22 कंपनियों ने भारत में अपना प्रोडक्शन यूनिट लगाने के लिए आवेदन दिया, इनमे से आधी स्मार्टफोन कंपनियां हैं

595

दुनिया भर में चीन कोरोना वायरस और अपनी विस्तारवादी नीतियों के कारण अलग थलग चल रहा है. ऐसे में कम्पनियाँ चीन से बाहर निकल कर अपने लिए दूसरा ठिकाना ढूंढ रही हैं ताकि प्रोडक्ट पर लिखे मेड इन चाइना की वजह से लोग कंपनी और उनके प्रोडक्ट का बहिष्कार न करें. चीन से निकलने वाली कंपनियों के लिए भारत सरकार ने रेड कारपेट बिछा दिया. मोदी सरकार ने आत्मनिर्भर भारत और देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए कई कदम उठाये. अब इन कदमों का फायदा मिलता भी दिख रहा है. मोदी सरकार के प्रॉडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम के तहत पूरी दुनिया की 22 कंपनियों ने आवेदन किया है. ये 22 कम्पनियाँ भारत में अपना मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाना चाहती है.

जिन 22 कंपनियों ने भारत में अपना मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने के लिए आव्दन किया है उनमे मोबाइल कंपनियों की बहुतायत है. केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ये कंपनियां अगले पांच सालों में 11.5 लाख करोड़ का मोबाइल फोन और कंपोनेंट तैयार करेंगी. इनमें से 7 लाख करोड़ का प्रॉडक्ट निर्यात किया जाएगा. उन्होंने कहा कि ये कंपनियां 3 लाख डायरेक्ट और करीब 9 लाख इनडायरेक्ट जॉब्स भी पैदा करेंगी.

मोदी सरकार ने प्रॉडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम के लिए 41 हजार करोड़ का बजट रखा है. सरकार इस स्कीम के जरिये दुनिया भर की कंपनियों को भारत में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने के लिए आमंत्रित कर रही है.  इस योजना के तहत प्रस्ताव जमा कराने वाली विदेशी कंपनियों में सैमसंग, फॉक्सकॉन होन हेई, राइजिंग स्टार, विस्ट्रॉन और पेगाट्रॉन शामिल हैं. ताइवान की कंपनी पेगाट्रॉन कॉन्ट्रैक्ट पर ऐपल आईफोन का प्रॉडक्शन करती हैं. इस योजना के लिए कई भारतीय कंपनियों ने भी आवेदन किया है. लावा, डिक्सन टेक्नोलॉजीज, माइक्रोमैक्ट तथा पैजट इलेक्ट्रॉनिक्स भी भारत सरकार की इस स्कीम का फायदा उठाना चाहती है. लावा ने तो अगले 5 सालों में भारत में 800 करोड़ निवेश करने का ऐलान भी कर दिया है.