1989 दंगे का ज़ख्म आज तक नहीं भर पाए है भागलपुर के लोग

देश के इतिहास का बदनुमा दाग है भागलपुर दंगा
एक दंगा जिसने बदल दी बिहार की सियासत
दंगे की ताप आज भी महसूस करते हैं भागलपुर के लोग
भागलपुर दंगों का ‘दाग’ किस पर लगा….

24 अक्टूबर 1989, दिन के 12 बज रहे थे…भागलपुर शहर से रामजन्मभूमि आंदोलन के शिला पूजन का एक जुलूस शुरू हुआ था…लेकिन किसने सोचा था की इस जश्न में उपद्रवी ऐसा भंग डालेंगे….की ढोल-नगाड़ों से गुज़ने वाला इलाका…गोलियों की तड़तड़ाहट से गुज़ने लगेंगा..लोग एक-दूसरे पर लाठियां भाजेंगे….सड़को पर हंगामा मचाते लोग होंगे….आग में जुलसती दूकाने और घरों की तस्वीरें होंगी….लेकिन कुछ ऐसा ही हुआ….जिसे याद कर आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

दंगों की आग में सुलगता भागलपुर

ये भागलपुर दंगों की शुरुआत थी. 1989 के उस साल करीब दो महीने तक भागलपुर जलता रहा…..सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक जहां दो महीने से अधिक समय तक यह दंगा चला था….वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं और दंगा पीड़ितों के मुताबिक लगभग छह महीने तक दंगे होते रहे….भागलपुर जिले में बेहिसाब हिंसा हुई….सैकड़ों लोग मारे गए. 50,000 से ज्यादा लोग बेघर हुए. आसपास के 250 गांवों में हिंसा फैल गई…..सरकार के आकड़ों में ग्यारह सौ से ज़्यादा लोग मारे गए थे….जबकि हकीकत में मारे गये लोगों की संख्या दस हजार से अधिक थी जिनमें अधिकतर मुसलमान थे…

क्यों भड़की थी भागलपुर दंगे की आग

24 अक्‍टूबर 1989 को भागलपुर के परवती इलाके से रामशिला पूजन का एक जुलूस निकला.. यह जुलूस किसी तरह गुजर गया,.. लेकिन, तभी एक विशाल जुलूस आ गया..जुलूस मुस्लिम मोहल्ले के बीचो-बीच चौराहे पर पहुंचा था कि तभी भीड़ में शामिल लोगों ने मुसलमानों के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी..जुलूस के नारे बढ़ते गए, आवाज भी तेज होती गई… इसकी प्रतिक्रिया में दूसरी ओर से पत्थरबाजी शुरू हो गई.. वहां बम का धमाका हुआ…दरअसल, इस हिंसा में कोई मारा नहीं गया..लेकिन पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी…ऐसा कहा जाता है कि पुलिस के द्वारा इसी फ़ायरिंग ने दंगे की शुरुआत कर दी..इस फायरिंग में मारे गए दोनों लोग मुसलमान बताए जाते है….

उधर, जुलूस उन्मादी भीड़ में बदल गई…..शहर में कई तरह के अफवाहों ने जन्म ले लिया….हिंदूओं को मुसलमानों ने मार दिया है…ऐसी ही अफ़वाह शहर के हर कोने से आने लगीं.. इन अफ़वाहों का परिणाम यह हुआ कि समूचा भागलपुर दंगे की चपेट में आ गया..एक ऐसा दंगा जो आजाद भारत में चलने वाला सबसे बड़ा दंगा था…

मानों गंगा की धारा लाल हो गई थी…भागलपुर मुर्दों के शहर में बदल गया…इस दंगे की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि यह केवल शहर तक ही सीमित नहीं रहा..गांवों तक दंगे की आग में जलने लग गए थे…हालांकि उस दौरान भी हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल गढ़ने वाले लोग थे…सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक कई ऐसे हिन्दु थे जिन्होंने मुसलमानों को शरण दे रखी थी ।

बहरहाल, दंगे के शांत होने में करीब छह महीने लगे और इस छह महीने में पूरा भागलपुर तबाह हो चुका था…

कांग्रेस की थी उस वक्त सरकार

जिस समय ये दंगा हुआ, उस समय सरकार थी कांग्रेस की….केंद्र में राजीव गांधी थे….बिहार में कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे सत्येंद्र नारायण सिन्हा….. दंगे के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था…..कांग्रेस को लगा कि इतने भर से मुसलमान उसे माफ कर देंगे. मगर ऐसा नहीं हुआ. मुस्लिम कांग्रेस का परंपरागत वोटर था. मगर इस दंगे के बाद स्थितियां बदल गईं….बिहार में उसके बाद से कभी भी कांग्रेस सरकार में नहीं आई…..क्या आपको भी लगता है की एक इस्तीफा…इतने लोगों के मौत के गम को भूला देने के लिए काफी था….ये आप खुद सोचीए….

भागलपुर अब वो नहीं रहा जो हुआ करता था

कहते है न की दंग का दाग अच्छे शहरों की सूरत बिगाड़ देती है. शहर के व्यवसाय और आर्थिक स्थिती को सालों पीछे धकेल देती है. भागलपुर शहर भी ऐसे शहरों में से एक है. जो शिल्क सिटी के नाम से जाना जाता है. लेकिन साल 1989 के दंगे ने यहां के पुराने कारोबार की कमर तोड़ दी है. दंगे का जख्म आज भी ताजा है. जिसे यहां के लोग झेल रहे हैं.

जो हुआ वो हमने आपको बता दिया….अब आप खुद ही तय किजीए की इस दंगे के जिम्मेदार कौन लोग थे…..और क्युं इस दंगे को रोका ना जा सका….ये दंगा क्युं लगातार 6 महिनों तक चलता रहा…..इन सैकड़ों मासूमों के मौत का जिम्मेदार आखिरकार कौन लोग थे….क्या इतना बड़ा दंगा एक दिन में सुयोजित कर दिया गया….और सरकार और प्रशासन को कानों-कान खबर नहीं लगी….क्या ये संभव है…..या फिर इस मौत को दरकिनार कर इस पर भी सियासत की गई थी….ये खुद सोचीए आप….और ऐसें सांप्रदायिक दंगों से बचने की कोशिश किजीए…

अभी भी भागलपुर के हर गली हर चौराहें से ये आवाज निकलती हैं….’1989 नहीं भूले हैं, खुदा के लिए बस करो’….

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