जन्मतिथि विशेष : जब राजनीति छोड़ कर जा रहे पीवी नरसिम्हा राव को बनना पड़ा पीएम तो सोनिया गाँधी चाहती थी…

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तारीख थी 10 दिसंबर 2004, जगह दिल्ली के एम्स का स्पेशल वार्ड. पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव अपने बिस्तर पर लेटे थे. शायद वो अपनी आखिरी सांसे गिन रहे थे. सोनिया गांधी का एक खास सख्स एम्स पहुंचा, राव के परिवार से पूछने के लिए कि आपलोग अंतिम संस्कार कहाँ करवाना चाहेंगे? ये सुनते ही राव का परिवार भड़क गया. परिवार ने नाराज होते हुए कहा- राव अभी ज़िंदा हैं.

सोनिया गांधी का भेजा वो संदेशवाहक इसलिए नही आया था कि वो परिवार से पूछ कर राव के अंतिम से संस्कार की व्यवस्था कर सके. वो तो ये थाह लेने आया था कि कहीं परिवार राव का अंतिम संस्कार दिल्ली में तो नही करना चाहता. सोनिया गांधी नही चाहती थी कि देश की राजधानी दिल्ली जहां गांधी परिवार के सदस्यों का आलीशान समाधि स्थल है उसी के बगल में पीवी नरसिम्हा राव का समाधि स्थल बने. सोनिया चाहती थी राव का अंतिम संस्कार हैदराबाद में हो, जो राव के गृह राज्य की राजधानी थी.

आखिर सोनिया गांधी क्यों नही चाहती थी कि राव का अंतिम संस्कार दिल्ली में हो? कांग्रेस के जिस पीएम ने देश के आर्थिक सुधारों का रास्ता खोला उसी के इतनी खिलाफ क्यों थी सोनिया? इसका जवाब जानने के लिए आपको 1991 में जाना होगा.

साल 1991, 10 वीं लोकसभा के चुनाव चल रहे थे. तीन चरणों मे होने वाले चुनाव का एक चरण बीत चुका था और दूसरे चरण के लिए चुनाव प्रचार जोरों पर था. तभी 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेंरबदूर में राजीव गांधी की ह’त्या कर दी गई. राजीव उस वक़्त देश के पूर्व पीएम थे और चल रहे चुनाव के लिए पीएम उम्मीदवार भी थे. राजीव की ह’त्या के बाद सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा हो गया कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? बीच चुनाव में कौन संभालेगा पार्टी की कमान? अगर चुनाव में पार्टी जीती तो कौन बनेगा प्रधानमंत्री?

22 मई 1991, एक तरफ तो राजीव गांधी के अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थी, वहीं दूसरी ओर दिल्ली में ही कांग्रेस वर्किंग कमिटी की एक आपात बैठक भी चल रही थी. इस मीटिंग में पार्टी का एक धड़ा चाहता था कि जिस तरह राजीव ने इंदिरा गांधी की ह’त्या के बाद पार्टी की कमान संभाली थी, उसी तरह राजीव की पत्नी सोनिया गांधी को पार्टी की कमान संभालनी चाहिए. क्योंकि उस वक़्त ना तो राहुल और न प्रियंका ही इस काबिल थे कि राजनीति में आ कर देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी को संभाल सके.

मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह ने इस मीटिंग में सोनिया गांधी को पार्टी का नया अध्यक्ष चुनने का प्रस्ताव रखा लेकिन सोनिया इसके लिए तैयार नही हुई. सोनिया के इनकार के बाद पार्टी के अन्य कद्दावर नेताओं में पार्टी अध्यक्ष बनने की लालसा जागी और उन्होंने अपनी उम्मीदवारी के लिए दांव-पेंच आजमाने शुरू कर दिए. शरद पवार, अर्जुन सिंह और एनडी तिवारी मजबूत क्षेत्रीय नेता हुए करते थे. इन तीनों ने ही अध्यक्ष बनने की कोशिशें शुरू कर दी लेकिन तभी इंदिरा गांधी के मुख्य सचिव रह चुके पीएन हक्सर ने सोनिया गांधी को सलाह दी कि पीवी नरसिम्हा राव को पार्टी की कमान सौंप देनी चाहिए और साथ ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी बना देना चाहिए. इस बात का जिक्र विनय सीतापति ने अपनी किताब Half Lion : How P.V. Narasimha Rao Transformed India में किया है. इस किताब में ये भी जिक्र है कि सिर्फ पीएन हक्सर ने ही नही बल्कि राजीव गांधी के खास दोस्त सतीश शर्मा ने भी नरसिम्हा राव को ही पार्टी की कमान सौंपने की सलाह दी.

