इंग्लिश बोलने से तमिल, तेलुगु को खतरा नहीं होता तो हिंदी बोलने से खतरा कैसे हो जाता है?

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क्या हिंदी राष्ट्रभाषा है? क्या हिंदी पुरे देश में बोली जानी चाहिए? इस सवाल पर इनदिनों बवाल मचा हुआ है. दरअसल ये बवाल नया नहीं है. बल्कि ये हर साल हिंदी दिवस के मौके पर खड़ा हो जाता है. इस बार भी ये विवाद खड़ा हुआ और इसकी वजह बनी 14 सितम्बर हिंदी दिवस के मौके पर गृहमंत्री अमित शाह के एक भाषण से.

अमित शाह ने हिंदी दिवस के मौके पर कहा था कि “अनेक भाषाएँ और अनेक बोलियाँ हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत है. लेकिन जरूरत है देश की एक भाषा हो जिससे विदेशी भाषाओँ को जगह न मिले. इसी वजह से हमारे पूर्वजों और स्वंत्रता सेनानियों ने एक राजभाषा की परिकल्पना की और हिंदी को अपनाया.” उन्होंने कहा, “आज देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वो सर्वाधिक बोले जाने वाली हिंदी भाषा ही है.” सारे विवाद की जड़ ये एक लाइन ही है कि ”आज देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वो सर्वाधिक बोले जाने वाली हिंदी भाषा ही है.”

कांग्रेस समेत दक्षिण भारत के कई नेता अमित शाह के बयान और हिंदी के खिलाफ मुखर हो गए. कांग्रेस ने डीएमके ने भी इस बयान का विरोध किया. अभिनेता से नए नए राजनीतिज्ञ बने कमल हासन हिंदी के विरोध में कुछ ज्यादा ही उग्र हो गए और उन्होंने कहा, “भारत 1950 में ‘अनेकता में एकता’ के वादे के साथ गणतंत्र बना था और अब कोई ‘शाह, सुल्तान या सम्राट’ इससे इनकार नहीं कर सकता है” उन्होंने ये भी कहा कि, सभी भाषाओं का सम्मान करते हैं लेकिन उनकी मातृभाषा हमेशा तमिल रहेगी.” उन्होंने लगभग चेतावनी भरे लहजे में कहा, “जल्लीकट्टू तो सिर्फ विरोध प्रदर्शन था। हमारी भाषा के लिए जंग उससे कई गुना ज्यादा होगी.

सवाल ये है कि हिंदी को लेकर इतनी नफरत क्यों? अमित शाह ने ये तो नहीं कहा कि तमिलनाडू के लोग तमिल बोलना छोड़ दें, गुजरत के लोग गुजराती बोलना छोड़ दें, या महाराष्ट्र और बंगाल के लोग मराठी और बांगला बोलना छोड़ दें फिर इतना हंगामा क्यों? विवाद तो तब होना चाहिए था जब सरकार कहती कि हिंदी बोलना ही होगा नहीं तो जेल भेज देंगे. लेकिन सिर्फ इतना कहने पर कि हिंदी में वो क्षमता है कि वो विश्व मानचित्र पर भारत का प्रतिनिधित्व कर सके इसमें इतना उग्र होना समझ से परे है.

इस देश में हज़ार से ज्यादा भाषाएँ हैं. एक ही राज्य में हर 100 किलोमीटर पर भाषा या यूँ कहें कि बोली बदल जाती है. हर राज्य कि अपनी एक भाषा है. किसी किसी राज्य में तो तीन भाषाएँ हैं. मैं बिहार की बात बताता हूँ, चंपारण में बज्जिका बोली जाती है. जब 100 किलोमीटर पार करते हैं तो भाषा मैथिलि हो जाती है. फिर 100 किलोमीटर आगे बढ़ते हैं तो पटना और गया की तरफ मगही बोली जाती है. जिस देश में भाषा और संस्कृति में इतनी विविधता हो वहां एक भाषा बोलने वालों का दूसरी भाषा के प्रति ऐसा व्यवहार और इतनी नफरत वाकई समझ से परे है.

उत्तर भारत के राज्यों में जितनी भाषाएँ हैं उनसब की लिपि देवनागरी है जिस कारण उत्तर भारत के लोग हिंदी को सहजता से बोलते और आसानी से समझते हैं. लेकिन इसका मतलब ये नही कि हिंदी भाषी लोग तमिल और तेलुगु से नफरत करते हैं. लेकिन राजनीति ने जैसा जहर तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ बोलने वालों में मन में हिंदी के प्रति भरा है उसकी मिसाल कही नहीं मिलेगी.

आज के जमाने में लोग एक से अधिक भाषाएँ सीखना चाहते हैं. जब कोई भारतीय फ्रेंच, चाइनीज, जर्मन या इंग्लिश सीखने से गुरेज नहीं करता तो फिर हिंदी के प्रति इतनी नफरत? दक्षिण भारतीयों ने अगर कोई विदेशी भाषा सीखी तो क्या उनकी पहचान और संस्कृति नष्ट हो गई? नहीं न, फिर हिंदी बोलने या सीखने की बात से आपनी अस्मिता, संस्कृति और भाषा पर खतरा कैसे आ जाएगा? तमिल या तेलुगु संस्कृति पर खतरा तो तब होगा जब कोई आपको कहे कि तमिल बोलोगे तो जेल में डाल देंगे, तमिल बोलोगे तो जेल में डाल देंगे, तमिल फिल्म नहीं बना सकते, तमिल चैनल नहीं चलेंगे. तब समझ में आता कि तमिल या तेलुगु या कन्नड़ या मलयालम पर खतरा है लेकिन यहाँ तो किसी ने ऐसी कोई बात या कोशिश नहीं की. फिर भी इतना गुस्सा और इतनी नफरत. आखिर क्यों भाई?

पुरे उत्तर भारत में हिंदी अलग अलग तरीके से बोली जाती है इसलिए इस भाषा को बोलने वालों की संख्या अधिक है तो इसलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने परिकल्पना की गई या फिर अब भी तो यही बात कही जा रही है. ये तो नहीं कहा जा रहा कि आपकी तमिल या तेलुगु को ख़त्म कर दिया जाएगा. इंग्लिश सीखने और बोलने से आपकी संस्कृति ख़त्म नहीं हुई. आपको गर्व महसूस होता है लेकिन हिंदी की बात आते ही आपकी संस्कृति खतरे में आ जाती है. आपको शर्म महसूस होने लगती है, ऐसा क्यों? सिर्फ इसलिए कि राजनितिक पार्टियों ने अपने फायदे के लिए आपके मन में एक दुसरे के प्रति जहर भर दिया. एक दुसरे की भाषाओँ के प्रति जहर भर दिया. सोचिये कि आप कहाँ जा रहे हैं और किसके हाथों में खेल रहे हैं?

विचार कीजिये कि क्या वाकई हिंदी को बढ़ावा देने भर से आपकी संस्कृति ख़त्म हो जायेगी? बिहार की भाषा भोजपुरी है लेकिन वहां हिंदी बोली जाती है. इससे भोजपुरी भाषा ख़त्म तो नहीं हो गई. मैथिलि भाषा ख़त्म तो नहीं हो गई. उत्तर प्रदेश में हिंदी बोलने से क्या अवधी भाषा ख़त्म हो गई? नहीं न तो फिर हिंदी से किसी और भाषा को क्या खतरा हो सकता है?