जब फ्लोर टेस्ट के दौरान विधानसभा में चले लात-घूंसे और जूते -चप्पल

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महाराष्ट्र जिस सियासी संकट से गुजर रहा है उसे लोकतंत्र की हत्या, अराजकता और तानाशाही बताया जा रहा है. ऐसा नहीं है कि महाराष्ट्र पहला ऐसा राज्य है जो इस तरह के राजनीतिक संकट से गुजर रहा है और ना ही आखिरी राज्य. देश का राजनीतिक इतिहास जितना लम्बा है, सियासी संकटों का इतिहास भी उतना ही लम्बा है. महाराष्ट्र में जो संकट पैदा हुआ है उसके लिए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है लेकिन अगर अतीत में जाएँ तो 1998 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने जो किया था उसके सामने भगत सिंह कोश्यारी तो मासूम साबित होते हैं. रोमेश भंडारी ने आधी रात को बहुमत से चल रही सरकार को बर्खास्त कर किसी और को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी.

उत्तर प्रदेश की 13वीं विधानसभा भारत के राजनीतिक इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है. ये वो विधानसभा है जिसे हर कोई अपनी स्मृतियों से भुला देना चाहता है लेकिन महाराष्ट्र में उठ रहे सवालों ने उत्तर प्रदेश के 13वीं विधानसभा की यादें ताजा कर दी.

जब 5 साल में देखे चार मुख्यमंत्री

ये विधानसभा न सिर्फ अस्थिरता की प्रतीक बनी बल्कि खरीद फरोख्त से लेकर लोकतंत्र के मंदिर विधानसभा में चप्पल जूते तक चले. ये संभवतः पहली ऐसे विधानसभा थी जिसने 5 साल के कार्यकाल में चार मुख्यमंत्री देखे और साथ ही राष्ट्रपति शासन भी देखा. एक वक़्त ऐसा भी आया जब सदन में एक साथ दो दो मुख्यमंत्री बैठे हुए थे और कौन असली मुख्यमंत्री है उसके लिए बहुमत परीक्षण कराया गया.

साल 1996, जब उत्तर प्रदेश कि 13वीं विधानसभा का चुनाव परिणाम आया तो किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाया. 425 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा 173 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी. समाजवादी पार्टी को 108, बसपा को 66 और कांग्रेस को 33 सीटें मिली.

राज्य में जिस वक़्त चुनाव हुए उस वक़्त पिछले एक साल से राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था. चुनाव के बाद जब किसी को बहुमत नहीं मिला तो राज्यपाल रोमेश भंडारी ने राष्ट्रपति शासन 6 महीने और बढाने की सिफारिश कर दी. उसके बाद भाजपा और बसपा ने गठबंधन किया और एक ऐसा फ़ॉर्मूला ले कर आई जो आज़ाद भारत ने कभी नहीं देखा था. दोनों पार्टियों ने छह-छह महीने राज्य का शासन चलाने का फ़ैसला किया.

21 मार्च 1997 को मायावती 6 महीनों के लिए मुख्यमंत्री बनी. 6 महीनों बाद मायावती ने कुर्सी छोड़ी तो कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने और मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने उन सभी फैसलों को पलटना शुरू कर दिया जो मायावती ने पिछले 6 महीनों में मुख्यमंत्री रहते हुए किये थे. नाराज मायावती ने एक महीने के भीतर ही कल्याण सिंह सरकार समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई.

फ्लोर टेस्ट में जो हुआ वो कलंक था

राज्यपाल रोमेश भंडारी ने दो दिन के भीतर ही कल्याण सिंह को अपना बहुमत साबित करने का आदेश दिया और इन दिनों में ही उतर प्रदेश जोड़ तोड़ और टूट फूट का ऐसा नज़ारा देखा जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. बसपा, कांग्रेस और जनता दल में भारी टूट हुई और इन पार्टियों के कई विधायक पाला बदलकर भाजपा के साथ हो गए. फिर आया फ्लोर टेस्ट का दिन. फ्लोर टेस्ट का लाइव प्रसारण हो रहा था. उस दिन देश की जनता ने टीवी पर जो कुछ देखा. सबकी आँखे शर्मिंदगी से झुक गई. विधानसभा के भीतर विधायकों के बीच माइकों की बौछार, लात-घूँसे, जूते-चप्पल सब चले और इन सब के बाद कल्याण सिंह ने बहुमत साबित कर दिया. विपक्ष ने फ्लोर टेस्ट का बहिष्कार किया और विपक्ष की गैमौजुदगी में कल्याण सिंह को 222 विधायकों का समर्थन मिला.

विधानसभा का नज़ारा देख कर राज्यपाल रोमेश भंडारी ने एक बार फिर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी लेकिन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने इस पर विचार करने के लिए फिर से केंद्र सरकार के पास भेज दिया. केंद्र सरकार ने दुबारा सिफारिश  नहीं की. विधानसभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी ने सभी दल बदलुओं की सदस्यता बरक़रार रखी और कल्याण सिंह ने सबको मंत्री बना दिया.

फिर आया 21 फ़रवरी 1998 का दिन. कल्याण सिंह की सरकार बहुमत के साथ चल रही थी लेकिन राज्यपाल ने राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह को बर्ख़ास्त कर जगदंबिका पाल को रात में साढ़े दस बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. अटल बिहारी वायपेयी ने राज्यपाल के फैसले के विरोध में आमरण अनशन शुरू कर दिया. जगदम्बिका पाल के शपथ ग्रहण के बाद मामला रात को ही हाई कोर्ट पहुँच गया. अगले ही दिन हाई कोर्ट ने राज्यपाल के कदम को असंवैधानिक बता कर कल्याण सिंह की सरकार फिर से बहल कर दी. अगले दिन विधानसभा में दिलचस्प नज़ारा था. दो दो मुख्यमंत्री सदन में बैठे हुए थे. एक बार फिर बहुमत परीक्षण हुआ और कल्याण सिंह ने फिर बहुमत साबित किया.

महाराष्ट्र में जो कुछ भी हो रहा है. वो तो कुछ भी नहीं है. देश ने एक से बढ़कर एक काण्ड देखे और झेले हैं.