दो धुर विरोधी दलों के जिगरी यारों ने बदली भारतीय राजनीति की परिभाषा

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राजनीति आज कहती है कि यहाँ कोई दोस्त नहीं होता, कोई अपना नहीं होता, कौन कब क्या खेल कर जाए ये किसी को पता नहीं होता. ये ऐसी दुनिया है जहाँ हर नेता विपक्ष के साथ- साथ अपनी पार्टी के लोगों को भी शक की निगाह से देखता है, और छोटी- मोटी बातों को भी छुपा ले जाता है.

आज के माहौल में ऐसा लगता है कि राजनीति बस राजनीति ना रहकर दुश्मनी हो गई है, और नेता बस नेता ना रहकर दुश्मन. आज एक पार्टी का नेता दूसरी पार्टी के नेता के लिए कब कितना ज़हर उगल दे पता ही नहीं चलता. वो अपने विरोधी खेमे के खिलाफ कितनी गिरी हुई बात कह दे पता ही नहीं चलता. यही वज़ह है कि आज राजनीति के क्षेत्र को ‘राजनीतिक गलियारे’ ना कहकर ‘राजनीतिक दलदल’ कहना ज्यादा अच्छा लगता है.

लेकिन अगर इसी राजनीति में बस थोड़ा सा ही पीछे चलें तो ये एक दोस्ती की कहानी सुनाती है. ऐसी कहानी जो आज की राजनीतिक छुअन से बहुत दूर है. ये दोस्ती है दो अलग- अलग राजनीतिक पार्टियों के दिग्गज नेताओं की. दो ऐसी अलग- अलग राजनीतिक पार्टियाँ, जो राजनीति के अखाड़े में एक- दूसरे की जानी दुश्मन सी मालूम होती हैं. इन्ही दो जानी दुश्मन राजनीतिक पार्टियों में मौजूद थे दो जिगरी दोस्त, जिनकी दोस्ती के किस्से आज भी सियासत के गलियारों की शान हैं. ये किस्से हमें बताते हैं कि साफ़ राजनीति क्या होती है. और यही किस्से कहते हैं कि बात जब देश की हो तो राजनीति और विरोध एक किनारे, और देश… देश की इज्ज़त सबसे पहले.

राजनीति के इस भाग में हम बात करने आये हैं कांग्रेस के पीवी नरसिम्हा राव और भारतीय जनता पार्टी के अटल विहारी बाजपेई की दोस्ती पर.

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के आपसी मतभेद को आज देश का बच्चा- बच्चा जानता है, और ये मतभेद तब भी ऐसा ही था. कांग्रेस के दिग्गज नेता पीवी नरसिम्हा राव, भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता अटल विहारी बाजपेई के दोस्त थे. और राजनीति में एक दूसरे की पार्टी का विरोधी होने के बाद भी उन दोनों की दोस्ती राजनीतिक दायरों से बाहर ही रही. दोनों में खूब छनती थी, और हंसी- मज़ाक भी होता था.

राव साहब बाजपेई जी से ‘गुरु’ कहते, तो बाजपेई जी भी हँसते हुए जवाब देते,

‘राजनीति को आजकल गुरु की नहीं, गुरु घंटाल की ज़रुरत है.’

और इसके बाद दोनों ठहाका लगाकर हंस देते. उनकी दोस्ती को लेकर एक बार किसी ने अटल जी से पूछा था,

‘आपकी पार्टी को आपकी और नरसिम्हा राव की दोस्ती से ऐतराज नहीं है?’

अटल बिहारी बाजेपेई अपनी जिस शालीनता और हाज़िर जवाबी के लिए जाने जाते थे, उसी के साथ उन्होंने इस सवाल का जवाब भी दिया,

‘मैं पार्टी से पूछकर दोस्ती नहीं करता, और पार्टी को मेरी दोस्ती से ऐतराज होना भी नहीं चाहिए.’

दूसरे लोग तो इनकी दोस्ती ये दोनों ही नेता एक- दूसरे का बराबर सम्मान करते थे, और बहुत से किस्से हैं जो इसका सबूत देते हैं.

