अलगावादी नेता यासीन मालिक के खिलाफ मुकदमा

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जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के चेयरमैन यासीन मलिक के खिलाफ पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है और इसके बाद मलिक को जम्मू जेल में शिफ्ट करा दिया है. अलगा वादी नेता को 22 फ़रवरी को देर रात उसके मैसुमा में स्थित घर से गिरफ्तार कर लिया गया था और कोठिबाघ पुलिस स्टेशन ले जाया गया था. इसके बाद मलिक को कोट बिलावल जेल शिफ्ट करा दिया गया था.

सीबीआई ने भी इस मामले में जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है जिससे मलिक के खिलाफ जो भी केस हैं उन्हें श्रीनगर से जम्मू में ट्रान्सफर किया जा सके. ये कदम सीबीआई का अहम इसीलिए माना जा रहा है क्योंकि यासीन मलिक के खिलाफ केस 29 साल से पेंडिंग चल रहा है.

अब आपको बताते हैं कि यासीन मलिक पर क्या केस है. रुबिया सईद कि किडनैपिंग करने का, जो कि जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री की बेटी थी और साथ ही 1990 में हुई पांच एयर फ़ोर्स के जवानों की हत्या का यासीन मलिक मुख्य आरोपी था. रुबिया सईद किडनैपिंग के बाद भारत सरकार को 5 आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा था.
साथ ही यासीन जस्टिस नीलकंठ गंजू कि हत्या का भी मुख्य आरोपी है. जस्टिस नीलकंठ गंजू ने जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकवादी मकबूल भट को और लस्सा कौल को मौत कि सजा सुनाई थी. सोचिये जो जज कानून के तहत और सबूतों के आधार पर फैसला सुनाये उसे अगर कोई आतंकवादी मौत के घट उतार दे तो. ऐसे अपराध इंडिपेंडेंट जुडिशरी पर सीधा हमला है.

आगे बात करने से पहले आपको थोड़ा यासीन मलिक के बारे में बता देते हैं. यासीन मलिक जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अध्यक्ष हैं जिसे अमानुल्लाह और मकबूल भट ने गठित किया था. ये एक आतंकवादी संगठन था और जैसा कि आपको पहले बताया कि आतंकवादी मकबूल भट को फासी की सजा जस्टिस नीलकंठ ने सुनाई थी. लेकिन 1994 में जब JKLF के आतंकवादी भारी संख्या में मारे गए तब JKLF के अध्यक्ष यासीन मलिक ने सीस फायर का ऐलान कर दिया.

इसके पहले 1987 में जम्मू कश्मीर विधान सभा चुनाव के पहले यासीन मलिक ने मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट को ज्वाइन करा था. लेकिन मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट ने चुनाव नहीं लड़ा क्योंकि मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट भारत के संविधान को मानता ही नहीं था. साथ ही यासीन हिजबुल मुजाहिदीन आतंकवादी संगठन से भी ट्रेनिंग ले चूका है. कश्मीर में आप जो आतंकवादियों के बारे में सुनते होंगे वो ज्यादातर हिजबुल मुजाहिदीन के ही होते हैं. आतंकी स्येद सलाहुद्दीन हिस्बुल मुजाहिदीन का हेड है.

इसके बाद 1989 में यासीन मलिक कश्मीर घाटी आता है और एक नया ग्रुप बनाता है जो तमाम आतंकवादियों को हथियारों कि ट्रेनिंग देता है जिससे कश्मीर भारत से अलग हो सके. यासीन मलिक 1999 में पब्लिक सेफ्टी एक्ट के अंदर और 2002 में प्रिवेंशन ऑफ़ टेररिज्म एक्ट के अंदर अरेस्ट हो चूका है. इसके साथ कश्मीर की आजादी के लिए यासीन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से भी मिल चुका है

फ़रवरी 2013 में तो हद ही हो गयी जब यासीन मलिक पाकिस्तान जाकर इस्लामाबाद में भूख हड़ताल पर बैठ जाता है. ये भूख हड़ताल इसलिए होती है क्योंकि अफज़ल गुरु जो 2001 में हुए संसद हमले का दोषी था उसे सुप्रीम कोर्ट ने फांसी कि सजा सुना दी थी. और यासीन के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद भी आता है.

यासीन मलिक जैसे लोग जिम्मेदार है जिनकी एक आवाज़ में पूरी कश्मीर घाटी में बंद का ऐलान हो जाता है. लोग बंद में शामिल होना चाहे या नहीं लेकिन ऐसे नेताओं के ऐलान से काम धंधा बंद करना पढ़ता है जिससे स्थानीय कश्मीरी का नुकसान होता है. ऐसे अलगावादी नेताओं को पाकिस्तान ISI का समर्थन प्राप्त है. इन्हें पाकिस्तान से भी फंडिंग होती है तभी ये नेता कश्मीर में पत्थरबाजी कराते हैं.

ये अलगावादी नेता कश्मीरी युवा को गुमराह करते हैं लेकिन अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाते हैं. इन नेताओं के पास बहुत संपत्ति है और ये किसी VIP से कम नहीं है. राज्य सरकार और केंद्र सरकार इन्हें सिक्यूरिटी के साथ ट्रेवल, कार, मेडिकल और तमाम सुविधाएं भी देती है.

लेकिन 2014 के बाद इन अलगावादी नेताओं कि मुश्किलें काफी बढ़ी हैं. 2016 में ही केंद्र सरकार ने संकेत दे दिए थे कि अलगाह्वादियों के अच्छे दिन अब जाने वाले हैं. 2017 में नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी यानी NIA ने इन नेताओं के घर रेड की थी जिसके बाद अलगाह्वादी नेताओं के रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर लिया था. ये वही लोग थे जिनके खिलाफ कई मुक़दमे पेंडिंग थे और जिन्हें पाकिस्तान से फंडिंग मिलती थी

इसके बाद पुलवामा आतंकी हमले के बाद गृह मंत्री ने ये साफ़ कर दिया था कि जो भी अलगावादी नेता पाकिस्तान कि तरफ से बात करते हैं उनकी सिक्यूरिटी पर पुनर्विचार किया जाए जिसके बाद राज्य सरकार ने अलगावादी नेताओं की सिक्यूरिटी हटा ली थी.

ये अलगावादी नेता ना तो भारत के संविधान को और ना ही भारत को अपना देश मानते हैं. केंद्र सरकार द्वारा आतंकवादियों पर और इन अलगावादियों पर कड़ी कार्यवाही एक अच्छा संकेत है. कश्मीर की शांति कि दिशा में उठाया जाने वाला हर कदम भारत के साथ कश्मीर के लिए भी ज़रूरी है.