एक बार फिर कांग्रेस ने किया कर्जमाफी के नियमो में बदलाव

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2018 में जब कांग्रेस चुनाव के लिए उतरी तो उसने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किसानो की बदहाली को अपना चुनावी मुद्दा बनाया था.बाकयदा इसके लिए कांग्रेस द्वारा जारी किये गये गये वचनपत्र में ये भी कहा गया था की सरकार बनने के बाद कांग्रेस सभी किसानो का कर्जा माफ़ करेगी.लोगो में भी उम्मीद जगी थी कि शायद कांग्रेस उनकी बेहतरी का प्रयास करेगी इसलिए लोगो ने भी कांग्रेस के चुनावी वादों को सच मानकर पक्ष  में मतदान किया.

कांग्रेस की सरकार बनी तो कर्जमाफी की आस लगाये बैठे किसानो के चेहरे थोड़े खिल गये,उनको लगा कि शायद अब उनके अच्छे दिन आना तय है लेकिन वो कहते है ना सत्ता से ज्यादा अरमान लगाना सही नही होता क्योकि सत्तापक्ष किसी का सगा ही नही होता.

सरकार बनी तो कांग्रेस के सुर भी बदलने लगे,पहले सभी किसानो का कर्जा माफ़ करने की बात करने वाली कांग्रेस ने अपने वादे के हिसाब से चलते हुए 10 दिनों के भीतर कर्जा माफ़ तो किया लेकिन मात्र 34 लाख किसानो का और वो भीं पूरा नही बल्कि महज २ लाख रूपये, कमलनाथ सरकार की इस कर्जमाफी से 35 हजार करोड़ से लेकर 38 हजार करोड़ रुपये के बीच अतिरिक्त भार पड़ना था,पर चलो सकूं इस बात का था कि ३४ लाख  किसानो का तो  भला होगा. लेकिन यहाँ भी शायद किसानो क साथ अजीब तरीके का गजब  खेल खेला गया. कांग्रेस सरकार की तरफ से कर्जमाफी के सम्बन्ध में गाइडलाइन्स  जारी की गई है जिसमें नई शर्तो को जोड़ा गया है जिसको पूरा करने वाले किसान को ही इसका लाभ मिल सकेगा. आइये आपको भी उन शर्तो से रूबरू कराते है.

 १]  योजना का लाभ उन किसानों को मिलेगा जिन्होंने बैंक से खाद-बीज या केवाईसी के तहत कर्ज ले रखा है।

२] कर्जमाफी का लाभ लेने के लिए ऋण खाते से आधार का लिंक होना आवश्यक है। और अगर किसी किसान के पास आधार कार्ड नही है या उनका आधार कार्ड ऋण खाते से लिंक नही है तो उन्हें  इसका लाभ नहीं मिल सकेगा ।

३] एक अप्रैल 2007 से 31 मार्च 2018 के बीच कर्ज लेने वाले सभी किसानों को ही कर्ज माफी का लाभ मिलेगा।

४]  दो लाख से अधिक का कर्ज स्वयं चुकाएं किसान को दो लाख रुपये तक की कर्ज माफी का लाभ मिलेगा। भले ही अलग-अलग बैंकों से किसान क्रेडिट कार्ड के तहत अधिक कर्ज ले रखा.

अब इतना तो साफ़ है कांग्रेस द्वारा जारी की गई इस नई गाइडलाइन के चलते ना जाने कितने किसान कर्जमाफी से वंचित रह जायेंगे, अगर कर्जमाफी देने का मन ही नही था तो फिर ना जाने क्यो वादों का पुलिंदा बाँधा गया,बात किसानो के अच्छे दिन लाने की गयीं थी,बात किसानो की बेहतरी की थी लेकिन पहले  यूरिया  की मांग करने वाले किसानो पर लाठी चार्ज करना हो या अभी कर्जमाफी के नाम पर किसानो को शर्तो के खेल में बांधना हों, ये सब साफ़ तौर पर जाहिर करता है की कमलनाथ सरकार किसानो की शुभचिंतक है.