दिल्ली की जनता के मूड के हिसाब से बदलती है देश की सत्ता

आम चुनाव में देश की राजधानी दिल्ली की 7 लोकसभा सीटें देश के सियासत की  झलक दे जाती है..बीते 23 सालों को देखे तो भारत की सत्ता पर वही राजनीतिक पार्टी ने अपना दमखम दिखाया है जिसने लोकसभा चुनाव में दिल्ली की जनता का विश्वास जीता है..इस अवधि में दिल्ली के लोगों ने कभी बीजेपी तो कभी कांग्रेस को सत्ता की जिम्मेदारी सौंप दी है..

इसलिए ऐसा कहा जाए कि दिल्ली में लोकसभा चुनाव कांग्रेस और बीजेपी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सीटों का आंकड़ा बढ़ाने के लिए ही जरूरी नहीं है बल्कि इसके कई और मायने हैं..

23 साल पहले यानि की 1996 से दिल्ली का साथ उसी पार्टी को मिला है जिसने केंद्र में अपनी सरकार बनाई है..1996 में बीजेपी ने दिल्ली की सात में से 6 लोकसभा सीटें जीती थी..तब बीजेपी के तरफ से पहली बार वाजपेयी प्रधानमंत्री बने..हालांकि उस वक्त वाजपेयी 13 दिनों के लिए ही देश के प्रधानमंत्री बने थे..

11वीं लोकसभा चुनाव के बाद दो साल में ही देश को तीन प्रधानमंत्री मिले..1998 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को दिल्ली में 7 में से 6 सीटें मिली. तब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी ने कई दलों के सहयोग से एनडीए बनाई और केंद्र में गठबंधन की सरकार बनाई. गठबंधन की ये सरकार महज 13 महीने चली और 1999 में एक बार फिर से लोकसभा चुनाव हुए..

1999 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने दिल्ली की सभी सातों सीटों पर जीत हासिल की. इस बार भी हालांकि केंद्र में पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला लेकिन बीजेपी ने केंद्र में गठबंधन की सरकार बना ही ली. अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने..और इस बार बीजेपी को पहली बार 5 सालों के लिए प्रधानमंत्री मिला..

2004 के लोकसभा चुनाव में सत्ता का चक्र ऐसा घुमा, कि दिल्ली के लोगों का बीजेपी से मोहभंग हुआ और बीजेपी को यहां महज 1 सीट मिली..जबकि कांग्रेस को दिल्ली में 6 सीटें मिली..और कांग्रेस ने डॉ मनमोहन सिंह के रुप में देश को नया प्रधानमंत्री दिया..2009 की बात करें तो दिल्ली में वोटिंग का पैटर्न लगभग पहले जैसा ही रहा..इस बार कांग्रेस ने दिल्ली में अपनी पकड़ और भी मजबूत कर ली और बीजेपी को जीरो सीटें देकर..सभी सातों सीटों पर अपना परचम लहराया. डॉ मनमोहन सिंह दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने…ये ऐसा मौका था जब दिल्ली के लोगों ने ये साबित कर दिया कि जो उनका मिजाज रहता है..उसी रास्ते पर देश भी चलता है..

लोकसभा चुनाव 2014 में दिल्ली का मिजाज फिर से बदला और कांग्रेस पार्टी अपनी 2009 की सफलता को दोहराने में सफल नहीं रही और 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर ऐसी चली कि कांग्रेस उस लहर में बह गई..2014 में दिल्ली की सभी सातों सीटें कांग्रेस के कब्जे से चली गईं और बीजेपी के खाते में आ गई और केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी..हालांकि, साल 2013 में ही दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी दस्तक दे चुकी थी, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में AAP कोई भी छाप छोड़ने में नाकामयाब रही..

बहरहाल, दिल्ली में चुनावी मुद्दों की बात करें तो यहां पार्टियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर ट्रैफिक जाम, आतंकवाद से लेकर बेरोजगारी और पलूशन से लेकर पार्किंग तक मुद्दे उठाए। समाज के सभी वर्गों को राजनीतिक दलों ने संबोधित करने की कोशिश कि है..2019 के लोकसभा में दिल्ली में कांग्रेस, बीजेपी और आम आदमी पार्टी तीनों ही पार्टियां पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ रही हैं..और इस बार भी ये देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली के चुनावी नतीजे कोई नया चुनावी समीकरण बनाएंगे या फिर वहीं पुराने पैटर्न को दोहराएंगे?

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