पाकिस्तान में भी गूंजा JNU वाला आज़ादी का नारा

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हम ले के रहेंगे आज़ादी, हम कह के लेंगे आज़ादी, जो तुम न दोगे आज़ादी तो छीन के लेंगे आज़ादी. ये नारे आप ने अब तक जेएनयू में सुने होंगे लेकिन अब ये नारा देश की सरहदों को पार कर पाकिस्तान तक पहुँच गया है. सोशल मीडिया पर आज़ादी के नारे लगाते छात्रों का एक विडियो जमकर शेयर हो रहा है. एक नज़र में तो ये विडियो आपको जेएनयू का ही लगेगा लेकिन करीब एक मिनट के बाद जैसे ही सुनाई देता है इमरान से लेंगे आज़ादी, बाजवा से लेंगे आज़ादी, बलूचिस्तान मांगे आज़ादी, सिंध भी मांगे आज़ादी तो यकीन होता है कि ये विडियो पाकिस्तान का है.

आज़ादी के नारे लगाते ये छात्र लाहौर यूनिवर्सिटी के हैं. लाहौर में मशहूर शायर फैज अहमद फैज की याद में फैज लिटरेचर फेस्टिवल मनाया जा रहा था, ये फेस्टिवल 15 से 17 नवम्बर तक मनाया गया. उसी फेस्टिवल के दौरान छात्र आज़ादी के नारे लगा रहे थे. ये छात्र पाकिस्तान के प्रमुख छात्रसंघ “प्रोग्रेसिव स्टूडेंट कलेक्टिव” से जुड़े हैं और इनके झंडे का रंग लाल है. ये पाकिस्तान का वामपंथी छात्र संगठन है क्योंकि आज़ादी के नारों के साथ एक नारा और गूंजता है – “जब लाल-लाल लहराएगा, तब होश ठिकाने आएगा” और “सुर्ख होगा- सुर्ख होगा, एशिया सुर्ख होगा”.

छात्रों का ये नारा पाकिस्तान के साथ साथ भारत में भी वायरल हो गया. भारत के वामपंथी इन विडियो को खूब पसंद कर रहे हैं और सबसे दिलचस्प बात ये है कि ये नारे ऐसे वक़्त में वायरल हुए हैं जब दिल्ली में JNU छात्रों का फीस में वृद्धि के विरोध में उग्र प्रदर्शन जारी है. जेएनयू छात्रों के संसद मार्च में भी आज़ादी के नारे सुनाई दिए. लेकिन क्या आपको पता है अक्सर गूंजने वाले इन आज़ादी के नारों की ओरिजिन कहाँ है? मतलब सबसे पहले आज़ादी सीरिज के नारे किसने लगाए जो आज वामपंथी गुटों का सबसे पसंदीदा नारा बन गया?

पाकिस्तानी पत्रकार वुसअतुल्लाह ख़ान के अनुसार ये नारे नए नहीं है बल्कि 1968 में जनरल अयूब खान ने जब पाकिस्तान की सत्ता पर कब्ज्जा कर लिया था तब रावलपिंडी से करांची तक कि सड़कों पर पाकिस्तानी छात्रों ने ये नारे लगाए थे और वो आज़ादी स्लोगन फैज अहमद फैज की नज्म “बोल के लैब आज़ाद है तेरे” से प्रेरित थे. फैज़ साहब ने लिखा था,
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है…

फैज़ के इसी नज्म को विकृत कर आज़ादी का वो स्लोगन बनाया गया वो वर्तमान में वामपंथियों का पसंदीदा नारा बन गया. लेकिन फिर भी ठीक ठीक ये नहीं बताया जा सकता कि सबसे पहले किसने ये नारा लिखा और लागाया. आज़ादी सीरिज के इस स्लोगन में वामपंथियों का गुट ओने सहूलियत के हिसाब से चीजें जोड़ता गया और अब इन नारों में अक्सर देश विरोधी नारे भी लगा दिए जाते हैं.