लगातार दूसरी बार खराब प्रदर्शन के चलते आयोग ले सकता है ये फैसला

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भारतीय जनता पार्टी ने साल 2014 के चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन किया था और पूर्ण बहुमत से केंद्र में अपनी सरकार बनाई थी. साल 2019 आया, चुनाव करीब आये तो लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के खराब प्रदर्शन को लेकर कयास लगाने शुरू कर दिए.

बहुत से लोगों ने तो अपने अनुमानों यहाँ तक कह दिया कि पार्टी को इस बार के चुनाव में पहले की तरह बहुमत नहीं मिलेगा. खैर चुनाव हुए और नतीजे आये तो बहुत सी विरोधी पार्टियों के सूरमाओं की नींद उड़ गयी.

भारतीय जनता पार्टी को फिर से बहुमत मिला था और इस बार उसकी सीटों की संख्या 2014 से भी ज्यादा थी. सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी ने इस बार बहुत सी पार्टियों का सूपड़ा ही साफ़ कर दिया.

भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन 2019 के लोकसभा चुनाव में ऐसा रहा है कि सीपीआई यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया, बीएसपी यानी बहुजन समाज पार्टी और एनसीपी यानी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी से राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज़ा तक छिन जाने की नौबत आ गयी है.

पिछले 2 चुनावों से इन तीनों पार्टियों का प्रदर्शन काफी खराब रहा है. 2014 के चुनावों में भी इनका हाल कुछ ऐसा ही था. लेकिन उस वक़्त इनसे ये दर्ज़ा नहीं छीना जा सका क्योंकि साल 2016 में ही आयोग ने अपने नियमों में कुछ बदलाव किया था.

आयोग के इन बदले हुए नियमों के अनुसार सभी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पार्टियों के प्रदर्शन और उनके दर्जे की समीक्षा व संशोधन का समय 5 सालों से बदलकर 10 साल कर दिया गया था. 

यही वज़ह है कि लगातार दूसरे लोकसभा चुनाव में भी इन पार्टियों का खराब प्रदर्शन इनके राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे के लिए ख़तरा बन गया है. ऐसा लगता है कि अब अब जल्द ही आयोग की तरफ से इन पार्टियों से जल्द ही इनका राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज़ा छीन लिया जाएगा.

वाम का झंडा उठाने वाला राजनैतिक दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया इस चुनाव में महज़ दो ही सीटें जीत सका. बहुजन सेवा का दावा ठोंकने वाली बहुजन समाज पार्टी को महज़ 10 सीटें ही मिलीं. इसके अलावा नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी भी कोई ख़ास कमाल नहीं दिखा सकीं. इसका भी खेमा महज़ 5 सीटें जीतकर सिमट गया.

इसलिए चुनाव चिह्न ऑर्डर, 1968 के अनुसार कोई भी दल राष्ट्रीय दल का दर्जा तभी पा सकता है जब उस दल को कम से कम 4 राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनाव के दौरान 6 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हों, और उस पार्टी के कम से कम 4 सांसद लोकसभा तक पहुंचे हों.

इन तीनो ही पार्टियों में से कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जो इस आर्डर के अनुसार राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर खरी उतर रही हो. इन सभी पार्टियों का ये हाल समझाता है कि आने वाले समय में समाज के किसी एक तबके को अपना आधार मानकर चलने वाली पार्टियों का हश्र क्या होगा. ये सब बता रहा है कि देश अब जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर अपना नेता चुनना बंद कर चुका है.

खैर अब देखने वाली बात ये है कि आयोग इन सभी पार्टियों को लेकर क्या फैसला सुनाता है. और अगर इन पार्टियों से राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज़ा छिन भी जाता है तो क्या तब भी ये सभी पार्टियां राजनीति में इसी तरह से सक्रिय रहेंगी?

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