बिहार चुनाव में नीतीश कुमार का ‘लव-कुश’ फार्मूला, जानिए इस फोर्मुले के बारे में

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बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों को अभी तक ऐलान नही हुआ है. लेकिन चुनाव का रंग चढ़ने लगा है. बिहार की राजनीति में हमेशा से खुलेआम जाति के इ’र्द-गि’र्द सियासी बिसात बिछाई जाती रही है. इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. बिहार चुनाव को लेकर जहां केंद्र सरकार ने सौगात का पिटारा खोल दिया है. तो दूसरी तरफ जेडीएयू भी अपने तरीके से बिहार के लोगों को लुभाने में लगी है. नीतीश कुमार की पार्टी ने बिहार चुनाव को लेकर एक थीम सॉग भी लॉंच कर दिया है.

अब आपको बताते है कि जिस वक्त नीतीश कुमार ने खुद को बिहार में लॉच किया गया था. उस समय उन्होने विकास के साथ जाति आधार बनाने के लिए लव-कुश (कु’र्मी-को’इ’री) फॉर्मूले के सहारे आरजेडी प्रमुख लालू यादव के दु’र्ग को भे’द’ने में सफल हो सके थे. 

बिहार की बात करें तो पिछले तीन दशक से बिहार की बागडोर पिछड़ो के हांथ में है. लेकिन ये भी जान लीजिए की सबसे ज्यादा राज अ’ग’डो ने किया है. आजादी से पहले ही बिहार में अगड़ों के खि’ला’फ त्रिवेणी संघ बना था, जिसे कु’शवा’हा, कु’र्मी और य’दुवं’शि’यों ने मिलकर बनाया था. बिहार में कु’र्मी और यदुवं’शी सत्ता में रहे हैं लेकिन उसे कुर्सी तक पहुंचाने में कुशवा’हा का अहम योगदान रहा है. लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार तक माथे पर राजतिलक कुशवाहा समुदाय के चलते ही लगा है. 

बिहार के सीएम नीतीश कुमार लव-कुश फोर्मुले के सहारे खुद को सत्ता के करीब रखा  है. लेकिन इस समीकरण में लव को जबरदस्त फायदा मिला है. वहीँ कुश नाराज़ नज़र आये हैं. वहीं जिनकी वजह से बिहार में लोग कुर्सी तक पहुंचे हैं. इनमें या माना जाता है कि सबसे बड़ा हांथ कुशवाहा लोगों का होता है. कुशवाहा समाज के लोगों के बीच में आ’क्रो’श इस बात को लेकर है कि एक तरफ 2.5 प्रतिशत संख्या वाला 11 प्रतिशत वालों पर इ’मोश’न’ल शो’ष’ण कर सीएम की कुर्सी पाई है. 1994 से लेकर 2005 तक के सफर में कुर्मी समाज अपने चरम सीमा पर पहुंच गया वहीं कुशवाहा समाज पिछलग्गू बनकर रह गया है.