जब पहली बार भारत में एक पूर्व प्रधानमंत्री को होना पड़ा गिरफ्तार

4907

इन्दिरा गांधी घर से बाहर निकलती हैं, एक गाड़ी के ऊपर खड़ी हो कर, अपने लिए आए जनसैलाब के आगे हाथ जोड़ती हैं। और फिर भारत की पूर्व प्रधानमंत्री सीबीआई की गाड़ी में बैठ जाती हैं।

कहा जाता है वक्त, सत्ता और हालात कभी भी बदल सकते हैं…

1975 में भारत के लोकतन्त्र की किताब में एमरजेंसी का काला पन्ना डालने वाली, इन्दिरा गांधी की सत्ता का तख्तापलट होना तो तय ही था। लेकिन किसे मालूम था कि इन्दिरा की किस्मत ऐसी करवट लेगी कि वक़्त के साथ साथ उसके हालात भी बदल जाएंगे ?

3 अक्टूबर 1977, भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास में एक अहम दिन

भारत के इतिहास में पहली बार किसी पूर्व प्रधानमंत्री को गिरफ्तार किया गया था। “सिंहासन खाली करो के जनता आती है।” पूरे भारत में यही नारा गूंज रहा था। आपातकाल में लगभग सभी विपक्षी नेता और दल इन्दिरा की तानाशाही का शिकार बने थे। लेकिन अब सभी एकजुट हो गए। जनसंघ, काँग्रेस ओ, सोशियलिस्ट पार्टी, भारतीय लोकदल, सभी ने मिलकर भारतीय राजनीति में एक नया विकल्प बनाया। नए दल का नाम था ‘जनता पार्टी’।

इंदिरा ने की चुनाव की घोषणा-

एमरजेंसी खत्म होने के बाद जनवरी 1977 में अचानक इन्दिरा ने चुनाव की घोषणा कर दी। मार्च 1977 में चुनाव हुआ। जेपी नारायण के नेतृत्व में चुनाव में आई जनता पार्टी की भारी मतों से जीत हुई। मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाया गया और चौधरी चरण सिंह को केन्द्रीय गृह मंत्री। लोग इन्दिरा की तानाशाही से इतना परेशान हो गए थे कि काँग्रेस की हार पर मानों देश में दूसरी आज़ादी की खुशी मनाई जा रही हो। इन्दिरा खुद भी चुनाव हार गई थी। तानाशाह की तरह देश चलाने वाली इन्दिरा अब कमजोर हो गई थी।

इन्दिरा से एमरजेंसी का हिसाब-

अब समय आ गया था इन्दिरा से एमरजेंसी का हिसाब मांगने का। सत्ता में आते ही जनता सरकार ने इन्दिरा की लगाई एमरजेंसी की जांच के लिए ‘शाह कमीशन’ का गठन किया। पूर्व चीफ़ जस्टिस जे॰सी॰ शाह को इस कमेटी का चीफ़ बनाया गया। शाह कमीशन को 6 महीने में रिपोर्ट बनानी थी। आपकों बता दें, इस दौरान इंदिरा पर तमाम तरह के दिलचस्प केस और आरोप लगाए गए। एक केस तो रॉ एजेंट और पूर्व आर्मी ऑफिसर रुस्तम नागरवाला की जेल में हत्या का था।

आप त्रिखा कमीशन का केस जान कर अपनी हंसी नहीं रोक पाएंगे। इन्दिरा पर चार चिकन और दो अंडे की चोरी का आरोप भी लगाया गया था। मणिपुर कोर्ट ने इंदिरा के खिलाफ इस मामले में नॉन बेलएबल वारंट जारी कर दिया था।  इंदिरा को इस केस की सुनवाई के लिए 2000 किमी दूर मणिपुर जाना पड़ा! लोगों का कहना था, इन्दिरा को अपनी तानाशाही का भुगतान करना पड़ रहा है।

