राजनीति: एक नेता जिसकी बदजुबानी बन गई उसकी बदहाली की कहानी

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अपने प्रेमगीतों के चलते ऊंचाइयों को छूने वाले गोपालदास नीरज जी ने भी जब दो लोगों के बीच चल रही सियासत पर लिखा तो ये लिखा कि,

ख़ुदकुशी करती है आपस की सियासत कैसे
हम ने ये फ़िल्म नई ख़ूब इधर देखी है

ये कहानी तब की है जब कांग्रेस देश पर राज कर रही थी, और आज़ादी के बाद से उसने कभी भी हार का मुंह नहीं देखा था.

मध्य प्रदेश की सत्ता का सिंघासन था द्वारका प्रसाद मिश्र उर्फ़ डीपी मिश्र के हाथ में. ये वही डीपी मिश्र हैं जिनके कहने पर सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलने का चलन आया.

पंचमढ़ी उस वक़्त मध्यप्रदेश की गर्मी वाली राजधानी हुआ करती थी. बड़े और रसूख वाले नेता यहाँ गर्मियों में आकर टिके रहते थे. डीपी मिश्र भी गर्मियों भर यहीं से अपना राज- काज सम्भाला करते थे.

यूथ कांग्रेस के उस वक़्त के संयोजक अर्जुन सिंह के नेतृत्व में यहाँ एक अधिवेशन का आयोजन हुआ. अर्जुन सिंह उस वक़्त मझौली के विधायक और तत्कालीन कृषि राज्यमंत्री भी थे.

द्वारका प्रसाद मिश्र ने इस अधिवेशन में रजवाड़ों पर निशाना साधते हुए भाषण दिया, और कहा,

रजवाड़े कभी भी कांग्रेस के नहीं हो सकते. क्योंकि ये लोकतंत्र के खिलाफ हैं. लोकतंत्र में हम किसी को मना नहीं कर सकते इसलिए हमें इन्हें पार्टी में शामिल करना पड़ा. लेकिन हम इनको निष्क्रिय कर देंगे. इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता.’

उस अधिवेशन में कांग्रेस की टिकेट पर सांसद और ग्वालियर रियासत की राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी मौजूद थीं. डीपी मिश्र को शायद ये पता नहीं था की जिनके सामने वो ये सब बोल रहे हैं, वो उनसे इसका बदला लेंगी.

विजयाराजे सिंधिया ने तो मानो इसके बाद डीपी मिश्र से आमने- सामने की लड़ाई ले ली. उन्होंने डीपी मिश्र की राजनीतिक नींव को हिलाने का फैसला कर लिया. इसमें उनके साथ खड़े हुए उनके बेटे माधव राव सिंधिया. सितंबर, साल 1966 में ग्वालियर में छात्रों का एक बहुत बड़ा आंदोलन हुआ. और इस आन्दोलन में पुलिस ने गोली चला दी.

विजयराजे सिंधिया को लगा की उन्हें मुख्यमंत्री डीपी मिश्र से मिलकर उनसे इस बारे में बात करनी चाहिए. यही वज़ह रही की वो इस मुलाक़ात के लिए भोपाल पहुंच गईं. सचिवालय में उन्हें  डीपी मिश्र से मिलने के लिए लंबा इंतज़ार करना हुआ. लेकिन हद तो तब हुई जब वो डीपी मिश्र के चैंबर में पहुँचीं.

डीपी मिश्र की एक आदत सबको मालूम थी की वो हमेशा महिलाओं के आने पर अपनी कुर्सी से खड़े होकर उनको सम्मान देते थे, लेकिन विजयराजे सिंधिया के आने की बात हुई तो वो पहले से ही अंदर अपने कमरे में चले गए.

वज़ह ये की उन्हें विजयाराजे सिंधिया के सामने खड़ा न होना पड़े. विजयाराजे सिंधिया जैसे ही उनके अन्दर पहुँचीं , डीपी मिश्र अपने कमरे से बाहर आए और दुआ- सलाम किये बिना ही ये बोल पड़े,

‘छात्र आंदोलन के अलावा कुछ और चर्चा करनी हो तो बताइए?’

उनके इस सवाल से विजयाराजे सिंधिया गुस्से से भर गईं और साथ ही समझ गईं की मीटिंग के इस दिखावे का वक्त ख़त्म हो चुका है. लेकिन चुनाव सामने ही थे इसलिए उन्होंने 1967 तक इंतजार करना और चुप रहना ठीक समझा.