इस्लामिक देशों का एक संगठन है जिसे OIC यानी ‘आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन’ कहा जाता है. और हमारा दुश्मन पड़ोसी पाकिस्तान भी इस आर्गेनाईजेशन का हिस्सा है. इसी बात का फायदा उठाते हुए, जिनेवा में पाकिस्तान ने 27 फरवरी साल 1994 को ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग’ के सामने भारत की आलोचना करते हुए कहा,

“भारत कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है.”

पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के सामने कश्मीर में हो रहे तथाकथित मानवाधिकारों के उलंघन के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की. ये एक बड़ी और सोची- समझी चाल थी, जो पाकिस्तान की तरफ से भारत के खिलाफ चली गई.

देश में उस वक़्त कांग्रेस की सरकार थी. देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, और प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव देश को इस आर्थिक संकट से उबारने की कोशिश में जुटे हुए थे. ऐसे में अगर सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग, OIC की ओट लेकर पाकिस्तान की तरफ से दायर याचिका को मान लेता, तो भारत पर संयुक्त राष्ट्र की तरफ से बहुत से प्रतिबन्ध लग जाते. और देश के हालत उस वक़्त ऐसे नहीं थे कि ये कोई प्रतिबन्ध झेल सके.

देश पहले से ही मुश्किल के दौर में था, और सयुंक्त राष्ट्र की तरफ से लगे प्रतिबन्ध उसे और झुका देते. पीवी नरसिम्हा राव ने इस मामले की कमान अपने हाथों में ली, और अटल बिहारी बाजपेई से संपर्क किया.

ये ऐसा वक़्त था जब देश को बचाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां एकजुट हो गयी थीं. कोई किसी का दुश्मन नहीं था, और सब देश की ढाल बनकर खड़े हुए थे. पीवी नरसिम्हा राव ने कुशल राजनीतिज्ञों की एक टीम बनाई. और इस टीम का हिस्सा बने सलमान खुर्शीद, ई अहमद, फारूक अब्दुला, हामिद अंसारी और विपक्ष के दिग्गज अटल बिहारी बाजपेई.

पीवी नरसिम्हा राव ने अटल बिहारी बाजपेई को इस टीम में शामिल कर एक बड़ा फैसला था. उन्होंने आँख बंद कर बाजपेई जी पर भरोसा जताया था. बाजपेई जी के लिए ये बड़ी बात थी, और उन्होंने इस फैसले का मान रखते हुए कार्रवाई शुरू की.

पीवी नरसिम्हा राव और अटल बिहारी बाजपेई जी ने मिलकर OIC के बड़े और उदार इस्लामिक देशों से संपर्क करना शुरू किया. उन्होंने OIC के 6 नामी देशों के राजदूतों के साथ कुछ पश्चिमी देशों के राजदूतों को भी दिल्ली बुलाने का फैसला किया.

इसके साथ ही दूसरी तरफ अटल बिहारी बाजपेई ने जिनेवा में भारतीय मूल के दिग्गज व्यापारी “हिंदुजा बंधुओं” को तेहरान से बात करने, और भारत का पक्ष रखने के लिए भी तैयार कर लिया.

देश की राजनीति ने आपस में मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा खोला था, और इसका नतीज़ा ये निकला कि पाकिस्तान हर तरफ से घिर गया, और संयुक्त राष्ट्र के सामने पाकिस्तान की किरकिरी हो गई.

पाकिस्तान को जिन इस्लामिक देशों से भारत के विरोध और अपने समर्थन की उम्मीद थी उन सभी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए. इंडोनेशिया और लीबिया ने खुद को OIC से अलग कर लिया, सीरिया ने दूरी बना ली. ईरान और चीन भारत के साथ आ गए, और पाकिस्तान ने एक बार फिर हारते हुए 9 मार्च 1994 को मजबूरन अपना प्रस्ताव वापस ले लिया. देश की राजनीति के पक्ष और विपक्ष ने मिलकर, खुद को बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ समझने वाले पाकिस्तान को पूरे विश्व के सामने कूटनीतिक पटखनी दी थी.

