अमन की बात करने वाला पाकिस्तान अपने मदरसों में कौन सी पढ़ाई करवाता है?

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स्कूल, मदरसा, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, या अन्य कोई शिक्षण संस्थान, सभी को उम्मीद होती है कि उनके घर के नौनिहाल इन जगहों से कुछ बनकर ही निकलेंगे.

वो साल था 1866 जब इस्लाम के कुछ विद्वानों ने मिलकर दीन की तालीम को आगे बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश के देवबंद में एक नया मदरसा खोलने का फैसला लिया. इसे खोलने के लिए तय किया गया हिजरी सन की शुरुआत करने वाला मुहर्रम का महीना और मुहर्रम का ही दिन.

एक मस्जिद हुआ करती थी देवबंद कस्बे में जो छत्ता मस्जिद कही जाती थी. इसी मस्जिद के पास पहली बार मदरसे का पहला सबक दिया गया. और इसी पहले सबक के साथ कस्बे में नींव पड़ गयी दारुल उलूम देवबंद की.

इसकी शुरुआत तो दीन की पढ़ाई- लिखाई के लिए की गयी थी, लेकिन वक़्त के साथ ये बदलता गया, और बदलता ही गया. यहाँ से शुरुआत में इस्लाम के कुछ बड़े विद्वान बनकर निकले और दुनिया में दारुल उलूम देवबंद को मशहूर कर गए.

पढ़ाई- लिखाई के नाम पर शुरू हुआ दारुल उलूम देवबंद एक वक्त के बाद धार्मिक सुधारों और फतवों का गढ़ बनकर रह गया. यहाँ की शिक्षा कुरआन और हदीसों के बीच फंसकर एक सुधारवादी आन्दोलन का रूप लेने लगी. खुद को सूफी इतिहास से जोड़ने वाला दारुल उलूम देवबंद बस किताबों में ही सूफी रह गया.

आज़ादी के बाद देश बंट गया और एक नया देश पाकिस्तान के रूप में हमसे कटकर अलग हो गया. मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी सीमा के उस पार पाकिस्तान चली गई. लेकिन पाकिस्तान के रहने वाले बहुत से छात्र थे जो दारूल उलूम देवबंद में पढ़ते थे. वो देवबंदी विचारधारा को मानने वाले थे, और पाकिस्तान में दारुल उलूम देवबंद का झंडा बुलंद करने को तैयार थे.

इसी के चलते पाकिस्तान में दो ऐसे मदरसे खड़े हुए जो खुद को देवबंदी परंपरा से प्रेरित बताते आये हैं. जामिया उलूम-उल-इस्लामिया और दारुल उलूम हक्कानिया.  

जामिया उलूमउलइस्लामिया

पाकिस्तान में खैबर-पख्तूनख्वा का रहने वाला सैय्यद यूसुफ़ बिनोरी अपनी शुरुआती पढ़ाई करने के बाद उत्तर प्रदेश के मदरसे दारुल उलूम देवबंद में पढ़ने चला आया. यहाँ से पढ़ने के बाद वो सूरत गया और फिर वहाँ की पढ़ाई ख़त्म कर मिस्त्र के दौरे पर निकल गया.

वहाँ से भारत लौटकर आया तो सूरत में उसी जगह पढ़ाने लगा जहां से खुद पढ़ाई की थी. देश जब बंटा तो ये भारत से पाकिस्तान चला गया. और साल 1954 में कराची में एक नए मदरसे ’जामिया उलूम-उल-इस्लामिया’ की शुरुआत की.

दावा था देवबंद परंपरा का मदरसा बनाने का, लेकिन बहुत से छात्र जो यहाँ से पढ़कर निकले वो साउथ एशिया में इस्लामिक आतंकवाद का चेहरा बने. जैश- ए- मोहम्मद को खड़ा करने वाला मसूद अजहर, तालिबान को बनाने वाला मुल्ला उमर, अल- कायदा का साउथ एशिया इंचार्ज असीम उमर, सिपाह- ए- सहाबा का बड़ा नाम आज़म तारिक, या फिर हरकत-उल-जिहाद-अल इस्लाम का फाउंडर क़री सैफुल्ल़ा अख्तर, सब कभी ना कभी यहाँ से तालीम हासिल कर चुके हैं.

