नही रहे भारत के सबसे कठोर चुनाव आयुक्त!

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चुनावों में उम्मीदवारों के खर्च पर लगाम लगाने की बात हो या फिर सरकार से किराये पर लिए गए हेलिकॉप्टर के जरिए मंत्रियों के चुनाव प्रचार करने की नीति पर रोक। ये चीजें किसी नियम के तरह स्थिर नजर आती हैं तो इसका श्रेय अगर किसी को जाता है तो वो शेषन को जाता है..

दीवारों पर नारे लिखना और पोस्टर चिपकाना, लाउडस्पीकरों से कानफोडू शोर करना, चुनाव प्रचार के नाम पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले भाषण देना सबकुछ उनके निशाने पर रहा और सरकार को ऐसे सवालों पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर होना पड़ा.. ये सब एक ही व्यक्ति की वजह से हुआ था वो थे टीएन शेषन..

जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे तब कहा जाता था कि नेता सिर्फ दो लोगों से डरते थे एक तो भगवान से दूसरा शेषन से. इसी धाकड़ छवि थी उनकी मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर. एक इंटरव्यू में शेषन ने कहा था कि आई ईट पॉलिटीशियंस फॉर ब्रेकफास्ट यानी मैं नाश्ते में राजनीतिज्ञों को खाता हूं. शेषण बड़े नेताओं से भी पंगा लेने में पीछे नही हटते थे. अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से लेकर हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल गुलशेर अहमद और बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव में से किसी को नहीं बख्शा..इनके ही कार्यकाल में पहली बार बिहार में चार चरणों इन चुनाव करवाए गये.. और साथ ही साथ चार बार चुनाव की तारीखों को भी बदला गया.. जिलाधिकारी के तौर पर भी टीएस शेषन की छवि भी एक धाकड़ अधिकारी थी. इसी से जुड़ी एक घटना बहुत प्रचलित है.
कश्मीर के प्रधानमंत्री रह चुके शेख अब्दुल्ला को 1958 में षड्यंत्र रचने के आरोप में जवाहर लाल नेहरु ने नजरबंद करने का देश दिया और इनकी रखवाली करने की जिम्मेदारी टीएन शेषन को दी गयी. शेषन को शेख द्वारा लिखे जा रहे प्रत्येक पत्र को पढने का आदेश था.. ऐसे में शेख शेषन से खूब चिढ़ गये थे.. इससे बचने के लिए मललब शेषन उनका खत ना पढ़े इसके लिए उन्होंने एक चाल चली… खत लिखने के के बाद शेख ने पता लिखा था.. डॉ. एस राधाकृष्णन, भारत के राष्ट्रपति’.. इसके बाद शेख ने शेषन से कहा कि क्या इसे भी यहीं खोलकर पढोगे.. ये पत्र तो राष्ट्रपति को लिखा गया है. शेख के चेहरे पर बनावती मुस्कान थी..


हालाँकि शेषन पर इसका कोई फर्क नही पड़ा.. उन्होंने कहा कि ख़त पर पता क्या लिखा है इससे मुझे कोई फर्क नही पड़ता.. मैं इसे आपके सामने ही खोलूंगा… ‘सर, यह मेरा कर्तव्य है कि आपकी हर जरूरत का ख्याल रखूं. मैं यह देखूंगा कि कोई गलती से आपके सामने पानी का एक गिलास लेकर भी न आ जाए.’ शेख इससे बेहद खफा हो गए और घोषणा कर दी कि वे अपने साथ किए जा रहे खराब व्यवहार के खिलाफ आमरण अनशन करेंगे.

शेषन के बारे में उस वक्त प्रसिद्ध था कि वह जरा-सा शक होने पर चुनाव रद्द कर देते थे। उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे और चुनाव हो रहा था। बिहार में तब सबसे ज्यादा फर्जी वोट पड़ने और बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं होती थी। शेषन ने पूरे सूबे को अर्धसैनिक बलों से पाट दिया.. कहा जाता है कि लालू प्रसाद यादव उस वक्त कुर्सी की राह देख रहे थे और अपने जनता दरबार में शेषन को खूब कोसते थे. अपने हास्य और व्यंग्य के लहजे में कहते थे- शेषनवा को भैंसिया पे चढ़ाकर गंगाजी में हेला देंगे… शेषन ने सूबे में सुरक्षा व्यवस्था को इतना मजबूत कर दिया था कि बिहार में चुनाव प्रक्रिया तीन महीने तक चली..

आइये जानते है शेषन के कुछ ऐसे काम और जानकारी जिसके लिए उन्हें हमेश याद किया जायेगा.
शेषन का पूरा नाम तिरुनेलै नारायण अय्यर शेषन था.वह भारत के दसवें चुनाव आयुक्त रहे.
उन्होंने 1990 से 1996 के दौरान चुनाव प्रणाली को मजबूत बनाया.
इसकी बदौलत चुनाव प्रणाली की दशा और दिशा बदल गई.उस वक्त यह कहा जाता था कि नेताओं को या तो भगवान से डर लगता है या फिर शेषन से.
शेषन को अबतक का सबसे कड़क चुनाव आयुक्त माना जाता हैमतदाताओं के लिए मतदान पत्र अनिवार्य हुए. आचार संहिता का सख्ती से पालन शुरू हुआ.शेषन की बदौलत फर्जी मतदान पर रोक लगी और लोकतंत्र की नींव और ज्यादा मजबूत हुई.

शेषन के कार्यकाल से पहले चुनाव में बेहिसाब पैसा खर्चा होता था, इस पर उन्होंने रोक लगाईं.आचार संहिता के पालन को इतना सख्त बना दिया कि कई नेता शेषन से खार खाते थे
फर्जी मतदान रोकने में काफी कामयाबी मिली थी.

  खैर अब तक के सबसे कड़े चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का रविवार को निधन हो गया. 86 वर्षीय शेषन पिछले कई सालों से बीमार चल रहे थे और चेन्नई में रह रहे थे.