अटल बिहारी की सरकार को 1 वोट से गिराने के पीछे की पूरी कहानी

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“दरबारों में ओहदों के लिए जब पैरों पे अना गिर जाती है कौवों के सर झुक जाते है चकरा के हया गिर जाती है अब तक तो हमारी आँखों ने बस दो ही तमाशे देखें है या कौम के रहबर गिरते है या लोकसभा गिर जाती है !!” मुनव्वर राणा का ये बड़ा मशहूर शेर है… मैं आपको ये क्यों सुना रहा हूँ ये समझने के लिए आपको मेरी पूरी बात ध्यान से सुननी होगी… साल 1999 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चल रही थी… अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में बनने वाली पहली भाजपा सरकार महज 13 दिनों में ही गिर गयी थी क्योंकि भाजपा सदन में जरुरी बहुमत के आंकड़े को नहीं जुटा पाई थी… ऐसी नौबत दुबारा न आये इसलिए राष्ट्रपति ने दूसरी बार भाजपा को सरकार बनाने से पूर्व उसको सभी गठबंधन सहयोगियों से एक चिठ्ठी पर हस्ताक्षर करवाने की शर्त रखी थी… राष्ट्रपति महोदय की शर्त का उद्देश्य ये साबित करना था कि राजग सरकार के पास पूर्ण बहुमत है… सरकार बनाने की और नए सहयोगियों को जुटाने की जल्दबाजी में भाजपा एक बड़ी चूक कर बैठी कि वो अपने सभी गठबंधन सहयोगियों से समर्थन की औपचारिक चिठ्ठी लेना भूल गयी ! अन्नाद्रमुक की जयललिता ने भाजपा की इस गलती का राजनैतिक फ़ायदा उठाते हुए…चिठ्ठी पर हस्ताक्षर करने के बदले अपनी कुछ शर्तें रख दी ! जयललिता ने सुब्रमणियास्वामी को फाइनेंस मनिस्टर बनाना उन्ही शर्तों में शामिल था … जयललिता और सुब्रमण्यम स्वामी की उन दिनों बड़ी अच्छी बनती थी… लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी इतने बड़े पद के लिये सुब्रमण्यम स्वामी को उपयुक्त नही समझते थे…. जयललिता के समर्थन में 27 सांसद थे भाजपा उनके बिना सरकार नहीं बना सकती थी ! लेकिन जयललिता की कमजोर नस सी.बी.आई के हाथों में थी उन पर आय से अधिक सम्पति रखने का मामला कोर्ट में था इसलिए जयललिता को केंद्र सरकार की सहयोग की सख्त जरूरत थी … जयललिता मन मसोस कर कुछ मुद्दों पर आपसी सहमती बनने पर भाजपा को समर्थन करने को तैयार हो गयी… एक तरफ़ 19 मार्च 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी जी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बन गये तो दूसरी तरफ़ कांग्रेस की बागडोर पहली बार सोनिया गांधी के हाथ में आ गयी ! यहीं से कांग्रेस में एक बार फिर से गांधी परिवार के दूसरे युग की शुरुआत हुई… सुब्रमणियास्वामी फाइनेंस मिनिस्टर न बनाये जाने से खफ़ा थे इसलिए उन्होंने राजग सरकार को अस्थिर करने के लिए अपने तिकड़म लगाते रहे… एक दिन सही मौका देखकर… जयललिता और सोनिया गांधी का टी पार्टी के जरिये मीटिंग करवाया… गुपचुप तरीके से दोनों नेत्रियों ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का एक फुलप्रूफ प्लान तैयार कर लिया… उस टी पार्टी के कुछ दिनों के बाद ही प्लान के मुताबिक ही जयललिता ने राजग सरकार से समर्थन वापस ले लिया ! अब राजग सरकार अल्पमत में आ चुकी थी और सरकार की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह उठने लगे थे ! 17 अप्रैल 1999 का दिन,अटल बिहारी जी के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. सरकार के लिए किसी अग्नि परिक्षा से कम नही था क्योंकि संसद में उसके समक्ष सत्ता के लिए जरुरी 273 का आकंडा (बहुमत) साबित करना था !! एक बार फिर अटल बिहारी उस मुहाने पर खड़े थे जहाँ 13 माह पहले महज 13 दिनों की सरकार चलाने के बाद खड़े थे… अविश्वास प्रस्ताव सदन में आ चुका था… सुबह 10:45 पर बसपा सुप्रीमों मायावती ने वाजपेयी सरकार को समर्थन करने का सार्वजनिक ऐलान मीडिया में कर दिया… जहां दो महिला नेता अटल बिहारी की सरकार को गिरने की जुगत में थी वहीं… इस महिला नेता के बयान से अटल बिहारी वाजपेयी ने भी राहत की सांस ली… और अशस्वत हो गए उनकी सरकार अब गिरने नही जा रही…. लेकिन साहब राजनीति इसी का नाम… सीधे साधे लोगो की नही यहां तिकडमी लोगो की ही चलती है….संसद में वोटिंग शुरू होने से पहले बसपा सुप्रीमो अपने बयान से पलट गयी ! और सरकार की आसानी को मुश्किलों में तब्दील कर दिया संसद में मतदान के दौरान सरकार के पक्ष में 269 और सरकार के विरोध में 270 वोट पड़े और एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार … महज 13 महीने में धराशायी हो गयी… भारतीय राजनीति की 3 शक्तिशाली महिलाओं ने भारतीय राजनीति में उस दिन भूचाल ला दिया… उस पूरे घटनाक्रम के बाद सोनिया गांधी ने मुलायम सिंह के वादों पर विश्वास करके सरकार बनाने का दावा पेश जरुर किया था लेकिन हर मामले में माया से चार कदम आगे रहने वाले मुलायम सिंह यहां वादाखिलाफी में भी उनसे आगे रहे …. कांग्रेस से किये वादे से मुकर गए और सोनिया गांधी के सरकार बनाने का सपना चकनाचूर हो गयी… देश को समय पूर्व लोक सभा चुनाव की मार झेलनी पड़ी…. सत्ता के इस खेल में नफा नुकसान चाहे जिसका भी हुआ… देश का मतदाता अपने आप को ठगा ही महसूस करता रहा…. गठबंधन की राजनीति इन्ही वजहों से अब अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है… और जब भी देश का वोटर गंठबंधन का नाम सुनता है तो अंदर से सिहर उठता है…. याद आ जाता है वो सारा कांड जब अपने अपने निहित स्वार्थों के लिए ये छोटे छोटे दल देश की बड़ी से बड़ी सरकार को अस्थिर कर देश को बार बार चुनाव में झोंकते है…

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