जाने क्या है सिटिजनशिप बिल और इसका विरोध क्यों कर रहा है विपक्ष

वक्त बदला,मौसम का मिज़ाज बदला पर अगर कुछ नही बदली है बांग्लादेश,अफगानिस्तान और अफगानिस्तान में रहने वाले इन अल्पसंख्यको की किस्मत, इस दर्द को जरा आप करीब से महसूस करिएगा. ये दर्द वो है जो यहां के लोग हर रोज़ झेलते है.

हिंदुस्तान में जहां बेटी के जवान होने पर उसकी शादी की तैयारी की जाती है वही पाकिस्तान,अफगानिस्तान जैसे देशो में अल्पसंख्यक समुदाय में बेटी के जवान होने पर उसको पर्दे के पीछे रखे जाने में ही वहां के लोग मजबूर है। बांग्लादेश और अफगानिस्तान में भी लोग डरके जीने को मजबूर है।

अमर उजाला अखबार में लिखी बातों पर यकीन करें तो पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय पर किए जा रहे अत्याचारों की बदौलत अब वहां हिंदुओ की कुल संख्या 36 लाख रह गई है जो कुल आबादी का 1.6 फीसद ही है। जबकि एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट पर गौर करे तो साल 2014 मे अल्पसंख्यकों के पास पूजा करने के लिए अब मात्र 20 ही पूजा स्थल बचे है।

अब मोदी सरकार के प्रयासों से नागरिकता संशोधन बिल 2016′ लोकसभा से पास हो गया है। भले ही ये बिल लोकसभा से पास हो गया हो लेकिन ज्यादातर विपक्षी पार्टियां इसके खिलाफ है।

आख़िर क्या है ये बिल और पार्टियां इसका क्यो विरोध कर रही है। आइए आपको बताते है। क्या है नागरिकता संशोधन बिल 2016, भारत देश का नागरिक कौन है, इसकी परिभाषा के लिए साल 1955 में एक कानून बनाया था जिसे ‘नागरिकता अधिनियम 1955’ नाम दिया गया.अब मोदी सरकार ने इसी कानून में संशोधन किया है जिसे ‘नागरिकता संशोधन बिल 2016’ नाम दिया गया है. ये संशोधन बिल राज्यसभा से भी पास हो जाता है तो हमारे देश में छह साल गुजारने वाले अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के छह धर्मों (हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और इसाई) के लोगों को बिना कोई उचित दस्तावेज दिए भारतीय नागरिकता मिलने लग जाएगी। अभी तक ‘नागरिकता अधिनियम 1955’ के मुताबिक इन धर्मो के लोगो को अगर भारत की नागरिकता चहिए होती थी तो उसके लिए उनके पास वैध दस्तावेज होने के साथ साथ उन्हें 12 साल भारत में गुजारने ज़रुरी होते थे और ऐसा करने पर उन्हें नागरिकता मिल सकती थी.

क्यों हो रहा है विरोध?

असम गण परिषद (एजीपी) के अलावा कई पार्टियां भी इस बिल का विरोध कर रही हैं. इनमें कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी समेत दूसरी पार्टियां शामिल हैं. इनका दावा है कि धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं दी जा सकती है क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. ये विधेयक 19 जुलाई 2016 को पहली बार लोकसभा में पेश किया गया. इसके बाद संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने लोकसभा में अपनी रिपोर्ट पेश की थी. जेपीसी रिपोर्ट में विपक्षी सदस्यों ने धार्मिक आधार पर नागरिकता देने का विरोध किया था और कहा था कि यह संविधान के खिलाफ है. इस बिल में संशोधन का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि अगर बिल लोकसभा से पास हो गया तो ये 1985 के ‘असम समझौते’ को अमान्य कर देगा. क्यों हो रहा है विरोध? असम गण परिषद (एजीपी) के अलावा कई पार्टियां भी इस बिल का विरोध कर रही हैं. इनमें कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी समेत दूसरी पार्टियां शामिल हैं. इनका दावा है कि धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं दी जा सकती है क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. ये विधेयक 19 जुलाई 2016 को पहली बार लोकसभा में पेश किया गया. इसके बाद संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने लोकसभा में अपनी रिपोर्ट पेश की थी. जेपीसी रिपोर्ट में विपक्षी सदस्यों ने धार्मिक आधार पर नागरिकता देने का विरोध किया और कहा कि ये संविधान के खिलाफ है. इस बिल में संशोधन का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि अगर बिल लोकसभा से पास हो गया तो ये 1985 के ‘असम समझौते’ को अमान्य कर देगा।

ये समझ नही आता कि अगर मोदी सरकार इस अहम बिल को लाने जा रही है तो विपक्ष ना जाने क्यो इसमें अड़ंगा अड़ा रहा है। वैसे इतना ज़रूर साफ है कि अगर सरकार के इस प्रयास को विपक्षी दल भी समर्थन कर दे तो पाकिस्तान,बांग्लादेश,अफगानिस्तान जैसे देशो में हो रहे अत्यचारो से परेशान होकर भारत में अवैध रूप से रहने को मजबूर लोगो को ना सिर्फ एक नई ज़िंदगी मिलेगी। बल्कि उन्हें भी मुख्यधारा में आने का मौका मिल सकेगा .

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