वैसे एक बात ये भी थी कि अटल बिहारी बाजपेई विपक्ष को कभी विपक्ष नहीं कहते थे. वो कहते थे कि विपक्ष को विपक्ष नहीं “प्रतिपक्ष” कहना चाहिए. क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल देश के विपक्ष में नहीं होता.

राजनीति में पीवी नरसिम्हा राव और अटल बिहारी बाजपेई की दोस्ती का एक और बड़ा उदाहरण फिर से जल्दी ही देखने को मिला.

साल 1994 में ही देश अपना दूसरा परमाणु परीक्षण करने को तैयार था. और प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव गुपचुप तरीके से परमाणु परीक्षण करने की तैयारी में थे. लेकिन ना जाने कैसे इस बात की भनक अमरीका तक पहुँच गई, और उसने भारत के आसमान पर अपना पहरेदार सैटेलाईट लगा दिया.

नतीजा ये हुआ कि ये परमाणु परीक्षण नहीं हो सका. लेकिन भारत के सामने ये बात साफ़ हो गयी थी, कि देश के अपनों में ही कोई तो है जो अमरीका तक खबर पहुंचा रहा है. इसके दो साल बाद 1996 में अटल बिहारी बाजपेई की सरकार बनी, लेकिन ये सरकार महज़ 13 दिनों में ही गिर गई. और देश की कमान संभाल ली एच डी देवगौड़ा ने.

ना कोई चर्चा और ना कोई शगल, परमाणु परीक्षण का मुद्दा ठंडे बस्ते में जाता मालूम हुआ. साल 1998 में अटल बिहारी बाजपेई फिर से राजनीति के केंद्र में आये. उनका शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था, और समारोह में पीवी नरसिम्हा राव भी मौजूद थे. पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने अटल जी के शपथ ग्रहण के दौरान उनके हाथ में धीरे से एक पर्ची पकड़ाई.

अटल बिहारी बाजपेई के मीडिया सलाहकार अशोक टंडन ने एक बार बताया था कि उस पर्ची में पीवी नरसिम्हा राव ने लिखा था,

“मेरा जो मिशन अधूरा रह गया उसे आपको पूरा करना है.”

पूर्व प्रधानमंत्री रहे विपक्षी पार्टी के एक नेता का सत्ताधारी पार्टी के वर्तमान प्रधानमंत्री पर इतना भरोसा जताना सिर्फ और सिर्फ दोस्ती का भरोसा भर ही तो है. और अटल बिहारी बाजपेई का उस मिशन को पूरा करने में लग जाना उस भरोसे की रक्षा.

1998 में ही भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण कर दुनिया को चौंका दिया. और पीवी नरसिम्हा राव का मिशन पूरा हुआ. इस सबके बावजूद जब अटल जी से इस परीक्षण के बारे में बात की गयी तो उन्होंने यही कहा कि,

“बम तो पहले से ही तैयार थे, मैंने तो बस विस्फोट कराया है.”

ये दोनों राजनीति की मिसाल तो थे ही, साथ ही दोस्ती को भी इन्होने एक अलग ही स्तर तक पहुंचाया. इन्होने बताया कि राजनीतिक विरोध राजनीति तक, और व्यक्तिगत जीवन अलग. इन्होने सिखाया कि भरोसे को कैसे बनाए रखना है, और देश को कैसे बचाए रखना है. आपस में कितना भी लड़ लें, लेकिन बात जब कभी भी देश की आये तो काम मिलकर करना है.

खैर, वो दौर राजनीति का सबसे सुनहरा दौर था, और वो दोस्ती राजनीति की सबसे सुनहरी दोस्ती. आज वो दोनों ही दोस्त हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन दूर कहीं आसमान में जब राव साहब बाजपेई जी की चुटकी लेते हुए उन्हें ‘गुरु’ कहते होंगे, तो उन्हें हँसते हुए अब भी वही जवाब मिलता होगा शायद,

‘राजनीति को आजकल गुरु की नहीं, गुरु घंटाल की ज़रुरत है.’

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