वोट मिले सबसे ज्यादा लेकिन फिर भी इन वजहों से झारखण्ड में हार गई भाजपा

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झारखण्ड विधानसभा चुनाव में भाजपा को तगड़ा झटका लगा और वो सत्ता से बाहर हो गई. पिछली बार भाजपा ने AJSU के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था और बहुमत हासिल किया था. बाद में बाबू लाल मरांडी की पार्टी की पार्टी JVM के 6 विधायक भाजपा के शामिल हो गए थे. लेकिन इस बार मामला बिलकुल उलट गया और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस राजद की महागठबंधन ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया.

क्या वजहें रही भाजपा के हार की ?

2014 में जब झारखण्ड में विधानसभा चुनाव हुए थे तो उससे ठीक 6 महीने पहले ही लोकसभा चुनाव में केंद्र में नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आये थे. देश की जनता पर मोदी का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था. नतीजन जितने भी चुनाव हुए उसके बाद अधिकतर में भाजपा ने जीत दर्ज की. लेकिन इस बार हालात अलग थे.

हालाँकि इस बार भी विधानसभा चुनाव से 6 महीने पहले भाजपा केंद्र की सत्ता में दुबारा पहले से भी ज्यादा बहुमत के साथ वापस लौटी लेकिन राज्य में भाजपा के खिलाफ 5 सालों की सत्ता विरोधी लहर थी. साथ ही इस बार भाजपा से उसकी पुरानी सहयोगी आजसू छिटक कर अलग हो गई. आजसू ज्यादा सीटें मांग रही थी लेकिन भाजपा ने उसे ज्यादा सीटें देने की बजाये अकेले चुनावी मैदान में उतरना सही समझा लेकिन ये दांव उल्टा पड़ गया.

चुनाव आयोग के वेबसाईट से

2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने करीब 34 प्रतिशत वोट मिले और सीटें मिली 25 जबकि उससे अलग हो कर लड़ी आजसू ने करीब 8 फीसदी वोट हासिल किये. दूसरी तरफ जेएमएम के नेतृत्व वाली महागठबंधन में तीन पार्टियों ने मिल कर 35 फीसदी वोट हासिल किये. अगर भाजपा और आजसू के वोट को जोड़ दें तो दोनों संयुक्त रूप से 42 फीसदी वोट हासिल करते हैं, जो महागठबंधन से कहीं ज्यादा है. इसके अलावा जेडीयू ने भी 0.71 फीसदी वोट हासिल किये और लोजपा को 0.27 फीसदी वोट मिले. अगर ये सभी साथ मिल कर लड़ें होते तो शायद तस्वीर अलग होती. 1 फीसदी वोटों का अंतर भी 4 से 5 सीटों का फर्क डालता है लिहाजा भाजपा और आजसू का एक साथ लड़ना जाहिर सी बात है उन्हें दोबारा राज्य की सत्ता में ले आता. तो इस तरह बात साफ़ है कि अपने सहयोगी को खुद से दूर जाने देना भाजपा को महंगा पड़ गया और उसके हाथ से एक अहम राज्य निकल गया.