सिर्फ एक फेसबुक पोस्ट के लिए एक छात्रा को कोर्ट ने दी ऐसी सजा कि मच गया हंगामा

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जरा सोचिये कि आपने सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट डाला. उस पोस्ट से किसी की भावना आहत हो गई. आपके खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी किसी ने कि आपकी पोस्ट भड़काऊ है, उससे भावना आहत होती है. पुलिस आपको गिरफ्तार करेगी, आपको कोर्ट में पेश किया जाएगा, हो सकता है कोर्ट आपसे माफीनामा लिखवा कर आपको छोड़ दे, या फिर जमानत राशि जमा करवा कर आपको छोड़ दे. अक्सर होता भी यही है. लेकिन अगर कोर्ट आपको कहे कि आपको प्रायश्चित करने के लिए कुरआन दान करना पड़ेगा या बांटना पड़ेगा तो आप इसे क्या कहेंगे? ये कोई कल्पना नहीं है बल्कि ये सच है.

घटना है झारखण्ड की. ऋचा भारती ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाला जिसके कारण मुस्लिमों की भावना आहत हो गई. ऋचा के खिलाफ झारखण्ड के पिठौरिया क्षेत्र के सदर अंजुमन इस्लामिया कमिटी के मंसूर खलीफा ने FIR दर्ज करवाया. 12 जुलाई को पुलिस ने ऋचा को मुस्लिमों की भावना को ठेस पहुंचाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. ग्रेजुएशन की छात्रा ऋचा को कोर्ट ने जमानत तो दे दी लेकिन शर्तों के साथ और कोर्ट ने शर्त भी ऐसी रखी जिसे सुन आप सोच में पड़ जायेंगे कि ये भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश की अदालत का फैसला है या किसी इस्लामिक राष्ट्र के शरिया अदालत का .

कोर्ट ऋचा को आदेश दिया कि 15 दिनों के भीतर ऋचा कुरआन की 5 प्रतियाँ खरीद कर उसे दान करेगी या फिर बांटेगी. इस पांच प्रतियों में से एक प्रति पिठौरिया के सदर अंजुमन इस्लामिया कमिटी को और चार प्रतियाँ सरकारी स्कूल और कॉलेजों में दान करेगी. रिचा के वकील राम प्रवेश सिंह ने कहा, “अदालत ने सशर्त जमानत दी है। इसके तहत रिचा को प्रशासन की मौजूदगी में अंजुमन इस्‍लामिया को कुरान की एक प्रति सौंपनी होगी और उसकी रशीद लेनी होगी साथ ही अगले 15 दिन के अंदर पांचों की रशीद कोर्ट में जमा करनी होगी.”

कोर्ट के इस फैसले के बाद ये तय करना मुस्किल है कि ये भारतीय न्यायपालिका का फैसला है या मुस्लिम लॉ बोर्ड का. जरा सोचिये अगर यही फैसला कोर्ट ने किसी मुस्लिम के खिलाफ दिया होता. अगर कोर्ट ने किसी मुस्लिम दोषी को कहा होता कि गीता की 5 प्रतियाँ खरीदों और एक प्रति मंदिर में दान करो. तो इसपर कितना विवाद होता ये किसी से छुपा नहीं है. कोर्ट पर भगवाकरण के आरोप लगते, कहा जाता कि अब न्यायपालिका में भी संघ के लोग घुस गए हैं या फिर देश में असहिष्णुता बढ़ गई होती और गंगा जमुनी तहजीब खतरे में आ गई होती.

न्यूज चैनल भी इस मसले पर डिबेट कर रहे होते और फिर विपक्ष ये कहता है इस देश में मुसलमानों पर अत्याचार किया जा रहा है और ये देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की साजिश है. न्यायपालिका का काम होता है न्याय करना. ना कि मजहबी नजरिये से फैसला करना लेकिन लगता है कि कोर्ट के पास बहुत सा खाली वक़्त है और इसलिए वो अब न्याय करने के बजाये लोगों से प्रायश्चित करवा रही है.