30 सालों में ऐसे शिवसेना के पर कतर कर महाराष्ट्र में बड़ा भाई बन गई BJP

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साल 2006, सितम्बर का महीना. शरद पवार की बेटी सुप्रिया ने राज्यसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की. ये बात बाला साहब ठाकरे को पता चली तो उन्होंने शरद पवार को फोन किया और कहा, “शरद बाबू मैं सुन रहा हूँ, हमारी सुप्रिया चुनाव लड़ने जा रही है और तुमने मुझे इसके बारे में बताया ही नहीं. मुझे यह ख़बर दूसरों से क्यों मिल रही है?” तो शरद पवार ने जवाब दिया “शिवसेना +भाजपा गठबंधन ने अपनी उम्मीदवार की घोषणा पहले ही कर दी है इसलिए मैंने आपको नहीं बताया”. तब बाला साहब ठाकरे ने कहा “मैंने उसे तब से देखा है जब वो मेरे घुटनों के बराबर हुआ करती थी. मेरा कोई भी उम्मीदवार सुप्रिया के ख़िलाफ़ चुनाव नहीं लड़ेगा. तुम्हारी बेटी मेरी बेटी है.”

तब पवार ने पूछा, “भाजपा के साथ आपका गठबंधन है, आप उनका क्या करेंगे?” तो बाला साहेब ने ठहाका लगाते हुए कहा, “कमलाबाई की चिंता मत करो. वो वही करेगी जो मैं कहूंगा.” ये बातें शरद पवार ने अपनी आत्मकथा ऑन माई टर्म्स में लिखी है.

बाला साहेब कमल के फूल चुनाव चिन्ह वाली भाजपा को कमलाबाई कहा करते थे. ये उस दौर की बात है जब महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना बड़ा भाई हुआ करती थी और भाजपा उसका छोटू. लेकिन अब दौर बदल चूका है. नेतृत्व बदल चूका है और बदल चूका है रुतबा. साल 2014 में जब दोनों पार्टियों ने 25 सालों के साथ को तोड़ने का फैसला किया तो उसके बाद जैसे इतिहास ही बदल गया. कभी ठाकरे के आगे कमलाबाई नतमस्तक थी और आज कमलाबाई के आगे ठाकरे परिवार नतमस्तक है.

साल 1990 में जब दोनों पार्टियों ने पहली बार गठबंधन किया था तब शिवसेना ने 183 सीटों पर चुनाव लड़ा था और भाजपा के हिस्से में आई थी 104 सीटें लेकिन आज 30 सालों बाद भाजपा 164 सीटों पर चुनाव लड़ रही तो शिवसेना के हिस्से आई है सिर्फ 124 सीटें.

साल 1989 से पहले शिवसेना और भाजपा दो अलग अलग धाराएं थी. दोनों धाराओं को साथ लाने का श्रेय जाता है दिवंगत बाला साहेब ठाकरे और प्रमोद महाजन को. जब दोनों पार्टियों का संगम हुआ तो शिवसेना ने अपने पास 183 सीटें रखी और भाजपा की झोली में डाली 104 सीटें. 183 में से शिवसेना ने 52 सीटें हासिल की जबकि भाजपा ने 42 सीटों पर जीत हासिल की. हालाँकि साथ आने के बावजूद गठबंधन सत्ता में नहीं आ सका.

उसके बाद 1995 में शिवसेना ने अपने पास 183 सीटें रखी और भाजपा के कोटे में एक सीट का इजाफा कर दिया. यानी भाजपा 105 सीटों पर चुनाव लड़ी. जब चुनाव परिणाम आये तो  शिवसेना को 73 और बीजेपी को 65 सीटों पर जीत मिली और पहली बार गठबंधन सत्ता में आया. ज्यादा सीटों पर भले ही शिवसेना ने चुनाव लड़ा था लेकिन स्ट्राइक रेट भाजपा का शानदार रहा. क्योंकि करीब 78 सीट ज्यादा पर चुनाव लड़कर शिवसेना भाजपा में मात्र 8 सीट ज्यादा हासिल कर सकी थी.

बाल ठाकरे और प्रमोद महाजन

साल 2000 में शिवसेना ने अपने हिस्से रखी 161 सीटें और भाजपा 117 सीटों पर चुनाव लड़ी. शिवसेना के 69 और बीजेपी के 56 विधायक जीतकर आए, लेकिन सत्ता हाथ से निकल गई. साल 2004 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने 163 और बीजेपी ने 111 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन इस बार भी सत्ता दूर की कौड़ी बनी रही. दोनों पार्टियों को सत्ता से बाहर आये 10 साल हो चुके थे. फिर आए 2009 के चुनाव,  इस चुनाव में शिवसेना ने 169 और बीजेपी ने 119 सीटों पर चुनाव लड़ा. सत्ता तो इस बार भी नहीं मिली लेकिन इस बार पासा पलट गया. शिवसेना से 2 सीटें ज्यादा हासिल कर भाजपा बड़े भाई की भूमिका में आ गई. बीजेपी के 46 विधायक जीते और शिवसेना के 44 विधायक विधानसभा पहुंचे.

2014 के मोदी लहर में जब भाजपा को केंद्र में पूर्ण बहुमत मिला तो अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी ने राज्यों में अपना विस्तार शुरू किया. पार्टी के पास अब मोदी नाम का ब्रह्मास्त्र था. भाजपा ने केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी और अब वो राज्यों में छोटे भाई की भूमिका निभाने को तैयार नहीं थी. लिहाजा 25 साल पुराना शिवसेना+भाजपा गठबंधन टूट गया. बीजेपी ने 260 सीटों पर चुनाव लड़कर 122 सीटें हासिल की जबकि शिवसेना ने 282 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन 63 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी.

हालाँकि भाजपा पूर्ण बहुमत पाने से थोडा पीछे रह गई और शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाई. लेकिन इस बार भाजपा निर्विवादित रूप से बड़े भाई की भूमिका में आ गई और मुख्यमंत्री भी उसका अपना है. 2019 में भाजपा ने अपने पास 164 सीटें रखी है और छोटे भाई शिवसेना को 124 सीटों पर संतोष करना पड़ रहा है. शिवसेना के पास अब बाला साहब ठाकरे नहीं है. उद्धव ठाकरे में बाला साहब वाली आग नहीं है.आदित्य ठाकरे राजनीती का ककहरा सीख रहे हैं. अब शिवसेना के पास कमलाबाई की बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं है.