इलेक्टोरल बांड को लेकर देश को गुमराह कर रही कांग्रेस और वामपंथी मीडिया

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साल 2017-18 के बजट में मोदी सरकार इलेक्टोरल बांड का कांसेप्ट ले कर आई. इलेक्टोरल बांड यानी कि चुनावी बांड. इलेक्टोरल बांड की कीमत 1 हज़ार से कर 1 करोड़ तक की होती है और इसे सिर्फ स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखों पर ही कैश किया जा सकता है और वो भी सिर्फ चुनावों के दौरान.  इस चुनावी बांड का इस्तेमाल राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए किया जाता है. अब इसी चुनावी बांड को लेकर भारत में सियासी घमासान मच गया है.

कांग्रेस सत्ताधारी पार्टी भाजपा पर आरोप लगा रही है कि इलेक्टोरल बांड को लेकर हेरफेर की गई जिस कारण भाजपा को सबसे ज्यादा चंदा मिला. जबकि भाजपा का कहना है कि कांग्रेस बेवजह जा हल्ला मचा रही है क्योंकि उसके पास कोई मुद्दा नहीं है. इन सब के बीच वामपंथी मीडिया द्वारा आधी अधूरी बातें जनता तक पहुंचाई जा रही है ठीक उसी तरह जैसे चुनावों के वक़्त इन वामपंथी मीडिया ने कांग्रेस को फायदा पहुँचाने के लिए राफेल के सम्बन्ध में आधी अधूरी जानकारी जनता तक पहुंचाई थी.

इलेक्टोरल बांड काम कैसे करता है ?

भारत का कोई भी नागरिक या संस्था या कंपनी चुनावी चंदे के लिए इलेक्टोरल बांड खरीद सकता है . इलेक्टोरल बॉन्ड 1,000 रुपये, 10,000 रुपये, एक लाख रुपये, 10 लाख रुपये और एक करोड़ रुपये के मूल्य में उपलब्ध होते हैं… चंदा देने का इच्छुक नागरिक या संस्था या कंपनी चुनाव आयोग में रजिस्टर किसी उस पार्टी को ये चंदा दे सकता हैं, जिस पार्टी ने पिछले चुनावों में कुल वोटों का कम से कम 1% वोट हासिल किया हो.

इलेक्टोरल बांड खरीदने वाले का नाम पूरी तरह से गुप्त रखा जाता है. लेकिन बांड खरीदने के लिए अपनी सारी जानकारी बैंक को देनी होती है. बांड खरीदने के 15 दिनों के तक वो वैलिड रहता है. अगर उन 15 दिनों में पार्टी ने बांड को कैश नहीं करायातो ये राशि प्रधानमंत्री राहत कोष में खुद बी खुद ट्रांसफर हो जाती है. बॉन्ड खरीदने वाले को उसका जिक्र अपनी बैलेंस शीट में भी करना होता है.

अब सवाल ये है कि पार्टियों को चंदा पहले भी मिलते रहे हैं फिर इलेक्टोरल बांड का कांसेप्ट क्यों लाया गया ? तो इसका जवाब है. साल 2017 से पहले बीस हजार रुपये से ऊपर का चंदा चेक से और उससे कम का बिना रसीद के लिए जाने का प्रावधान था. बाद में जब चंदे की जानकारी दी जाती तो ये बताया जाता कि कुल चंदे का 80 से 90 प्रतिशत फुटकर चंदा है यानी कि 20 हज़ार से कम के चंदे के रूप में मिले हैं जिनका कोई हिसाब नहीं है. इसके जरिये कालेधन का चुनावों में खूब इस्तेमाल होता था. फिर मोदी सरकार ने राजनीति में पारदर्शिता लाने के लिये इलेक्टोरल बांड जैसा एक बड़ा कदम उठाया.

इलेक्टोरल बांड आने से सबसे बड़ी राहत उन्हें मिली जो राजनितिक दलों को चंदा देते हैं. चंदा चेक द्वारा दिया जाता था तो उसकी जानकारी सबको हो जाती थी और इससे डोनर पर खतरा रहता था कि अगर विपक्षी पपार्टी को चंदा दिया तो सरकार उसे प्रताड़ित कर सकती है या यदि सत्ताधारी पार्टी को चंदा दिया तो अगली बार सत्ता में आने वाली विपक्षी पार्टी उसे प्रताड़ित कर सकती है. लेकिन इलेक्टोरल बांड से ये डर ख़त्म हो गया. इस बांड के जरिये किसी भी पार्टी को बिना नाम उजागर किये चंदा दिया जा सकता है. इसके अलावा इलेक्टोरल बांड से पहले कोई भी कैश में चंदा दे सकता था और उसकी कोई पहचान नहीं होती थी लेकिन इलेक्टोरल बांड के लिए बैंक में KYC होती है. यानी कि बैंक के पास बांड खरीदने वाले की सारी जानकारी होती है. पैन कार्ड, आधार कार्ड, बैंक डिटेल वगैरह.

प्रतीकात्मक तस्वीर

अब सवाल ये कि अचानक से इस बांड पर हल्ला क्यों मच गया ? तो जो जानकारी सामने आई है उसके मुताबिक़ विपक्ष कह रहा है कि इलेक्टोरल बांड के जरिये भाजपा को सबसे ज्यादा चंदा मिला. साथ ही कांग्रेस की तरफ से ये सवाल भी उठाया जा रहा है कि जब चार महीने ही खोले जा सकते हैं तो फिर बीच में इसे क्यों खोला गया? तो इसका जवाब ये है कि भारत में सिर्फ लोकसभा के ही चुनाव नहीं होते बल्कि विधानसभा, निकाय चुनाव भी होते रहते हैं. इन चुनावों में भी उम्मीदवारों को पैसा चाहिए. अब अगर कोई चुनाव अप्रैल, जुलाई, अक्टूबर और जनवरी में न हो और बीच के किसी महीने में आ जाए तो जाहिर सी बात है इलेक्टोरल बांड को बीच में भी खोलना पड़ेगा. ये कोई नई बात नहीं है बल्कि ये सब पब्लिक डोमेन में है.

विपक्ष का एक सवाल ये भी है कि सबसे ज्यादा चंदा भाजपा को ही क्यों मिला? भाजपा सबसे बड़ी पार्टी भी है. उसके सबसे ज्यादा कार्यकर्ता है तो कार्यकर्ता अपनी पार्टी के लिए फंड जुटाते ही है. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. जिस पार्टी के कार्यकर्ता ज्यादा होंगे उसका चंदा भी ज्यादा होगा. दुनिया के कई देशों में फंड जुटाने के लिए बाकायदा फंड रेजिंग इवेंट्स होते हैं. लेकिन भारत में फंड रेजिंग इवेंट का कल्चर नहीं है. यहाँ लोग इलेक्टोरल बांड के जरिये पार्टी को फंड देते हैं.

तो क्या विपक्ष हाय तौबा इसलिए मचा रहा है कि पहले उसे कैश के रूप में भारी भरम डोनेशन मिलती थी जिसमे कालाधन भी होता था और इलेक्टोरल बांड के आने से वो बंद हो गया. जो बातें पहले से पब्लिक डोमेन में है. उसपर विपक्ष तो गुमराह कर ही रहा देश को. वामपंथी मीडिया भी कम गुमराह नहीं कर रही. जरूरत है इनसे सावधान रहने की. राफेल में भी कांग्रेस और वामपंथी मीडिया की सांठगाँठ कुछ ऐसे ही देश को गुमराह कर रही थी.