उनके इलाके में जब टिकट वितरण की बात हुई तो उनकी फिर से डीपी मिश्र और कांग्रेस से ठन गई. विजयाराजे सिंधिया अपने लोगों के लिए टिकट की मांग कर रही थीं,  और डीपी मिश्र कांग्रेस पार्टी की राय के हिसाब से चल रहे थे.

साथ ही डीपी मिश्र ने विजयाराजे सिंधिया और रजवाड़ों पर तंज करते हुए कहा,

‘आपकी रियासतें तो कब की चली गईं. ये संगठन आपका जेबी नहीं है.’

ये बहुत बड़ी बात थी, और विजयाराजे सिंधिया की सहनशक्ति ने जवाब दे दिया, उन्होंने बगावत कर दी, और ग्वालियर के आसपास के जिलों में उन्होंने ‘जनक्रांति दल’ बनाकर अपने अलग प्रत्याशी उतार दिए.

दीवारों पर इन प्रत्याशियों के कुछ अलग ही तरह के पोस्टर चिपकने लगे. इन पोस्टर्स पर लिखा होता था,

‘राजमाता का आशीर्वाद प्राप्त कैंडिडेट.’

विजयराजे सिंधिया ने अपने बेटे माधवराव सिंधिया के साथ मिलकर पूरे ज़ोर- शोर से प्रचार किया. डीपी मिश्र के सितारों ने अभी उनका साथ नहीं छोड़ा था और बुलंदी पर थे. पूरे उत्तर भारत में उस वक़्त कांग्रेस कमजोर हो गई थी.

कई राज्यों में विरोधी दलों के गठबंधन वाली सरकारें बनीं. लेकिन मध्यप्रदेश में कांग्रेस का जलवा अब भी बरकरार रहा. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 167 सीटें मिलीं. इसके बाद हुए उपचुनाव और नगर पालिका चुनाव में भी कांग्रेस का ही जलवा दिखा.

अब विजयाराजे सिंधिया को समझ आ गया था कि वो इस लड़ाई को अकेले नहीं लड़ सकती हैं. उन्हें पता लग गया था कि जनसंघ का साथ मिलने के बावजूद भी, जनक्रांति दल के विधायक काफी नहीं हैं डीपी मिश्र के राज को खत्म करने के लिए. 

विजयाराजे सिंधिया राज घराने से थीं, और उन्हें पता था कि दुश्मन को हारने के हज़ार तरीके होते हैं, और इन्ही हज़ार तरीकों में से उन्होंने एक युगों पुराने तरीके को अपनाया. ये तरीका था दुश्मन के घर से ‘घर का भेदी’ खोजना और उसे खुद के साथ मिला लेना.

खोज शुरू हुई और घर का भेदी बनकर सामने आए डीपी मिश्र के मंत्री और ब्रिज पार्टनर रह चुके गोविंद नारायण. गोविंद नारायण उन दिनों डीपी मिश्र से नाराज़ चल रहे थे. विजयाराजे सिंधिया की तरफ से उन्हें लालच दिया गया मुख्यमंत्री पद का, और कहा कि वो अपने साथी विधायकों संग टूटकर उस पाले से इस पाले में आ जाएँ.

गोविन्द नारायण तैयार तो हुए लेकिन, ऐसे बिना किसी वज़ह के कांग्रेस को छोड़ देना उनपर सवाल खड़े कर देता. वो बस एक रास्ता ढूंढ रहे थे जो उन्हें विजयाराजे सिंधिया तक पहुंचा दे, और उनके दामन पर ‘दल बदलू’ का ठप्पा भी ना लगे.

उनके लिए ये रास्ता बना ‘गुलाबी चना घोटाला’. गुलाबी चने का निर्यात काफी वक़्त से बंद था, और कांग्रेस पार्टी को चंदा जुटाना था. कांग्रेस ने गुलाबी चना व्यापारियों को निर्यात की छूट दी, और शर्त रखी कि बदले में चना व्यापारी कांग्रेस को प्रति बोरी 10 रुपये चंदा देंगे.

कांग्रेस अधिकारियों ने तत्कालीन खाद्य मंत्री गौतम शर्मा के घर को ही व्यापारियों से वसूली का दफ्तर बना डाला, जिसके चलते बात प्रेस के सामने खुल गई, और हर तरफ कांग्रेस की थू-थू होने लगी.

गोविन्द नारायण सिंह को बिना दल बदलू बने दल बदल लेने की वज़ह मिल गई. उन्होंने  19 जुलाई 1967 को सिद्धांतों का हवाला देते हुए 36 विधायकों के साथ कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. जब विधानसभा में शिक्षा विभाग के बजट पर वोटिंग हुई तो ये  विपक्ष के खेमे में जा बैठे और सरकार को गिरवा, खुद मुख्यमंत्री बनकर ही माने.

