2008 में वायुसेना ने लद्दाख में किया था ये काम, UPA सरकार को पता चला तो भड़क गई ‘हमसे बिना पूछे क्यों किया?’

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चीन से टक्कर लेने के लिए भारत ने सिमाई इलाकों ने इन्फ्रास्ट्रक्चर काफी मजबूत किया है. सड़क निर्माण, पुल निर्माण और हवाई पत्तियों के निर्माण ने न सिर्फ भारतीय सेना के मूवमेंट को आसान उर सुविधाजनक बना दिया है बल्कि लद्दाख के दुर्गम इलाकों में भी सेना को सैनिक साजोसामान और रसद पहुँचाना आसान हो गया है. इस काम में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैऊ दौलत बेग ओल्डी हवाई पट्टी ने. इस हवाई पट्टी को 1962 में शुरू किया गया था लेकिन तीन साल बाद ही 1965 में इसे बंद कर दिया गया. उसके बाद ये हवाई पट्टी 43 सालों तक बंद रहा. दौलत बेग हवाई पट्टी के महत्त्व को आप इस बात से समझिये कि यहाँ से पाकिस्तान और चीन दोनों की गतिविधियों पर नज़र रखी जा सकती है. दौलत बेग हवाई पट्टी काराकोरम दर्रे से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है.

1965 के बाद से 43 सालों तक दौलत बेग ओल्डी हवाई पट्टी को शुरू कर की कोशिश की जाती रही. कई बार केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी गई लेकिन हर बार ये बात बस फाइलों में ही घुमती रह जाती. उसके बाद तत्कालीन वाइस चीफ एयर मार्शल प्रणब कुमार बारबोरा ने इस हवाई पट्टी को फिर से शुरू किया. इस बात की जानकारी केंद्र की तत्कालीन UPA सरकार और तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी को भी नहीं दी गई. ये सब अत्यंत गुप्त रूप से हुआ. इसका खुलासा खुद रिटायर्ड वाइस चीफ एयर मार्शल प्रणब कुमार बारबोरा ने एक इंटरव्यू में किया. उन्होंने खुलासा किया कि दौलत बेग हवाई पट्टी को शुरू करने के बाद इसकी जानकारी यूपीए सरकार को दी गई तो सरकार ने पूछा कि बिना हमने पूछे इसे क्यों शुरू किया गया?

लद्दाख में 16,800 फुट की ऊंचाई पर स्थित दौलत बेग हवाई पट्टी दुनिया के सबसे ऊँचे लैंडिंग ग्राउंड्स में से एक है. यहाँ पर एएन-32 और सी-130जे सुपर हरक्युलिस जैसे विमान आसानी से उतारे जा सकते हैं. इस हवाई पट्टी ने लद्दाख में भारत की पोजीशन को बहुत मजबूत बना दिया. काराकोरम दर्रा यहाँ से बस कुछ ही किलोमीटर दूर है. यहाँ से सियाचिन में चीन की गतिविधियों पर तो नज़र रखी ही जा सकती है साथ ही सियाचिन ग्लेशियर की तरफ से पाकिस्तान के मूवमेंट पर भी नज़र रखी जा सकती है.