GST काउंसिल का बड़ा फैसला,घर लेना हुआ पहले से आसान

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रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य कि आधारभूत जरूरतें हैं. रोटी और कपड़ा तो आसानी से मिल जाता है लेकिन मकान खरीदने के लिए आपको और हमको सालों साल मेहनत करनी पड़ती है. अपने खर्चो को कंट्रोल करके रखना पड़ता है. यही नहीं, इतना सब करने के बाद भी जब हम मकान बनाने या खरीदने जाते है तो सरकार द्वारा ज्यादा टैक्स लिए जाने पर हमारे खर्च और ज्यादा बड़ जाते हैं. इसीलिए आधारभूत जरूरतों में मकान को रोटी और कपड़े के बाद रखा गया है.

लेकिन केंद्र सरकार ने हाल ही में एक ऐसा कदम उठाया है जिससे मकान बनाना या खरीदना अब पहले से काफी आसान हो जायेगा. GST काउंसिल ने अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट और सस्ते घरों पर GST यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्स को घटने का निर्णय कर लिया है. एक अप्रैल 2019 से अंडर कंस्ट्रक्शन फ्लैटों पर मौजूदा 12 प्रतिशत की जगह अब 5 प्रतिशत gst कर दी गयी है. इसका मतलब अगर आप पहली बार 45 लाख रुपए के मकान की खरीदेंगे तो आपको 5.82 लाख रुपए तक ही बचत होगी.

अब मकान खरीदने पर आपको 7 प्रतिशत कम टैक्स देना होगा. 45 लाख का 7 प्रतिशत होता है तीन लाख पंद्रह हज़ार. और अगर आप पहली बार मकान खरीद रहे है तो आपको प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत होम लोन पर 2.67 लाख रुपए कि सब्सिडी भी मिलेगी. तो इस तरह से आपको 45 लाख के मकान पर 5.82 लाख रुपए कि बचत होगी. मतलब अब किफायती घर खरीदना होगा और आसान.

सभी को घर मिल सके इसके लिए सरकार ने किफायती मकानों की परिभाषा भी बदल दी है. मेट्रो शहर जैसे दिल्ली, मुंबई में 60 वर्ग मीटर करीब 650 वर्ग फीट के घर किफायती श्रेणी में और नॉन मेट्रो शहरों में 90 वर्ग मीटर यानी 970 वर्ग फीट को किफायती मकान कि श्रेणी में रखा गया है. 60 वर्ग मीटर यानी टू.बी.एच.के फ्लैट और 90 वर्ग यानी थ्री बी.एच.के फ्लैट. इसका मतलब अब किफायती मकानों कि परिभाषा में घर पहले से बड़े हैं. जाहिर है लो इनकम ग्रुप के लोग अब पहले से बड़ा घर सस्ते दामों में ले सकेंगे. शर्त ये है कि मकान कि कीमत 45 लाख रुपए हो. इन किफायती घरों पर मौजूदा टैक्स 8 प्रतिशत लगता था जिसे घटाकर अब सिर्फ 1 प्रतिशत कर दिया गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि जरूरतमंद लोगों के पास भी अच्छा मकान हो और सरकार के इस कदम से इन श्रेणी के लोगों को फायदा मिल सके.

ये फैसला gst काउंसिल ने 24 फ़रवरी को अपनी 33वि बैठक में वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में लिया.
दरअसल केंद्र सरकार हाउसिंग के क्षेत्र में बहुत कदम पहले भी उठा चुकी है. 2016 में सबसे पहले केंद्र सरकार ने रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी एक्ट को पारित किया था जिसे रेरा एक्ट भी कहा जाता है. इस एक्ट के पहले बिल्डरों से घर का कब्ज़ा देर से मिलना, फ्रॉड हो जाना जैसी समस्याएं घर खरीदने में आती थी.
इन सभी समस्याओं से निपटने के लिए रेरा एक्ट के अंदर कुछ ऐसे प्रावधान किए गए हैं जिससे आपको और हमको अब घर खरीदने में कोई परेशानी नहीं होगी.

सबसे मुख्य प्रावधान है, हर राज्य कि खुद कि एक रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथोरिटी होगी. जिसके दायित्व होंगे ये.
कि बिल्डर्स के हाउसिंग प्रोजेक्ट सही समय पर पूरे हो.

खरीदने वाले कि 70 प्रतिशत राशी को एक अलग अकाउंट में रखा जाये जो सिर्फ बिल्डिंग निर्माण में ही इस्तेमाल हो.

घर बनाने के बाद कुछ सालो तक बिल्डर कि जिम्मेदारी होगी. इससे क्वालिटी ऑफ़ कंस्ट्रक्शन पहले से बेहतर होगी.

अगर कोई विवाद होता है खरीदार और बिल्डर के बीच तो उसका निवारण आसानी से और जल्दी से किया जाये.
दाम सिर्फ कारपेट एरिया का ही चार्ज ही हो.

बिल्डर का track रिकॉर्ड , परमिट्स और एप्रूव्ड प्लान्स अब सब ऑनलाइन ही होंगे जिसे खरीदार खुद देख सके.
तो ये साफ़ कि पहले घर खरीदते समय खरीदार का पक्ष बिल्डर के मुकाबले कमजोर रहता था. अगर कोई रुकावट या अड़चन बिल्डर कि तरफ से होती थी तो एक आम खरीदार कुछ नहीं कर सकता था. लेकिन रेरा कानून के बाद अब ग्राहक जाग रहा है और पहले ज्यादा सशक्त भी हुआ है.

प्रधानमंत्री का लक्ष्य भी है कि 2022 तक हर भारतीय के पास खुद का घर हो. ऐसे प्रभावी कदमों से लगता है कि सरकार अपने लक्ष्य को जल्द से जल्द पूरा करना चाहती है.