गोरा नहीं बल्कि सांवला होना है हमारी ख़ूबसूरती

914

एक किताब है ब्यूटी मिथ, उसमे यह लिखा है कि “अगर स्त्रियां जैसी हैं, वैसे ही खुद को प्‍यार करने लगें तो खरबों डॉलर के उस कॉस्‍मैटिक बिजनेस का क्‍या होगा, जिसका सारा मुनाफा ही इस बात पर टिका है कि तुम जैसी हो, ठीक नहीं हो. हम तुम्‍हें बताएंगे कि तुम्‍हें कैसा होना चाहिए.”

और यह सच भी है… अगर हमेशा हम यह सोच कर चले की हम जैसे है बेस्ट है और हमसे बेहतर कोई नहीं तो शायद उस दिन हम दुनिया के सबसे खुश इंसान होंगे…

वैसे अगर बात करें अपीयरेंस की तो इसको लेकर लोग हमारे देश में या तो ओवर कॉन्फिडेंस रहते या फिर अंडर कॉन्फिडेंस… लुक्स के मायने ही अलग है हमारे यहाँ… और इसमें हमेशा से अहम भूमिका रही है रंग की…गोरे  और सांवले की ….

हमारे समाज की बात करें या फिर हमारे देश के उन छोटे शहारों और कस्बों की तो अगर वहाँ लडकियां गोरी होती है तो उन्हें तवज्जो दी जाति है वहीँ सावंली लडकियां एक तरफ अंडर कॉन्फिडेंस रहती है और उनकी माएं दूसरी तरफ दुखी… वो दुखी इससलिए रहती है कि उनको हमेशा यह भय रहता की उनकी बिटिया की शादी अच्छे घर में नहीं हो पाएगी…. सुनने में यह थोडा हार्श  है …लेकिन यह सच भी है…

वैसे अगर देखा जाए तो हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति में कभी भी गोरे  रंग को ज्यादा अहमियत नहीं दी गयी है … इसलिए तो “सावंलीसलोनी” कह कर खूबसूरती का बखान किया जाता था… और वैसे भी भारतीयों का मूल रंग सावला ही है….

लेकिन देखते देखते मूलता पीछे छूट रही है…  यह पता ही नहीं चल रहा की क्यों लोगों को अपनी ओरिजिनालिटी एक्सेप्ट करने में इतनी तकलीफ होती…

ख़ास कर के जिनका रंग सांवला  होता है…

 हाँ! आज कल के दौड़ में लोग मॉडर्न हो रहे है.. हर  फ़ील्ड में DUSKY लुक वाली लडकियां अपना हाथ आजमा रही… लेकिन ये भी देखने वाली बात है कितनी ऐसी लडकियां है या फिर कितनी ऐसी लड़कियों को मौका मिलता …

अगर हम देखें तो राधिका आप्टे भी अच्छी अदाकारा हैं लेकिन अलिया , दीपिका जैसे लोगों को ज्यादा फिल्म ऑफर होती हैं… वैसे तो इन्हें क्या कहा जाए.. काजोल के 90 के दशक का लुक और आज का लुक देखें तो पता लगेगा की आखिर DUSKY लुक को कितनी तवज्जो मिलती है… अगर bollywood सिर्फ टैलेंट के दम पर चलता तो काजोल, दीपिका और कई actress अपना लुक ट्रांसफॉर्मेशन नहीं कराती… वैसे यह तो बस एक उदाहरण भर था … नजाने ऐसे कई उदाहरण आपको अपने आस पास दिख जाएँगे,…

वैसे आप फेयरनेस क्रीम के मार्किट को ही देख लीजिये … कैसे इन कंपनियों ने “लोगों के अंदर आप जैसे है ठीक नहीं है” वाला attitude डाल दिया है… इसलिए तो अब कॉस्मेटिक के साथ साथ instagram और दुसरे एडिटिंग एप्लीकेशन के फ़िल्टर को इस्तेमाल किया जता है…… जिससे चेहरा खूबसूरत लगे….

इसलिए तो हमेशा से अनफेयर लोगों को फेयर लडकियां चाहिए होती है…सांवली  लड़कियों पर पढ़ने और कॅरियर बनाने का ज्‍यादा जोर है क्‍योंकि शादी के मार्केट में उसकी नैचुरल वैल्‍यू ज्‍यादा नहीं… दरवाजे से बारात लौट जा रही है क्‍योंकि दुल्‍हन काली निकली और एमएनसी में काम करने वाली लड़की आत्‍महत्‍या कर रही है क्‍योंकि काले होकर जीने से तो बेहतर है मौत…

 इन सबके बीच हिंदुस्‍तान में गोरा बनाने वाली क्रीम का बाजार 450 मिलियन डॉलर का हो चुका है….. हमने अपनी मेहनत, अपने श्रम के 450 मिलियन डॉलर गोरा बनाने वाली कंपनियों को दे दिए ताकि वो हमें अपने आप पर और शर्मिंदा होना सिखा सकें…..

ये वही लोग हैं, जिन्‍होंने हाल ही में ब्रिटिश सुपरमॉडल नौओमी कोम्प्बेल की तस्‍वीर छापने से मना कर दिया था, क्‍योंकि वो काली है… ये विज्ञापन सिर्फ एशियाई देशों में नहीं छपा….. गोरों के देश में तो सावंली त्‍वचा वाली ये लड़की सुपर मॉडल है… काले लोगों के देश में शर्मिंदगी की बात…. वैसे आपको बता दें कि गोरे देशों में टैनिंग से बचाने वाली नहीं बल्कि त्‍वचा की टैनिंग बढ़ाने वाली क्रीम ज्यादा मिलती है…

ऐसा नहीं है कि लड़कियों को ही इसका सामना करना पड़ता … लड़कों के साथ भी कई जगहों पर भेद भाव होता है … लेकिन उनका attitude “tall ,dark and handsome” वाला होता है … और वो अपने लुक को लेकर ज्यादा काम्प्लेक्स फील नहीं करतें…. जितना की लड़कियों के अंदर होता या फिर उनके आसपास के लोगों के कारण उनके अंदर आ जता है…. भले ही सोशल मीडिया पर black is beautiful campaign चले लेकिन समाज की सच्चाई तो यही है …

खूबसूरत दिखना गलत बात नहीं…लेकिन आप जैसे है वैसे ही खूबसूरत है … किसी नेचुरल ब्यूटी के आगे आर्टिफीसियल ब्यूटी की कोई अहमियत नहीं .. और यह हमे समझने की ज़रुरत है…