तो अब बॉलीवुड में जाति देखकर मिलेगा काम

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बॉलीवुड अभी तक जात-पात और धर्म से ऊपर था. यहाँ हर धर्म के लोग काम करते हैं. कभी यहाँ काम करने वाले की जाति या धर्म पूछते नहीं सुना गया.  लेकिन अब जात पात ने बॉलीवुड में भी अपने पाँव पसार दिए हैं और इसी शुरुआत की है डायरेक्टर नीरज घेवान ने. नीरज घेवान ने ट्विटर पर एक पोस्ट किया जिसमे उन्होंने लिखा हिंदी फिल्म और टीवी में काम करने के लिए DBA बैकग्राउंड के असिस्टेंट डायरेक्टर और असिस्टेंट राईटर चाहिए.

अब आप सोचेंगे कि ये DBA कैटेगरी क्या होती है? DBA कैटेगरी मतलब दलित, बहुजन और आदिवासी कैटेगरी. जिस डायरेक्टर नीरज घेवान ने इस तरह की वैकेंसी निकाली है, उन्हें शायद आप नाम से नहीं पहचान पायेंगे लेकिन जब आप उनकी फिल्म का नाम सुनेंगे तो तुरंत पहचान जायेंगे. नीरज घेवान ने मसान फिल्म का निर्माण किया था. हाँ वही मसान जिससे विक्की कौशल ने बॉलीवुड में डेब्यू किया था. इस फिल्म को हर तरफ काफी सराहा गया था और इसने कई अवार्ड्स भी जीते थे. अगर मैं अपनी बात करूँ तो ये फिल्म मुझे भी काफी पसंद आई थी. लेकिन नीरज का ट्वीट मुझे पसंद नहीं आया.

नीरज के ट्वीट पर सोशल मीडिया भी दो धडों में बंट गया, कई लोग नीरज के साथ थे तो कई लोग नीरज के विरोध में. नीरज के ट्वीट पर विवाद खड़ा हुआ तो उन्होंने तुरंत द वायर को इंटरव्यू दिया और कहा “मुझे अंदाजा था कि सोशल मीडिया इसी तरह की प्रतिक्रिया देगा लेकिन मुझे आश्चर्य है कि फिल्म इंडस्ट्री अभी भी भारत की जातिगत व्यवस्थाओं पर चर्चा करने के लिए तैयार नहीं है और झिझक महसूस कर रहा है.”

सोचिये अगर किसी डायरेक्टर ने वैकेंसी निकली होती कि उसे सिर्फ ब्राह्मण या राजपूत असिस्टेंट डायरेक्टर और राईटर चाहिए तब क्या होता? जो लोग DBA बैकग्राउंड वाली वैकेंसी पर खुश हो रहे हैं वो अब तक मनुस्मृति और ब्राह्मणवाद के नाम पर छाती पीट पीट कर चीत्कार शुरू कर चुके होते. न्यूज चैनलों पर डिबेट शुरू हो गया होता और सरकार दलित विरोधी घोषित हो चुकी होती और कुछ राजनितिक लोग “भूराबाल” साफ़ करो का नारा भी लगा चुके होते.

नीरज कहते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री अभी भी भारत की जातिगत व्यवस्थाओं पर चर्चा करने के लिए तैयार नहीं है. वो भूल रहे हैं कि दशकों से फिल्मों में ठाकुरों को ही खलनायक दिखाया गया है. ज्यादा पीछे न भी जाएँ तो अभी हाल ही में रिलीज आर्टिकल 15 को ही देख लें, किस तरह पूरी कहानी को बदल कर प्रोपगैंडा फैलाया गया. बदायूं रेप केस जिसपर ये फिल्म आधारित थी. सारे आरोपी यादव थे लेकिन जान बुझ कर सब कुछ बदल दिया गया और ब्राह्मणों को खलनायक दिखाया गया. नीरज घेवान में तब हिम्मत नहीं हुई ये कहने के लिए कि असल कहानी दुनिया के सामने दिखाओ.

द वायर के साथ इंटरव्यू में नीरज कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि मैं अचानक नींद से जगा और DBA बैकग्राउंड के लिए वैकेंसी निकाल दी.. मैंने लम्बे अरसे से सोच रहा था कि कैसे फिल्म इंडस्ट्री में विविधता ला लाऊं और फिर मैंने ये वकैंसी निकाली …

नीरज बाबू इसे विविधता लाना नहीं बल्कि बांटना और दरार डालना कहते हैं …. नीरज घेवान दलित हैं, क्या कभी उन्हें किसी प्रोड्यूसर ने इसलिए काम देने से मना कर दिया या फिल्म प्रोड्यूस करने से मना कर दिया कि दलितों की फिल्म में पैसा नहीं लगाऊंगा? इसका जवाब नीरज नहीं दे सकते क्योंकि कभी फिल्म इंडस्ट्री में तो ऐसा नहीं सुना गया …. आज़ादी के पहले से ही यहाँ फिल्मे बन रही है … हज़ारों क्रू मेंबर होते हैं एक फिल्म के निर्माण में … कोई किसी की जाति देख कर नहीं रखता … लेकिन अब लोग जाति देख कर रखेंगे .. आज नीरज ने DBA बैकग्राउंड के लिए वैकेंसी निकली है .. कल को कोई डायरेक्टर ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ के लिए वैकेंसी निकालेगा .. फिर आप क्या करेंगे?

नीरज का बस चले तो वो फिल्म इंडस्ट्री में आरक्षण व्यवस्था भी लागू करवा दें …. मेन लीड में DBA बैकग्राउंड वालों को 75% आरक्षण … म्यूजिक इंडस्ट्री में 70 प्रतिशत आरक्षण, टीवी इंडस्ट्री में 60 प्रतिशत आरक्षण …. मसान के लिए दो चार अवार्ड जीत कर नीरज को लगता है कि वो अब क्रांति कर सकते हैं … लेकिन अब क्रांति का असल मतलब एजेंडा हो चूका है ..