दारुल उलूम हक्कानिया

पाकिस्तान में दारुल उलूम परंपरा का दूसरा मदरसा खड़ा करने वाला मौलाना अब्दुल हक भी दारुल उलूम देवबंद से पढ़ चुका था. वो पेशावर के अकोरा खटक का रहने वाला था. दारुल उलूम देवबंद से पढ़ाई पूरी करने के बाद वो वापस अपने घर गया और घर के पास ही एक मदरसा खोल लिया.

कुछ ही वक़्त बाद साल 1943 में उसके पास दारुल उलूम देवबंद की तरफ से नौकरी का ऑफर पहुंचा. और वो पेशावर से उत्तर प्रदेश आकर दारुल उलूम देवबंद में पढ़ाने लगा.

करीब दो साल बाद, 1947 में जब वो छुट्टी मानाने अपने घर गया तो आज़ादी के साथ बंटवारे की घोषणा भी हो गई. दंगों की आग भड़क उठी और देश इस आग में जलने लगा. सडकें बंद हो गईं और पेशावर से उतर प्रदेश के देवबंद तक पहुंचना लगभग नामुमकिन सा हो गया.

अब्दुल हक ने वहीँ रहने और अपने ही मदरसे में पढ़ाने का फैसला लिया. दारुल उलूम के और भी बहुत से छात्र जो वहां रह गए थे. वो भी उसी मदरसे में पढ़ने लगे, और यहाँ से चालू हो गया दारुल उलूम हक्कानिया.

1989 में जब सोवियत- अफगान के बीच की लड़ाई ख़त्म हुई तो तुरंत अफगानिस्तान सिविल वॉर में डूब गया. कंधार के रहने वाले मुल्ला उमर ने एक संगठन बनाया जिसमें मदरसों से पढ़े हुए छात्रों को शामिल किया गया. इस संगठन में सबसे ज्यादा दारुल उलूम हक्कानिया के छात्र शामिल थे. यही संगठन आगे चलकर आतंक का दूसरा नाम ‘तालिबान’ हो गया.

कुल मिलाकर दोनों ही मदरसे दारुल उलूम देवबंद का झंडा उठाये घूम रहे हैं. और दोनों ही सीधे तौर पर आतंकवाद से जुड़े हुए हैं. सिर्फ भारत का दारुल उलूम देवबंद ही बचा जिसके सम्बन्ध सीधे तौर पर आतंकवाद से नहीं दिखे. हालांकि अभी हाल ही में यहाँ से भी जैश- ए- मोहम्मद के दो आतंकियों को पकड़ा गया है.

इसके अलावा दारुल उलूम देवबंद का ऊट- पटांग फतवे जारी करने को लेकर भी लंबा इतिहास रहा है. इसने कभी इस्लाम के तहत सोशल मीडिया पर फोटो डालने को हराम बताया, तो कभी मुस्लिम महिलाओं का गैर मर्दों से चूड़ी पहनने को लेकर फतवा जारी कर दिया.

अपने एक फतवे में दारुल उलूम देवबंद ने महिलाओं के बारात में जाने को नाजायज करार दिया, तो एक फतवे में उनके नेल पॉलिश लगाने और चुस्त कपड़े पहनने पर पाबंदी लगा दी.

इतना ही नहीं दारुल उलूम देवबंद ने औरतों के फुटबॉल मैच देखने तक को ही हराम बता दिया.

बहुत कुछ देखा है दुनिया में हमने भी आजतक, और ये बहुत कुछ देखने के बाद जो थोड़ा बहुत हम दुनिया से सीख पाए हैं, उससे बस इतना ही समझ आता है कि, कुछ भी पढ़ने से पहले इंसान को इंसानियत पढ़ लेनी चाहिए. कुछ भी समझने से पहले एक इंसान सामने वाले इंसान को समझ ले, और जान ले कि उसकी वज़ह से किसी को नुकसान तो नहीं पहुँच रहा.

इंसान अगर इंसान को पढ़ ले, इंसानियत को याद कर ले, तो फिर पूरी दुनिया में कोई भी नहीं है जो उसे बन्दूक उठाने पर मजबूर कर दे. और मजबूर कर दे उसे हिंसा करने के लिए. तालीम कोई भी हो, इंसानियत से जुड़ी होती है तो दुनिया में मिसाल बन जाती है.

देखिये हमारा ये वीडियो: