जाधवपुर यूनिवर्सिटी में हुई बाबुल सुप्रियो के साथ गुंडागर्दी पर खामोशी क्यों ?

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अभिव्यक्ति की आजादी की बात करने वाली “टुकड़े गैंग” क्या आपको सिर्फ अपने लिए ही “अभिव्यक्ति की आजादी” चाहिए. दूसरों के लिए क्या कोई “अभिव्यक्ति की आजादी” नहीं ? उस राज्य को आप किस श्रेणी में रखेंगे जिस राज्य के वामपंथी गुंडे अपने ही राज्य के राज्यपाल को बंधक बना ले. आज एक मामले ने ये चीज़ तो साबित कर दी है कि वामपंथी किसी दूसरी विचारधारा को बर्दास्त नहीं कर सकते, जाधवपुर यूनिवर्सिटी में रखे गए एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो गए थे, उनके वहां जाते ही उन पर जानलेवा हमला किया गया और फिर 6 घंटे तक उन्हें बंदी बना कर रखा गया, ये नक्सली इतने गिर गए कि बाबुल सुप्रियो की गाड़ी पर लगा राष्ट्रीय ध्वज तक फाड़ कर फेंक दिया.

अगर यही हरकत किसी वामपंथी के साथ हुई होती तो अभी तक पूरी मीडिया और पूरा विपक्ष हाए तौबा मचा चुका होता, असहिष्णुता का रोना रो चुका होता, जगह जगह धरना प्रदर्शन किए जाते, देश में emergency आ चुकी होती और मोदी जी से इस्तीफा की मांग कर दी जाती, लेकिन ये तो भाजपा के नेता थे, इनके साथ तो चलता है,
एक तरफ ये सब हो रहा था तो दूसरे तरह पुलिस खड़ी हो कर तमाशा देख रही थी . हालात इतनी बुरी थी कि अंत में बाबुल सुप्रियो को बचाने खुद राज्यपाल को आना पड़ा नहीं तो ये लोग शायद उन्हें ज़िंदा भी न छोड़ते. वहां के छात्र तो खुले आम सोशल मीडिया पर ये कह रहे थे कि बाबुल सुप्रियो को तो मार डालना चाहिए था, यही शिक्षा पाई है उन्होंने इस यूनिवर्सिटी में.

वैसे आपको बता दें कि सभी लेफ्ट लीनिंग लोगों के ख़ेमे में बड़ा सन्नाटा छाया हुआ है, सभी कांग्रेसी और बाकी पार्टियों के लोग इन अर्बन नक्सलों के किए हमले पर शांत हैं, उन्होंने मौन व्रत धारण कर लिया है क्योंकि अब लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं है. और तो और जब ये सब हो रहा था तो ममता बनर्जी जी ने सब जानते हुए भी बाबुल सुप्रियो की मदद के लिए कोई प्रयास नहीं किया, उल्टे गवर्नर को भी वहां जाने से मना कर दिया और घर बैठे इस सबके मज़े लेती रहीं, इस वाक़िये ने एक और बात साबित कर दी कि प.बंगाल में कानून व्यवस्था भी पूरी तरफ से समाप्त है. जब सांसद ही सुरक्षित नहीं है तो आम लोग क्या सुरक्षित होंगें, सोचिए इस यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले उन बच्चों की क्या दुर्गत होती होगी जो इन अर्बन नक्सलियों की सोच से कुछ ताल्लुक नही रखते होंगे. इससे एक बात तो साफ़ हो गई है कि जाधवपुर यूनिवर्सिटी दूसरी JNU बन चूका हैं.