डीपी मिश्र को अभी तक ऐसा  गुमान  था कि राजभवन में अब भी कांग्रेस ही बैठी है. इसलिए उनके इस्तीफे से विधानसभा को भंग कर दिया जाएगा. लेकिन दिल्ली में भी कांग्रेस का हाल उन दिनों ठीक नहीं था, प्रधानमंत्री पद का निपटारा करने में कांग्रेस को लोहे लग रहे थे. ऐसे में दिल्ली में बैठी कांग्रेस से भी डीपी मिश्र को कोई मदद नहीं मिल सकी.

संविधान के इशारों पर काम चलता रहा. राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने डीपी मिश्र से अपने अपमान का बदला ले लिया था. उन्होंने मध्यप्रदेश से डीपी राज को ख़त्म कर के ही दम लिया.

गोविंद नारायण 1969 तक करीब डेढ़ साल मुख्यमंत्री रहे और सिंधिया राजघराने के हुकुम पर चलते रहे. इस सबसे जब उनका पेट भर गया और सरकार गिर गई तो उन्होंने अपने साथियों के साथ फिर से कांग्रेस का हाथ पकड़ लिया.

गोविन्द नारायण के कांग्रेस में लौट आने से सबको लगने लगा कि डीपी मिश्र अब दोबारा मुख्यमंत्री बन जाएंगे. उनके शपथ लेने तक की बातें चलने लगीं, लेकिन उसी बीच डीपी मिश्र के खिलाफ लगी एक बहुत पुरानी चुनावी याचिका का फैसला आ गया.

साल 1963 में कसडोल सीट पर जो उपचुनाव हुए थे, उनमें डीपी मिश्र के प्रतिद्वंदी रहे कमल नारायण शर्मा ने ये याचिका लगाई थी. उन्होंने याचिका में डीपी मिश्र पर वित्तीय अनियमितता के आरोप मढ़े थे.

इस याचिका पर जबलपुर हाई कोर्ट ने कमल नारायण शर्मा का पक्ष लेते हुए डीपी मिश्र को दोषी पाया. जांच करवाई गई तो पता चला कि कसडोल चुनाव में खर्च की निर्धारित सीमा से 249 रुपये 72 पैसे ज्यादा खर्च हुए थे.

सजा के रूप में डीपी मिश्र को छह साल तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दिया. डीपी मिश्र पीछे हटे और श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बन गए.

डीपी मिश्र के लिए सबकुछ लगभग ख़त्म सा हो गया. प्रदेश और देश के अखबारों में किसी ना खबर के चलते आने वाले डीपी मिश्र, कुछ दिनों तक दोषी बनकर अखबारों में छाये रहे और फिर गायब हो गए.

एक वक़्त के बाद वो फिर से सुर्ख़ियों में लौटे, लेकिन उनका ये लौटना  फिर से एक विवाद के साथ ही हुआ. डीपी मिश्र बीमार हुए तो उनका इलाज चला, और उनके इस इलाज का बिल आया करीब 15 हजार रुपये. इस बिल को मध्य प्रदेश सरकार ने भरा.

अखबारों में ये खबर छपते ही शोर मच गया. डीपी मिश्र को इस सबसे बड़ा धक्का लगा. दुखी होते हुए उन्होंने यहाँ तक कह दिया की उनकी पेंशन से इस रकम की भरपाई कर ली जाए.

इस घटना को बहुत वक़्त नहीं बीता कि कुछ ही महीनों बाद दिल्ली में उन्होंने कुर्सी की राजनीति, और दुनिया की राजनीति, दोनों को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. साल 1988, मई महीने की 5 तारीख को उनका निधन हो गया.

राजनीति, सच में बड़ी अजीब लगती है कभी- कभी. ये वो दुनिया है जहाँ हर कदम फूंक- फूंककर रखना होता है, हर शब्द सोच- समझकर कहना होता है. आप इस दुनिया में कितना भी चमकते रहे हों, लेकिन आपका एक गलत कदम आपको अर्श से फर्श पर ला सकता है.

आपके साथी कब आपके दुश्मन हो जाएँ नहीं पता. आपके अपने कब आपके दुश्मनों के भेदी हो जाएँ नहीं पता. 250 रुपये का खर्च कब आपके राजनीतिक जीवन को लील ले नहीं पता, और 15 हज़ार का इलाज़ कब आपको और बीमार कर दे नहीं पता.

ऐसे में हमें हबीब जालिब की ग़ज़ल का एक शेर जो बहुत याद आता है, वो ये है कि,

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था,

उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था!

देखिये हमारा वीडियो: