कांग्रेस की वो गलती जिसका भुगतान मुस्लिम महिलाओं ने दशकों तक किया !

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“ज़िन्दगी ना हुई ‘हाय’ जीते जी मज़ाक हो गया,
तलाक तलाक तलाक, और तलाक हो गया!”

कुछ इसी तरीके ही तलाक ए बिद्दत में पति तलाक लिया करते थे। लेकिन हाल ही में एनडीए सरकार ने काफी परिश्रम के बाद, मुस्लिम पर्सनल लॉ के इस बेहूदा कायदे या यूं कहें एक कायराना रिवाज पर रोक लगाकर बड़ा कदम उठाया।

लेकिन क्या आप जानते हैं मुस्लिम महिलाओं की यह लड़ाई कोई 5-10 वर्ष पुरानी नहीं है। यूं तो इतिहास में तलाक ए बिद्दत के कई केस अदालतों में आए लेकिन एक केस ऐसा था जिसे इस बदलाव का बीज भी कहा जा सकता है।

असल में भारत में तीन तलाक आज से तीन दशक पहले ही खत्म हो जाता परंतु राजनीति के नशे में धुत्त कोंग्रेस सरकार ने ऐसा होने ना दिया। अब इसे कोई ऐतिहासिक त्रसिदी कहें या उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर कट्टरपंथियों का दबाव, सच्चाई तो यही है कि राजीव गांधी सरकार अपने वोट बैंक के लिए अंधी हो गई थी।

चलिए आपको ले चलते हैं 30-40 साल पीछे। 1975 में मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में एक जाने मानें वकील, मोहमद अहमद खान ने अपनी पहली बीवी को तलाक दे दिया और 62 वर्ष की महिला के साथ 5 बच्चों को घर से निकाल दिया। उस महिला का नाम था – शाहबानो। खान साहब ने शाहबानो को मेंटेनेंस यानी गुज़ारा भत्ता देने से भी मना कर दिया। उन्हें क्या पता था कि उनकी ये हरकत एक दिन देश की न्यायप्रणाली से लेकर सियासती गद्दियों तक को हिला डालेंगी।

अब ऐसा होने पर आप सोचेंगे की एक 62 वर्षीय महिला क्या ही कर लेगी?
लेकिन शाह बानो शांत नहीं बैठी। उन्होंने इंदौर के मजिस्ट्रेट कोर्ट में केस दर्ज किया। जो वहां से मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुंचा और अंत में खान साहेब की ही अपील पर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। तीनों ही अदालतों ने शाहबानो के पक्ष में निर्णय दिया। अदालत का कहना था कि सीआरपीसी का सेक्शन 125 देश के सभी धर्मों के लिए समान है। इसलिए मुसलमान तलाकशुदा महिला को भी हक है कि वह अपने पति से गुजारा भत्ता मांगे।
लेकिन खान साहेब की दलील थी कि – भैया, हम तो मुस्लिम पर्सनल लॉ को ही मानेंगे। और उसके तहत तलाक के इद्दत यानी 3 महीने बाद से तलाकशुदा बीवी से कोई भी रिश्ता इस्लाम में हराम है। इसलिए हम कोई गुजारा भत्ता नहीं देंगे।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल 1985 को अंतिम निर्णय सुनाया,जिसके अनुसार खान साहब को शाहबानो को प्रति मास 500 रुपए गुज़ारा भत्ता देना होगा।

इस फैंसले को सुन कर देश में शरीयत के नाम पर ढोल बजाने वाले मुसलमान धर्मगुरु और नेताओं के तो गले ही सूख गए। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम महिलाओं में खुशी की लहर थी।

लेकिन जल्द ही इस खुशी की लहर पर एक ग्रहण लगा। क्योंकि फिल्म में क्लाइमैक्स अभी बाकी था।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का इस निर्णय के विरोध में उतरना प्रत्याशित था। देश को झटका तो तब लगा जब उस समय की कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम बोर्ड के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया। शाहबानो अदालतों में तो जीत गई पर सरकार के सामने हार गई।

1986 में इंडियन नैशनल कांग्रेस ने एक ऐसा महिला विरोधी अधिनियम पारित किया जिसने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को ही पलट दिया। उस अधिनियम का नाम था –मुस्लिम महिला ( तलाक पर अधिकार संरक्षण ) अधिनियम, 1986

इस अधिनियम के तहत शाहबानो को तलाक देने वाले पति खान साहब गुज़ारा भत्ता के दायित्व से मुक्त हो गए। और तो और इस अधिनियम ने मुस्लिम महिलाओं से गुजारा भत्ता की मांग को लेकर अदालत के दरवाजे पर जाने का अधिकार भी छीन लिया। राजीव गांधी सरकार का यह अधिनियम, मानो मुस्लिम पर्सनल लॉ का फोटोकॉपी था।

राजीव गांधी चाहते तो अपने राजनैतिक लाभ और वोट बैंक के दलदल से ऊपर उठ कर, पुराने कायदों को पीछे छोड़कर, एक अच्छा फैंसला ले सकते थे। लेकिन शायद उन्हें वोट बैंक की ज़्यादा टेंशन थी। करीब तीन दशक बाद, इस गलती को एनडीए सरकार ने सुधारा। 1975 में अपना संघर्ष शुरू करने वाली शाहबानो की असल जीत मानों 2019 में हुई हो। ये किस्सा हमारे आगे कई सवाल खड़े कर देता है…

  • क्या कांग्रेस, धर्मनिरपेक्षता का टैग लगाने योग्य है?
  • इंसाफ और धर्म में एक सरकार के लिए क्या ऊपर होना चाहिए?
  • क्या 62 साल की महिला और बच्चों को गुजारा भत्ता ना देना किसी धर्म के खिलाफ हो सकता है?

मौजूदा सरकार का तीन तलाक का कानून संविधान में दिए गए समानता के अधिकार को जस्टिफाई करता है। इसी प्रकार समानता के अधिकार को बढ़ावा देने वालों को अब आगे आकर ‘समान नागरिक संहिता’ यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड के उपर भी विचार विमर्श करना चाहिए। समान नागरिक संहिता पर विचार करने का यह बिल्कुल सही समय है…