दिवाली पर पटाखे फोड़ने से होता है प्रदुषण, लेकिन बाकी के साल करें तो होता है मनोरंजन

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दिवाली, एक ऐसा त्योहार जिसका लोग महीनों से इंतज़ार करते हैं, जैसे ही ये त्योहार करीब आने लगता है, इस देश में रहने वाले विद्वान वातावरण में बढ़ते प्रदूषण का हवाला दे कर लोगों को पटाखे न जलाने कि हिदायत देने लग जाते हैं. सभी सेलेब्रिटीज़ और नेता सब यही राग अलापते दिखाई दिए,
सागरिका घोष के इस ट्वीट को दिखिए जिसमे वो लोगों को क्रिसमस पर बुरी वाइब्स न फैलाने की अपील करती हैं वहीं दूसरी तरफ होली पर पानी और दीवाली पर पटाखे न जलाने को कहती हैं, इन्हें यहां इस बात से कोई फरक नहीं पड़ता की क्रिसमस पर सजावट के नाम पर कितने पेड़ काटे जाते हैं, या फिर आतिशबाजियाँ करने से कितना पॉल्युशन फैलता हैं, पर नहीं यहां पर वो ज्ञान नहीं बंटटेगी.

अब airtel इंडिया के भी इस ट्वीट को दिखिए जिसमें वो बड़ी खुशी के साथ लोगों को ईद की शुभकामनाएँ दे रहे हैं, भले ही उस दिन लाखों जानवरों के गले काट दिए जाते हों, पर मजाल है वो इस पर कुछ बोल दें, लेकिन दीवाली आते ही लोगों शुभकामनाएँ देने की जगह उनको पॉल्युशन से लड़ने की नसीहत देने लग जाते हैं.

Source: Twitter User

हम यहां पूछना चाहेंगे कि जो इतना सारा ज्ञान इन लोगों के मन में उपजता है, वो सिर्फ हिन्दू रीति रिवाज और त्योहारों पर ही क्यों??? बाकी त्योहारों पर प्रवचन देने कोई सामने क्यों नहीं आता.

इस देश मे दीवाली का त्योहार सिर्फ एक दिन मनाया जाता है, लेकिन इस एक त्योहार पर सभी मीडिया चैनल, सेलेब्रिटीज़ और environmentalists, एयर पॉल्युशन, नॉइज़ पॉल्युशन का हवाला दे कर रोना धोना मचाने लग जाते है, ये बोलते हैं रामायण में पटाखों का उल्लेख नहीं है, तो किस बात के पटाखे. ये वहीं मीडिया चैनल हैं जो 31 december की रात से ही telecast करते हैं, “दुनिया भर में नए साल का जश्न, दुनिया भर में रंगा रंग आतिशबाजियां” इनके मुताबिक 220 देशों द्वारा की जाने वाली आतिशबाजी से प्रदूषण नहीं फैलता, फैलता है तो सिर्फ एक देश में की जाने वाली आतिशबाजी से वो भी सिर्फ दीवाली के अवसर पर. तब ये लोग क्यों नहीं कहते है कि नए साल को ecofriendly तरीके से मनाएं, नए साल पर पटाखे न फोड़ें, नहीं वो ऐसा नहीं बोलेंगे क्योंकि इनके double standards इन्हें इस बात की इजाज़त नहीं देते. इनकी नज़र में तो बस हिन्दू त्योहार ही पॉल्युशन का मुख्य कारण हैं.

सभी बुद्धिजीवियों को पता है इस वक्त दिल्ली में प्रदूषण का मुख्य कारण पटाखे नहीं बल्कि हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण है, लेकिन बजाए इस बात को मानने और स्वीकारने के इन लोगों ने दिवाली पर ही सारा दोष मढ दिया, पूरे साल गाड़ियों से घूमने वाले, चौबीसों घंटे एयर कंडीशन कमरों में बैठने वाले, दिन में 10 10 सिगरेट पीने वाले लोग जब आपको पॉल्युशन पर ज्ञान बंटाते हैं तो उसके कैसे हज़म कर लें. लेकिन यही तो इस देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे ही लोग हमें त्योहार मनाने पर हमे एक अपराधी और गुनहगार होने का एहसास कराते हैं, और हम अंधाधुन्द इनकी बातें मान भी लेते हैं, इनकी बातों में आ कर अपने ही त्योहारों की खिलाफत करने लग जाते हैं.

इनकी बातों पर चलें तो कुल मिला कर अब आप दिवाली पर पटाखे न फोड़ें क्योंकि पॉल्युशन होता है, होली पर पानी न बहाएं क्योंकि लाखों लोगों को पानी नसीब नहीं होता है, महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर दूध जाया न करें क्योंकि बहुतों को नसीब नहीं होता है, मकर संक्रांति पर पतंग न उड़ाएं क्योंकि चिड़ियों को तकलीफ होती है.
वक्त बदल गया लेकिन हिन्दुओं को निशाने पर लेने की आदत नहीं बदली, मुगलों और अंग्रेजों ने जो किया सो किया, भले ही आज हम गुलाम न हों मगर हालात अभी भी नहीं बदले, हमें तब भी सताया गया, और भी सताया जा रहा है