अक्षय पात्र का मिड डे मील धार्मिक है लेकिन जोमैटो के खाने का कोई धर्म नहीं है

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ज़ोमैटो विवाद ने सोशल मीडिया को दो धडों में बाँट दिया . कुछ लोग ऐसे थे जो जोमैटो के साथ खड़े थे. ये लोग इस बात से सहमत थे कि खाने का कोई धर्म नहीं होता और इस तरह से ये समाज को बांटने वाली बातें सही नहीं है .वहीँ कुछ लोग ऐसे भी थे जो ज़ोमैटो के खिलाफ थे . उनका कहना था कि जब ज़ोमैटो मुस्लिम कस्टमर को हलाल मीट न दे पाने के कारण खेद जाता सकता है तो सावन के महीने में एक हिन्दू कस्टमर के कहने पर मुस्लिम डिलीवरी बॉय क्यों नहीं बदल सकता .

ज़ोमैटो ने मुस्लिम डिलीवरी बॉय को बदलने के बदले कस्टमर अमित शुक्ल को जो जवाब दिया उसे इंटेलेक्चुअल लोगों ने काफी पसंद किया . उन्ही लोगों में एक हैं मिरर नाउ की जर्नलिस्ट फाय डिसूजा. ज़ोमैटो के फाउंडर दीपेन्द्र गोयल ने जब ट्वीट किया – हमें भारत के विचार और हमारे सम्मानित ग्राहकों और भागीदारों की विविधता पर गर्व है। हमारे मूल्यों के रास्ते में आने वाले किसी भी ग्राहक को खोने के लिए हमें खेद नहीं है” तो फाय डिसूजा ने दीपेन्द्र गोयल के ट्वीट की सराहना की . लेकिन ज़ोमैटो के इस पुरे विवाद ने फाय डिसूजा जैसे इंटेलेक्चुअल और लिबरल लोगों के दोहरे चरित्र की पोल खोल दी .

आइये जरा आपको एक घटना बताते हैं . आपको अक्षय पात्र फाउंडेशन  के मिड डे मील में लहसून प्याज वाला मसला आपको याद होगा. अक्षय पात्र फाउंडेशन इस्कॉन की एक संस्था है। इस्कॉन एक धार्मिक संस्था है तो अक्षय पात्र फाउंडेशन सिर्फ वैष्णव भोजन बनाती है। वैष्णव भोजन दरअसल सात्विक भोजन को कहते हैं जिसमे लहसून और प्याज का इस्तेमाल नहीं होता . लेकिन ये बात कुछ लिबरल ईट इंटेलेक्चुअल लोगों को अखर गई और इन्ही लोगों में से एक थी मिरर नाउ की जर्नलिस्ट फाय डिसूजा .

फाय डिसूजा ने इस मसले पर एक प्राइम टाइम चलाया था और अक्षय पात्र द्वारा तैयार मिड डे मील में लहसन और प्याज न होने को मुद्दा बनाया था . फाय डिसूजा ने कहा था कोई भी बच्चों पर ये नहीं थोप सकता कि वो क्या खाए और क्या नहीं. डिसूजा के मुताबिक़ अक्षय पात्र फाउंडेशन द्वारा परोसे जा रहे मिड डे मील में लहसून प्याज नहीं है इसलिए उन्हें भोजन नीरस लगता है. अक्षय पात्र बच्चों के खाने में लह्सब प्याज न डाल कर अपने धार्मिक विचार उनपर थोप रही है .

अब जरा फाय डिसूजा ये बताएं कि जब खाने का कोई धर्म नहीं होता तो फिर वो ये कैसे समझ गई कि अक्षय पात्र मिड डे मील के जरिये धार्मिक खाना परोस रहा है और अपने धार्मिक विचार बच्चों पर थोप रहा है . खाना तो खाना होता है. खाना अपने आप में ही एक धर्म है. फिर चाहे वो अक्षय पात्र फाउंडेशन का खाना हो या ज़ोमैटो का खाना हो . लेकिन यहाँ बात खाने की नहीं एजेंडे की है . जब आपके एजेंडे में फिट हो गया तो खाने का धर्म होता है और जब आपके एजेंडे में फिट नहीं हुआ तो खाने का धर्म नहीं होता है। जब बात मुस्लिम सेंटिमेंट की आये तो कस्टमर के लिए हलाल खाना न भेज पाने के लिए क्षमा मांग लो और जब बात हिन्दू सेंटिमेंट की आये तो लम्बा चौड़ा ज्ञान बघार दो.

ये सोशल मीडिया का जमाना है . सोशल मीडिया सबके कर्मों का हिसाब रखता है ताकि समय आने पर आपके दोहरे चरित्र का कच्चा चिटठा आपके ही मुंह पर ही खोला जा सके .