भ्रष्टाचार का आरोप-

इसी बीच इन्दिरा गांधी पर भ्रष्टाचार का एक गंभीर आरोप लगा।यही वो केस है जो राजनीति के गलियारों में भूकंप ले आया। दरअसल इन्दिरा पर चुनाव प्रचार में इस्तेमाल की गईं जीपों की खरीदारी में भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। रायबरेली में चुनाव प्रचार के लिए इंदिरा के लिए 100 जीपें खरीदी गई थीं। उनके विरोधियों का आरोप था कि जीपें कांग्रेस पार्टी के पैसे से नहीं खरीदी गईं बल्कि उसके लिए उद्योगपतियों ने पैसा भरा है और सरकारी पैसे का भी इस्तेमाल किया गया है।गृह मंत्री चौधरी साहब ने इन्दिरा को गिरफ्तार करवाने का फैसला लिया। वहीं प्रधानमंत्री मोरारजी का कहना था कि सब कुछ आराम से सबूत इकट्ठे होने के बाद करना चाहिए।

1 अक्टूबर को तय हुई गिरफ्तारी

पहले तय हुआ कि इन्दिरा गांधी को 1 अक्टूबर 1977 को गिरफ्तार किया जाएगा। पूरे देश में ये बात आग कि तरह फ़ेल गई। लेकिन चौधरी साहब की पत्नी ने उन्हें 1 अक्टूबर को ऐसा करने से मना कर दिया। साथ ही उनके दामाद के दोस्त, जो एक आईपीएस थे, उन्होने भी सलाह दी कि इन्दिरा को 2 अक्टूबर के बाद ही गिरफ्तार किया जाए। दरअसल 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के साथ साथ रविवार का दिन था। तय हुआ कि गिरफ्तारी 3 अक्टूबर को कराई जाएगी।

2 अक्टूबर को चौधरी साहब सीबीआई डायरेकटर को बुलाते हैं और गिरफ्तारी की पूरी प्लानिंग करते हैं। लंबी चर्चा चली। चौधरी ने उनसे कहा “इन्दिरा गांधी अब प्रधानमंत्री नहीं रही, वे एक आम नागरिक है तो इसे एक आम गिरफ्तारी की तरह ही किया जाए।”

अब दिन आता है 3 अक्टूबर 1977, सुबह होते ही इन्दिरा के खिलाफ एफ़आईआर दर्ज़ कर दी गई।  दोपहर 3 बजे चौधरी के पर्सनल सेक्रेटरी सीबीआई को फोन मिलाकर पूछते हैं कि ‘क्या चल रहा है?’ सीबीआई से जवाब आता है, “सर जी हम तो रेडी हैं, बस लोकल पुलिस का इंतज़ार है।”  शाम 4:55 मिनट पर सीबीआई, लोकल पुलिस के साथ इन्दिरा के घर ,12 क्रेसेंट पहुँचती है। दरवाजे पर एक व्यक्ति उनके आने का कारण पूछता है तो सीबीआई अफसर एन.के. सिंह बताते हैं कि वह भ्रष्टाचार के आरोप में इन्दिरा को गिरफ्तार करने आए हैं। व्यक्ति हक्का बक्का हो कर घर के अंदर भागता है।

खबर मिलते ही संजय गांधी की पत्नी मेनका सीबीआई के आने की खबर मीडिया में देदेती हैं। वहीं गृह मंत्री, चौधरी साहब टेलीफ़ोन पर पूरी खबर साथ के साथ ही ले रहे थे। सीबीआई ने इन्दिरा गांधी को 1 घंटे का समय दिया। इस बीच मेनका गांधी ने अपनी मैगज़ीन, सूर्य, आर के धवन, यशपाल कपूर और वकीलों को टेलीफ़ोनकरना शुरू कर दिया। वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया।

इन्दिरा आई कमरे से बाहर

शाम 6:05 पर इन्दिरा बाहर आती हैं। सीबीआई ऑफिसर एन. के. सिंह इन्दिरा को एफ़आईआर की एक कॉपी दिखाते हैं। आते ही इन्दिरा पहला सवाल करती हैं, “Where are the handcuffs?”,  “हथकड़ियाँ कहाँ है?” 12 क्रेसेंट में ड्रामा और भी बड्ने लगा। पुलिस के समझाने के बाद भी इन्दिरा की ज़िद्द थी कि वो बिना हथकड़ी के बाहर नहीं जाएगी। असल में, इन्दिरा ऐसा अपनी राजनैतिक सोच के चलते कर रही थी। उन्हें मालूम था उनके घर के बाहर खड़ा जनसैलाब, इन्दिरा के हाथों में हथकड़ियाँ देख कर गुस्से से भर जाएगा।