उन दिनों नरसिम्हा राव सार्वजनिक जीवन से रिटायर हो कर दिल्ली छोड़ वापस हैदराबाद जाने की तैयारी कर रहे थे. तभी सारे संभावित नाम पीछे छूट गए और पीवी नरसिम्हा राव के दावेदारी की खबरें अखबारों की सुर्खियां बन गई. उसके बाद 29 मई को कांग्रेस वर्किंग कमिटी की मीटिंग में नरसिम्हा राव को पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया. हालांकि उन्हें पीएम पद का उम्मीदवार घोषित नही किया गया.

18 जून 1991 को चुनाव के नतीजे घोषित हुए तो कांग्रेस ने 521 सीटों में से 232 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी तो बन गई लेकिन बहुमत से पीछे रह गई. 20 जून को पीवी नरसिम्हा राव को संसदीय दल का नेता चुना गया और उनके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया. साथ ही ये कहा गया कि जब तक सोनिया गांधी नेतृत्व करने को तैयार नही होती तब तक राव ही पीएम रहेंगे. हालांकि सोनिया गांधी भले ही उस वक़्त राजनीति में नही आईं हो लेकिन गांधी परिवार की बहू होने के नाते कांग्रेस में उनका रसूख था और उनकी बातों को काटने की हिम्मत कोई नही करता था. इसलिये जब राव को पार्टी का अध्यक्ष और फिर पीएम बनाया गया तो अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी और शरद पवार ने भी सार्वजनिक तौर पर विरोध नही किया जबकि ये तीनों ही नेता राजीव गांधी के बाद खुद को कांग्रेस का भविष्य मान रहे थे.

सोनिया को लगा कि राव भले ही पार्टी अध्यक्ष और पीएम हों लेकिन वो महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी राय लें और उन्हें है रिपोर्ट करें. लेकिन राव को मानना था कि वो पीएम है और एक पीएम के तौर पर उन्हें सोनिया की राय लेने और रिपोर्ट करने की कोई जरूरत नही है. बस यही बात सोनिया गांधी को पसंद नही आई और दोनों के रिश्ते बिगड़ गए. राव ने कभी सोनिया गांधी को सत्ता के केंद्र के रूप में उभरने नही दिया और ये बात सोनिया गांधी को हमेशा अखरती रही. उन दिनों राव के एक बयान ने खूब सुर्खियां बटोरी. उन्होंने पार्टी के मंच से कहा था ‘जैसे इंजन ट्रेन की बोगियों को खींचता है वैसे ही कांग्रेस के लिए यह जरूरी क्यों है कि वह गांधी-नेहरू परिवार के पीछे-पीछे ही चले?’ उनका कहना सही भी था क्योंकि उन्होंने पूरे पांच साल पार्टी अध्यक्ष की कमान भी संभाली और सरकार को भी स्थिरता के साथ चलाया. नरसिम्हा राव ने उम्मीद दिखाई कि कांग्रेस और देश बिना गांधी परिवार के भी चल सकता है.

कांग्रेस 1996 का चुनाव हार गई. लेकिन राव के लिए अभी बुरा वक्त आना बाकी था. पार्टी ने उन्हें 1998 में लोकसभा टिकट देना भी जरूरी नही समझा. सोनिया गांधी जब कांग्रेस की अध्यक्ष बनी तो कांग्रेस ने राव का बहिष्कार ही कर दिया गया. 2004 में जब राव की मृत्यु हुई तो उनके लिए कांग्रेस मुख्यालय में श्रद्धांजलि सभा तक आयोजित नही की गई. कांग्रेस मुख्यालय के दरवाजे अपने ही पूर्व अध्यक्ष उर पूर्व पीएम के लिए बंद हो गए.