊ के अमीनाबाद में लाटरी के थोक व्यापारी पंकज श्रीवास्तव को उसके दफ्तर में घुसकर गोली मार दी. ये मामला शांत भी नहीं हो पाया कि इसी साल 12 मई को उसने लखनऊ में हीएक बिल्डर मूलचंद अरोड़ा को किडनैप किया और फिरौती में एक करोड़ रुपये लेकर उसे आज़ाद कर दिया.

श्रीप्रकाश शुक्ला ने इसी साल अगस्त में एक और घटना को अंजाम दिया. वो लखनऊ के दिलीप होटल में अपने एक और साथी के साथ हाथ में एके-47 थामकर घुसा. और कमरा नंबर 206 में पहुँच ताबड़तोड़ कई राउंड फायर कर दिए. कमरे में मौजूद कुल 4 लोगों में से एक की मौत हो गयी और बाकी तीन घायल हो गए. इस कमरे में मौजूद वो चारो लोग गोरखपुर के ठेकेदार थे और जाने अनजाने में श्रीप्रकाश शुक्ला और किसी टेंडर के रास्ते का रोड़ा बन रहे थे.

इसी साल के सितम्बर की 9 तारिख को पुलिस को मुखबिरी मिली कि लखनऊ के जनपथ में श्रीप्रकाश बाल कटाने आ रहा है. आनन-फानन में इलाके की घेराबंदी की गयी और कोशिश की गयी उसे गिरफ्तार करने की. लेकिन बाल कटाने आये श्रीप्रकाश का बाल भी बांका नहीं हो सका. ऑपरेशन असफल हुआ और पुलिस का एक जवान भी इस टकराव में शहीद हुआ.

इस घटना ने श्रीप्रकाश के सीने पर गुंडई का एक और तमगा सजा दिया. साथ ही बढ़ा दिया लोगों के दिलों में बसी उसकी दहशत को.

श्रीप्रकाश शुक्ला पर इस घटना का कोई असर नहीं पड़ा. उसने इसी साल एक और घटना को अंजाम दिया. महीना है अक्टूबर का और जगह है लखनऊ का गोखले मार्ग. दवा व्यापारी के.के. रस्तोगी अपने बेटे कुनाल रस्तोगी के साथ सुबह-सुबह कहीं जा रहे थे. एक कार उनकी कार से टकराती है और कुनाल रस्तोगी गुस्से में अपनी कार रोककर बाहर आता है. दूसरी कार में मौजूद श्रीप्रकाश शुक्ला कुनाल को पकड़कर अपनी कार में बिठा लेता है और आगे बढ़ जाता है.

के.के. रस्तोगी कार का पीछा करते हुए उसकी कार को टक्कर मारते हैं. श्रीप्रकाश शुक्ला अपनी कार से दुबारा उतरता है और के.के. रस्तोगी को पिस्टल से शूट कर देता है. कुनाल को रिहा करने के बदले एक करोड़ की फिरौती भी लेता है.

करीब दो महीने बाद, साल 1997 अब बदलकर 1998 हो चुका था. रेलवे के किसी ठेके को लेकर श्रीप्रकाश शुक्ला भड़का हुआ था. जनवरी का महीना था और तारीख थी 18. लखनऊ के शिवनारायण पेट्रोल पंप के नज़दीक यूपी कोऑपरेटिव के चेयरमैन उपेंद्र विक्रम सिंह को श्रीप्रकाश शुक्ला अपनी एके-47 से सैकड़ों राउंड फायर कर मार डालता है.

श्रीप्रकाश शुक्ला के बढ़ते अपराधों ने और उठते नाम ने पुलिस और प्रसाशन की नींद हराम कर दी थी. प्रसाशन की तरफ से पुलिस को सख्त हिदायत दी गयी कि श्रीप्रकाश शुक्ला पर किसी भी हाल में लगाम लगाई जाए.