वहीं मेनका गांधी का टेलीफ़ोन घुमाना सफल हुआ। भारतीय मीडिया से लेके विदेशी मीडिया, सभी के पास इन्दिरा की गिरफ्तारी की खबर पहुँच गई थी। दिल्ली का माहौल गरम हो चुका था। संजय गांधी घर से बाहर निकल कर नारे बाज़ी शुरू करवाने लगे। मेनका गांधी और यशपाल कपूर प्रेस और काँग्रेस समर्थकों से बातचीत करने लगे। इन्दिरा के वकील सीबीआई अफसरों को घेर, उनसे एफ़आईआर की कॉपी मांगने लगे। लेकिन सीबीआई अफसरों ने कहा कि उन्होने इन्दिरा को एफ़आईआर दिखा दी है। इस फिल्मी ड्रामा को चलते चलते शाम के 7:30 बज जाते हैं, हथकड़ियों को लेकर बहस अभी भी जारी है।

आखिर इन्दिरा गांधी मान जाती है

इन्दिरा गांधी घर से बाहर निकलती हैं, एक गाड़ी के ऊपर खड़ी हो कर, अपने लिए आए जनसैलाब के आगे हाथ जोड़ती हैं। और फिर भारत की पूर्व प्रधानमंत्री सीबीआई की गाड़ी में बैठ जाती हैं। उनके दोनों बेटे राजीव गांधी और संजय गांधी अपनी गाड़ियों में इन्दिरा के पीछे पीछे जाते हैं। कितनी कमाल कि बात है ना? दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में कभी तानाशाही करने वाली प्रधानमंत्री अब खुद पुलिस की हिरासत में थी।

गिरफ्तारी के बाद

इन्दिरा को गिरफ्तार करने के बाद फ़रीदाबाद के बड़कल लेक गेस्ट हाउस में हिरासत में रखना था। किसी वजह से उनको वहां नहीं रखा जा सका और रात किंग्सवे कैंप की पुलिस लाइन में बने गैजेटेड ऑफिसर्स मैस में लाया गया।

कोर्ट रूम का नज़ारा

अगले दिन यानी 4 अक्टूबर की सुबह उनको मैजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया। और अब आता है इस कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट! मैजिस्ट्रेट ने आरोपों के समर्थन में सबूत मांगे। जब इन्दिरा की गिरफ्तारी के समर्थन में सबूत नहीं पेश किए गए तो मैजिस्ट्रेट ने हैरानी जताई।  हैरान मजिस्ट्रेट ने वादी पक्ष से पूछा कि, तो अब क्या किया जाए इस बात का सरकार के पास कोई जवाब नहीं था। मैजिस्ट्रेट ने इंदिरा गांधी को इस तकनीकि आधार पर बरी कर दिया गया कि उनकी हिरासत के समर्थन में कोई सबूत नहीं दिया गया था।

‘ऑपरेशन ब्लंडर’ से इन्दिरा को मिला फायदा

इस पूरे किस्से से इन्दिरा गांधी को नुकसान की जगह फायदा हो गया। काँग्रेस हर जगह जनता पार्टी पर झूठ बोलने का आरोप लगाने लगी। इन्दिरा को लोगों से सहानुभूति मिलने लगी। इन्दिरा ने इस केस को राजनैतिक मोड़ दे दिया। और इसी सिमपथी वोट बैंक के चलते इन्दिरा गांधी ने 1980 में एक बार फिर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। वहीं जनता पार्टी टूट गयी थी। जनता पार्टी के इस ‘ऑपरेशन अरैस्ट’ को ‘ऑपरेशन ब्लंडर’ का नाम दिया गया।