चौथे लोकसभा चुनाव में क्यों पड़ी कांग्रेस में दरार

594

आज़ादी के 20 साल हो चुके थे … देश की बागडोर कांग्रेस पार्टी के हाथ में थी… चौथे लोकसभा चुनाव का समय आ गया था … और कांग्रेस ने अपने 2 दिग्गज नेताओं को खो दिया था … पहले लाल बहादुर शास्त्री और दुसरे पंडित नेहरु… वहीं देश चाइना वार और पाकिस्तान वार से हुई छति से बहार निकलने की कोशिश कर रहा था…

लेकिन चौथे लोकसभा चुनाव में आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस के ग्राफ में तेज गिरावट दर्ज की गई…. 1962 की तुलना में कांग्रेस को 70 सीटें कम मिलीं और पहली बार वह 300 के भीतर सिमट गई… वहीं कांग्रेस के भीतर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उपप्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष चल रहा था…….. एक साल पहले नेतृत्व के लिए हुए संघर्ष में सत्ता की बागडोर इंदिरा गांधी को मिली थी…. हालांकि इन सबका नतीजा चुनाव के बाद पार्टी के विभाजन के रूप में देखने को मिला। पेश है लोकसभा चुनाव की चौथी किस्त…

कांग्रेस की लोकप्रियता लोगों में घटने लगी थी…पहले के तीन आम चुनावों में उन्हें प्रचंड बहुमत मिले थें… उसके मुकाबले इस चुनाव में पार्टी को 40.78 फीसद वोट मिले थे ….. मतलब की 520 में से 283 सीटें मिली थीं….इस चुनाव में कांग्रेस को तीसरे लोकसभा चुनाव के मुकाबले 78 सीटें कम मिली थीं…सिर्फ इतना नहीं हुआ था …उस साल छह राज्यों में हुए चुनावों में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था…. यह पहली बार हुआ था जब कांग्रेस को 300 से कम सीटें मिलीं…..

हर बार जबरदस्त बहुमत पाने वाली कांग्रेस पार्टी इस साधारण बहुमत से खुश नहीं थी… ख़ास कर के प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी… वैसे उन्होनें अपने जिद्दी स्वभाव का परिचाय देते हुए पार्टी के विपरीत की फैसले लिए…इससे कांग्रेस के भीतर चल रहा आंतरिक घमासान सतह पर आ गया….

बहरहाल नवंबर, 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया गया…इसके चलते कांग्रेस में विभाजन हो गया…. मोरारजी देसाई के नेतृत्व में कांग्रेस (ओ) और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस (आर) पार्टियों का गठन हुआ…. इंदिरा कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग से अल्पमत सरकार चलाती रहीं और 1971 में समय से एक साल पहले ही नए चुनावों की घोषणा हो गई…..

वैसे उनदिनों कुछ ऐसी भी पार्टियां थी जिनका प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था… सी राजगोपलाचारी की स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ का प्रदर्शन बेहतर था ….उन्होंने 44 और 35 सीटें जीतीं….स्वतंत्र पार्टी एक मात्र सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के तौर पर बनकर उभरी थी… वहीं वामपंथियों और समाजवादियों ने 83 सीटें जीतीं….. क्षेत्रीय दलों द्रमुक और अकाली दल ने भी 28 सीटों पर कब्जा जमाया था … हालांकि सोशलिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद बनी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को 23 सीटें मिली..

1967 का चुनाव हर मामले में दिलचस्प था… इंदिरा धुआंधार प्रचार कर रही थीं… यहाँ तक कि भुवनेश्वर की एक रैली में भीड़ की तरफ से मारे गए पत्थर से इंदिरा की नाक की हड्डी टूट गई थी… लेकिन उसके बाद भी वह मुंह पर प्लास्टर लगाए चुनाव प्रचार कर रहीं थी …. वहीँ दूसरी और की दिग्गज नेता चुनावी मैदान में पहली बार उतारे थे .. इंदिरा गांधी, जॉर्ज फर्नांडीस, रवि राय, नीलम संजीव रेड्डी, युवा तुर्क रामधन जैसे नेता इस लिस्ट में शामिल थे…..

हालांकि इंदिरा गांधी रायबरेली से जीतीं….जहां से पहले उनके पति फिरोज गांधी जीतते थे….
वहीं प्रखर समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने 1963 में फर्रुखाबाद से उपचुनाव जीता था…. लेकिन 1967 में ही पहली बार जीतकर लोकसभा पहुंचे थे …