अब साल 1998 में ही 4 मई को पुलिस के 50 बेहतरीन जवानों की छंटनी कर एक अलग फ़ोर्स का गठन किया गया. ये छंटनी की उत्तर परदेश के तत्कालीन एडीजी अजयराज शर्मा ने. इस फ़ोर्स को नाम दिया गया स्पेशल टास्क फ़ोर्स और पहला टास्क दिया गया श्रीप्रकाश शुक्ला, ज़िंदा या मुर्दा.

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इसके कुछ महीने बाद ही 13 जून को श्रीप्रकाश शुक्ला ने बिहार सरकार के तत्‍कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की उनके गार्ड्स की मौजूदगी में ही एके-47 से अंधाधुंध गोलियां चलाकर भून डाला और चलता बना. ब्रज बिहारी प्रसाद उस वक्त बिहार की राजनीति का एक बड़ा नाम हुआ करते थे. पूरे बिहार में उनके नाम का सिक्का चला करता था. लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ला को उन्हें मारना था, सो वो मार गया.

उत्तर प्रदेश में अबतक एक ये बात तो जंगल की आग बनकर फैल ही चुकी थी कि रेलवे का ठेका कोई सा भी हो, जाएगा तो सिर्फ और सिर्फ श्रीप्रकाश शुक्ला के ही खाते में. साथ ही एक और बात भी फ़ैली जिसने उत्तर प्रदेश की पुलिस को सन्न कर दिया.

ये खबर आई कि श्री प्रकाश शुक्ला ने 6 करोड़ रुपये में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मरने की सुपारी ले ली है. इस बात ने प्रदेश की पुलिस और प्रसाशन को हिलाकर रख दिया. स्पेशल टास्क फ़ोर्स एक्शन में आ गयी. अब ये फ़ोर्स जो भी कदम उठा रही थी, बिजली की तेजी से बिल्ली की सावधानी से उठा रही थी.

सादी वर्दी में स्पेशल टास्क फ़ोर्स के जवान जगह-जगह धावा बोलने लगे, छापे मारने लगे. ये छापेमारी उत्तर प्रदेश से शुरू हुई और बिहार, जयपुर से कलकत्ता तक पहुँची. ताबड़तोड़ छापेमारी में स्पेशल टास्क फ़ोर्स के हाथ श्रीप्रकाश शुक्ला की एक तस्वीर लग गयी, और इस तस्वीर से उसकी पहचान हो गयी.

अब स्पेशल टास्क फ़ोर्स उसके चेहरे से वाकिफ थी. देर थी तो बस ये पता लगाने की कि वो आखिर हैं कहाँ. इस काम की शुरुआत कसे की जाए ये स्पेशल टास्क फ़ोर्स को समझ ही नहीं आ रहा था. लेकिन तभी उनके हाथ एक और कड़ी लगी. उन्हें पता लगा कि श्रीप्रकाश शुक्ला की एक प्रेमिका है जो दिल्ली या दिल्ली के आस-पास कहीं रहती है.

इसके अलावा पुलिस को यह भी पता चला कि श्री प्रकाश शुक्ला उससे फ़ोन पर बात भी करता है. श्रीप्रकाश शुक्ला के नंबर को सर्विलांस पर लगाया गया. और इसे मौत का सिर पर सवार होना ही कहेंगे कि कुल 14 सिम रखने वाले और हर रोज 2 सिम बदलने वाले श्री प्रकाश शुक्ला ने इस बार एक सप्ताह तक एक ही सिम का इस्तेमाल किया. लेकिन फिर भी वो कोई कच्चा खिलाड़ी तो नहीं था. उसे ना जाने कैसे इस बात का शक हो गया और उसने अपनी प्रेमिका को पीसीओ से फ़ोन करने लगा.

लेकिन यही एक जगह थी जहां पर वो स्पेशल टास्क फ़ोर्स से पीछे रह गया. उसे ये अंदाजा नहीं था कि पुलिस ने उसकी प्रेमिका के नंबर को भी सर्विलांस पर ले रखा है.

