देश को मिला पहला लोकपाल

511

अन्ना आन्दोलन को आप भूले तो नहीं होंगे. 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान से इसकी शुरुआत हुई थी . “अन्ना हजारे” को तब देश का बच्चा बच्चा जान गया था. क्योंकि हर अखबार और न्यूज़ चैनल्स पर खबर चलती थी उनकी ही, उनके जन लोकपाल बिल  की और उनके आजीवन भूख हड़ताल  की.

बहुत से लोगों ने उनका साथ दिया और बहुत से लोगों ने साथ छोड़ा भी. सरकार ने बिल पास भी किया लेकिन समय से इसपर काम नहीं हुआ. लेकिन फिर सरकार बदली काम शुरू हुआ . भ्रष्टाचार को हटाने के लिए कई कदम उठाए गए और अब देश को उसका पहला लोकपाल मिल गया . जस्टिस पी. सी. घोष को लोकपाल नियुक्त किया गया .

एक  दौर था जब हमारा देश भरष्टाचार की जंजीरों से जकड़ा हुआ था. इसी से तंग आ कर देशहित को सोचते हुए जन लोकपाल बिल को बदलने के लिए अन्ना हजारे ने “अन्ना आन्दोलन” की शुरुआत की थी.

आपको बता दें कि पिछले 8 सालों में अन्ना हजारे 3 बार भूख हड़ताल पर बैठ चुके है. सिविल सोसायटी सदस्यों तथा समूहों का नेतृत्व करते हुए अप्रैल 2011 में पहली बार दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चतकालीन भूख हड़ताल पर बैठे थे. और 2013 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में जन लोकपाल बिल को संसद में पास किया गया था. लेकिन सदस्यों की नियुक्ति पर आकर बात अटक गई थी.

अन्ना आन्दोलन को काफी लोगों का समर्थन प्राप्त था . किरण बेदी , अरविन्द केजरीवाल जैसे की लोग इसमें शामिल थे. सबने दिन-रात एक कर रखा था . पुरजोर कोशिश थी भ्रष्टाचार को जड़ से हटाने की.

लेकिन क्या सच में जो लोग उसमें शामिल थे उनका मंसूबा यही था..

अन्ना आन्दोलन के चर्चें पुरे देश में थे लेकिन पिछले 8 सालों में बहुत कुछ बदल सा गया. भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े लोग खुद भ्रष्ट हो गए. अगर आप सोच रहें है कि यहाँ बात अन्ना हजारे की हो रही है तो आप कतई गलत सोच रहें. यहाँ तो बात हो रही है आप की . मतलब की आप पार्टी की जिसका नेतृत्व अरविन्द केजरीवाल करते है.

यूं तो वो खुद जन लोकपाल बिल के लिए अपने INCOMETAX की नौकरी छोड़ कर अन्ना  आन्दोलन में शामिल हुए लेकिन उन्होंने रुख बदल कर अपनी ही पार्टी बना ली और दिल्ली के सियासत की खेल में उतर गए. और  वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे या नहीं ये बताने की ज़रुरत नहीं . इससे आप भी वाकिफ है. हालांकि इससे अन्ना को झटका तो लगा था लेकिन उन्होनें लोकपाल बिल के लड़ाई नहीं छोड़ी.

वैसे तो जनलोकपाल बिल कांग्रेस की सरकार में ही पास हो गई थी. लेकिन इसके लिए सदस्यों की नियुक्ति नहीं हो पाई थी . शायद उनके पास  इसके अलावा भी काफी ज़रूरी काम होंगे.

भले ही इसकी नीव अन्ना हजारे ने रखी  थी लेकिन देश को पहला लोकपाल मोदी सरकार ने दिया. जस्टिस पिनाकी चन्द्र घोष को केंद्र सरकार ने देश का पहला लोकपाल नियुक्त किया है। सुपप्रिम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस घोष की ख्याति मानवाधिकार मामलों के विशेषज्ञ के तौर पर रही है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंगलवार को औपचारिक तौर पर उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी है.

लोकपाल में 8 अन्य सदस्यों की नियुक्ति की गयी है. जिसमे जस्टिस पी. सी. घोष को लोकपाल नियुक्त करने के साथ न्यायिक सदस्यों के तौर पर जस्टिस दिलीप बी. भोंसले, जस्टिस प्रदीप कुमार मोहंती, जस्टिस अभिलाषा कुमारी, जस्टिस अजय कुमार त्रिपाठी होंगे. न्यायिक सदस्यों के साथ ही कमिटी में 4 अन्य सदस्यों के तौर पर दिनेश कुमार जैन, अर्चना रामसुंदरम, महेंद्र सिंह और डॉक्टर इंद्रजीत प्रसाद गौतम भी शामिल किए गए हैं.

वैसे आपको बता दें कि लोकपाल नियुक्ति की सिलेक्ट कमिटी में प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस या उनके द्वारा नामित जज, नेता विपक्ष, लोकसभा अध्यक्ष और एक जूरिस्ट होता है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट में नेता विपक्ष नहीं होने की स्थिति में विपक्षी दल के नेता को विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल करने की बात सरकार ने कही थी. वहीं कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकपाल कमिटी की बैठक में हिस्सा लेने से इनकार करते हुए सरकार पर मनमानी का आरोप लगाया था.

जहां एक तरफ चुनाव नज़दीक आने पर विपक्ष और राजनीतिक दलें आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं और अपनी उपलब्धियों को गिनवा रहें है. वहीं सरकार इनसबो से ऊपर उठ कर अपने कार्यकाल के खत्म होने से पहले सभी कामों को पूरा कर रही है .