बात कुर्सी की है और कुर्सी तो विधायक जी लेकर ही रहेंगे

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कुर्सी है तो राजनीति है, या फिर यूँ कहा जाए कि कुर्सी की ही राजनीति है. कुर्सी के ऊपर से एक नेता जी हट जाएँ तो ये किसी और की हो जाती है. लेकिन अगर एक नेता जी के नीचे से कुर्सी हट जाए तो फिर ये तबतक कहीं के नहीं रहते जबतक इनको दूसरी कुर्सी नहीं मिल जाती.

बहुत बार ऐसा होता है कि जब पार्टी किसी नेता से खुश नहीं होती तो वो उस नेता की कुर्सी छीन लेती है. लेकिन अभी हाल फिलहाल की एक घटना में इसका बिलकुल उल्टा ही देखने को मिला है. कांग्रेस पार्टी के एक नेता जी ने कांग्रेस से कुर्सी छीन ली हैं.

घटना महाराष्ट्र के औरंगाबाद की है. औरंगाबाद के सिलोद में कांग्रेस पार्टी के एक कद्दावर विधायक हैं अब्दुल सत्तार. लेकिन इन्ही अब्दुल सत्तार साहब को कांग्रेस पार्टी ने इस बार चुनाव में टिकट नहीं दिया. टिकट ना दिए जाने की वज़ह से विधायक साहब पार्टी से नाराज़ हो गए, बहुत ज्यादा नाराज़ हो गए, इतने नाराज़ हो गए कि कांग्रेस के स्थानीय कार्यालय से 300 कुर्सियां तक उठवा लीं.

औरंगाबाद के सिलोद से विधायक अब्दुल सत्तार ने नाराज़ होकर साफ़ कह दिया कि वो पार्टी छोड़ चुके हैं. उन्होंने कहा कि उन्होंने कांग्रेस कार्यालय से जो कुर्सियां उठवाई हैं वो उनकी अपनी हैं. और उनका उनपर मालिकाना हक है.

औरंगाबाद में “गांधी भवन” कांग्रेस का स्थानीय कार्यालय है, और अपने इसी कार्यालय पर कांग्रेस ने एनसीपी के साथ एक बैठक का आयोजन किया था. एनसीपी महागठबंधन में कांग्रेस की सहयोगी है. लेकिन ये बैठक हो पाती उससे पहले ही अब्दुल सत्तार अपने समर्थकों को लेकर गांधी भवन पहुंचे और गिनकर अपनी 300 कुर्सियां निकलवा लीं.

उनके कुर्सियां निकलवा लेने से बैठने की व्यवस्था डगमगा गई. कांग्रेस और एनसीपी दोनों पार्टियों की बैठक लटक गई. और आखिर में ये बैठक एनसीपी के ऑफिस में की गई.

अब्दुल सत्तार जिले के एक नामी नेता हैं. उन्हें ये उम्मीद थी कि कांग्रेस की तरफ से इस बार के लोकसभा चुनाव में उनका टिकट पक्का है. लेकिन कांग्रेस ने उनकी उम्मीदों के साथ खेल कर दिया, और उसी सीट पर टिकट दे दिया सुभाष झांबड को. विधायक अब्दुल सत्तार इस बात से नाराज़ हो गए कि उनकी जगह विधान परिषद सदस्य सुभाष झांबड को टिकट दे दिया.

अब्दुल सत्तार ने अपनी सभी कुर्सियां गिनवा लीं, और कहा,

“हां! वो सभी कुर्सियां मेरी थीं, और मैंने ही कांग्रेस की बैठकों के लिए इनकी व्यवस्था की थी. अब मैंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी है, इसलिए अपनी कुर्सियां भी ले ली हैं. जिन्हें टिकट मिला है वो ही कुर्सियों की भी व्यवस्था करें’

लेकिन एक तरफ जहां कांग्रेस से रूठे हुए अब्दुल सत्तार ऐसा कह रहे हैं कि उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी है, वहीं दूसरी तरफ उनकी सीट से टिकट पाने वाले सुभाष झांबड ने इस पूरी घटना को मामूली बताते हुए कहा है कि,

‘अब्दुल सत्तार को जरूरत होगी इसलिए कुर्सियां ले गए हैं. हम निराश नहीं हैं. सत्तार अभी भी कांग्रेस में ही हैं, क्योंकि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है.’

चुनावी घमासान की घोषणा होने के बाद इस तरह की घटना का सामने आना पार्टी के लिए अच्छी बात तो बिलकुल भी नहीं है. कहीं ना कहीं इस सीट पर पार्टी को इसका असर देखने को मिलेगा ही. खैर, बात जो भी हो, लेकिन इस लड़ाई ने हमें बचपन की याद दिला दी. ये लड़ाई बिलकुल वैसी ही थी जैसी 90 के दशक में छोटे बच्चों के बीच होती थी. बच्चे जब अपने दोस्तों से लड़ते थे, तो उनसे वो सभी चीज़ें मांग लेते थे जो उन्होंने दोस्तों को दी थीं.

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