1998 के सितम्बर महीने की 23 तारीख को श्रीप्रकाश शुक्ला अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए दिल्ली से गाजियाबाद के लिए निकलता है. एसटीफ़ के प्रभारी अरुण कुमार गाजिआबाद के वसुंधरा एन्क्लेव से अपनी फ़ोर्स की 5 गाड़ियों के साथ उसका पीछा शुरू कर देते हैं.

रिहायशी इलाके से इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में पहुँचते ही स्पेशल टास्क फ़ोर्स की गाड़ियां श्रीप्रकाश शुक्ला की गाड़ी को ओवरटेक कर उसका रास्ता रोक लेती हैं. श्रीप्रकाश शुक्ला को हिदायत दी जाती है कि वो खुद को पुलिस के हवाले कर दे.

लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ला की हनक उसे ऐसा करने की इजाज़त नहीं देती. वो अपनी एके-47 से स्पेशल टास्क फ़ोर्स पर फायरिंग शुरू कर देता है. स्पेशल टास्क फ़ोर्स की तरफ से भी मोर्चा सम्भाला जाता है और काफी देर तक मुठभेड़ चलती है. आखिर में स्पेशल टास्क फ़ोर्स की गोलियां श्रीप्रकाश शुक्ला को छलनी कर शांत हो जाती हैं.

उत्तर प्रदेश से अपराध का एक बड़ा अध्याय ख़त्म हो जाता है. लेकिन उसकी मौत के बाद हुई जांचों में जो कुछ सामने आता है उससे सभी को एक और झटका लगता है. जांचों में पता चलता है कि राजनीति के बहुत से दिग्गजों के श्रीप्रकाश शुक्ला से सम्बन्ध थे. और साथ ही पुलिस के कई आला अधिकारी भी श्रीप्रकाश शुक्ला के लिए खबरी का काम किया करते थे.

वो नेता जिनके नाम जांच में सामने आये वो थे अमरमणि त्रिपाठी, मार्कंडेय चंद, सुन्दर सिंह बघेल, मदन सिंह, जीतेन्द्र कुमार जायसवाल, शिवप्रताप शुक्ला, जयनारायण तिवारी, प्रभा द्विवेदी, रमापति शास्त्री, मदन सिंह, अष्टभुजा शुक्ला और अखिलेश सिंह आदि.

उसकी मौत के बाद के बाद सामने आई ये सारे नाम और सारी बातें राजनीति और पुलिस महकमे में फैले भ्रष्टाचार की एक अलग ही इबारत लिखती थीं. ये बताती थीं कि अपराधी सिर्फ वही नहीं होते जो अपराधी होते हैं, बल्कि वो भी होते हैं जिनका चुनाव अपराध को मिटाने के लिए किया जाता है.

श्रीप्रकाश शुक्ला के पास नाम था ही, अपराध किये ही थे, अच्छा-खासा पैसा भी था और खौफ़ भी बना हुआ था. उसके पास राजनीति में उतरने के लिए सबकुछ था और वो खुद भी राजनीति में उतरना चाहता था, लेकिन उसकी रंगबाजी और दबंगई उसे ले डूबी.

साल 2005 में श्रीप्रकाश शुक्ला की ज़िंदगी पर आधारित अरशद वारसी की एक फिल्म आई थी. इस फिल्म का नाम ‘सहर’ था. और अभी हाल ही में आई थी उसकी ज़िंदगी पर आधारित एक वेब सीरीज रंगबाज. श्रीप्रकाश शुक्ला को मरे हुए आज कितने बरस हुए, लेकिन उसकी दबंगई के किस्से, उसकी गुंडई के किस्से, उसकी रंगबाजी के किस्से आज भी गोरखपुर की गलियों में गूंजते सुनाई देते हैं.