मासूम बच्चों के मन में अपनी सेना और सरकार के लिए ज़हर भर रहा है “चंपक”

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तब चंपक के सहारे हमारे बचपन की छुट्टियाँ कटा करती थी. कभी चंपक हमारी मासूमियत सा ही मासूम हुआ करता था लेकिन अब चंपक की वो मासूमियत कहीं खो गई और उसकी जगह जहरीले प्रोपगैंडा ने ले लिया है. अब चंपक मासूम बच्चों के मन में ज़हर भरने के अपने एजेंडे पर काम कर रहा है. अगर आपको यकीन न हो तो चंपक का अक्टूबर एडिशन देख लें.

चंपक के अक्टूबर एडिशन में कश्मीर के बारे में एक अपील छपी है. इस अपील की हेडिंग है, “कश्मीर में फंसे बच्चों के लिए आवाज उठायें”. हम आपको ये अपील शब्द दर शब्द बताते हैं – विश्व डाक दिवस के सम्मान में हम आपसे निवेदन करते हैं की कश्मीर में रह रहे उन बच्चों के लिए पत्र भेजें, जो वर्तमान में आर्टिकल 370 के बाद एक चुनौतीपूर्ण समय से गुजर रहे हैं- एक कानून जिसने कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था- निरस्त कर दिया गया था. इसके बाद, हजारों अतिरिक्त सैन्य टुकड़ियां कश्मीर में हैं, लोगों की आवाजाही पूरी तरह से प्रतिबंधित है और टेलीफोन लाइनें और इंटरनेट काम नहीं कर रहे हैं. स्कूल बंद हैं और बच्चे घर पर हैं.

आप अपने पत्र में कश्मीर के बच्चों से पूछ सकते की वह इस मुश्किल समय मैं कैसा महसूस कर रहे हैं. आपके पत्र न केवल उनको दिलासा देंगे बल्कि यह भी दर्शाएंगे की इस चुनौतीपूर्ण समय में वह अकेले नहीं हैं. हम आपके लिखे पत्रों को अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा करेंगे और उन्हें कश्मीर के गवर्नर तक पहुंचाएंगे.

ये सही है कि कश्मीर में सैन्य टुकडियां भेजी गई, इंटरनेट और फोन लाइन बन कर दिए गए थे, कर्फ्यू भी लगाया गया था लेकिन इसकी वजह क्या थी इस बात का कोई जिक्र चंपक ने नहीं किया. बच्चों को बताया जा रहा है कि कश्मीर को दिया गया विशेष दर्जा ख़त्म कर दिया गया लेकिन वो दर्जा क्यों ख़त्म किया गया इस बारे में भी नहीं बताया गया. क्योंकि कश्मीर की असली सच्चाई बताने से एजेंडा और प्रोपगैंडा कैसे चलता. इस अपील के जरिये सीधे सीधे मासूम बच्चों के मन में ज़हर भरने की कोशिश की गई है.

अगर आपके पास चंपक मैगजीन उपलब्ध नहीं है तो आप चंपक के फेसबुक पेज पर जाएँ. वहां उन्होंने मैगजीन के उस पेज की तस्वीर डाली गई है.

इसके अलावा चंपक में एक और स्टोरी छापी गई है जो अपने प्रोपगैंडा को अलग ही लेवल पर ले जाता है. ये दूसरी कहानी हसन की है. जो कुछ इस तरह है – सड़क से गुजरते हुए हसन ने युवाओं की एक टोली को एक आर्टिकल पर बातें करते हुए सुना. हसन आर्टिकल और पहले के अध्याय के बारे में सबकुछ जानता था, लेकिन वह समझ नहीं पा रहा था कि अचानक हर कोई इस मामले में रुचि क्यों लेने लगा था. वो आखिरकार घर पहुंचे, हसन सीढियों पर बैठ अपनी अम्मी का इंतज़ार कर ही रहा था कि उसके अब्बू ने आ कर उसे बताया कि उसका स्कूल इस सप्ताह भी बंद रहेगा और वो बाहर नहीं जा सकता. अम्मी कहाँ है, अब्बा? हसन ने बेचैनी से पूछा. “फोन भी काम नहीं कर रहे हैं इसलिए मैं उनतक नहीं पहुँच पा रहा हूँ. हसन घर पर ही रहना, मैं तुम्हारी अम्मी को ढूंढता हूँ.” अब्बा ने कहा.

इस कहानी का सीधा और स्पष्ट सन्देश है कि हसन स्कूल जाना चाहता है, खेलने के लिए बाहर जाना चाहता है लेकिन निर्दयी और अत्याचारी भारतीय सेना उसे बाहर नहीं जाने दे रही, उसे स्कूल नहीं जाने दे रही, उसे घर में कैद कर रखा है. मासूम बच्चों के मन में अपनी ही सेना और अपनी ही सरकार के खिलाफ किस तरह ज़हर भरा जा रहा है.

अगर नियत साफ़ होती तो ऐसे बताया जा सकता था कि इस आर्टिकल की आड़ में कैसे कश्मीरी पंडितों पर उनके बच्चों पर जुल्म किये गए. कैसे लाखों लोगों को उनके घर से दुष्टों ने भगा दिया लेकिन ऐसा करने पर एजेंडा और प्रोपगैंडा कैसे सेट होता इसलिए एकपक्षीय कहानी को दिखा दिया गया.

चंपक ने सीधे सीधे सिर्फ हसन को पीड़ित दिखा दिया जिसपर जुल्म हो रहा है लेकिन किसी अनुपम और अशोक पर हुए जुल्म का जिक्र तक नहीं करता. नहीं बताता कि सिर्फ फोन लाइन काटी गई है और हसन को घर में रहने को कहा गया है लेकिन ये नहीं बताता कि कैसे अशोक और अनुपम जैसों को उनके घरों से भगा दिया गया था.

चंपक को दिल्ली प्रेस छापती है और दिल्ली प्रेस अपने एजेंडा और प्रोपगैंडा के तहत अपनी ही सरकार और सेना से नफरत करने वाली अगली पीढ़ी तैयार कर रही है .. शायद इन कहानियों को पढ़ कर ही कोई बच्चा बड़ा हो कर शेहला रसीद और अरुंधती रॉय जैसा बन जाए.